भारतीय वाङ्मय के इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास एक ऐसे कालजयी व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल भक्ति मार्ग को सुगम बनाया, बल्कि मध्यकालीन भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक विखंडन के समय एक सशक्त समन्वयकारी शक्ति के रूप में उभरे। सोलहवीं शताब्दी का भारत जहाँ एक ओर राजनीतिक उथल-पुथल और विदेशी आक्रांताओं के सांस्कृतिक प्रभाव से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ जैसी कालजयी कृति की रचना कर भारतीय जनमानस को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से पुन: जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। वे केवल एक कवि मात्र नहीं थे, बल्कि एक ऐसे आध्यात्मिक शोधकर्ता थे जिन्होंने संस्कृत की दार्शनिक जटिलताओं को लोकभाषा अवधी में ढालकर भक्ति को प्रत्येक घर के आंगन तक पहुँचा दिया 1।
गोस्वामी तुलसीदास केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धारक थे। उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ आज भी उत्तर भारत के प्रत्येक घर में पूजी जाती है और वैश्विक स्तर पर इसे मानवीय संवेदनाओं का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है 16। मुस्लिम शासकों के दमनकारी युग में उन्होंने अपनी भक्ति और साहित्य के माध्यम से हिंदू समाज को जो संबल प्रदान किया, वह अद्वितीय है। वानर प्रसंग और अकबर के दरबार की घटनाएं इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि सत्य और निस्वार्थ भक्ति के समक्ष सबसे बड़ी सांसारिक सत्ता को भी नतमस्तक होना पड़ता है। तुलसीदास की विरासत आज भी राम-नाम के रूप में प्रत्येक भारतीय के हृदय में सुरक्षित है।
| तुलसीदास: जीवन परिचय की संक्षिप्त रूपरेखा | तथ्यात्मक विवरण |
| मूल नाम |
रामबोला दुबे 2 |
| जन्म तिथि (प्रमुख मत) |
संवत 1554 (1497 ई.) अथवा संवत 1589 (1532 ई.) 6 |
| जन्म स्थान |
राजापुर, जिला बांदा (चित्रकूट) या सोरों (कासगंज) 1 |
| अभिभावक |
आत्माराम दुबे (पिता) और हुलसी देवी (माता) 1 |
| दीक्षा गुरु |
स्वामी नरहरिदास 1 |
| शिक्षा गुरु |
शेष सनातन (काशी) 8 |
| प्रमुख दर्शन |
विशिष्टाद्वैत और समन्वयवाद 2 |
| महाप्रयाण |
संवत 1680 (1623 ई.), अस्सी घाट, वाराणसी 1 |
जन्म और अलौकिक बचपन: रामबोला से तुलसीदास तक की यात्रा
गोस्वामी तुलसीदास के जन्म की परिस्थितियाँ साधारण मानवीय तर्क से परे और अलौकिक घटनाओं से परिपूर्ण मानी जाती हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों और ‘मूल गोसाईं चरित’ के अनुसार, उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अंतर्गत यमुना तट पर स्थित राजापुर गाँव में हुआ था, हालांकि कुछ आधुनिक विद्वान सोरों (कासगंज) को भी उनका जन्मस्थान मानते हैं 1। तुलसीदास का जन्म एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उनके जन्म से जुड़ी सबसे विलक्षण मान्यता यह है कि वे अपनी माता हुलसी के गर्भ में सामान्य नौ माह के स्थान पर पूरे बारह माह तक रहे थे 1। सामान्यतः शिशु जन्म के समय रुदन करते हैं, परंतु तुलसीदास ने जन्म लेते ही रुदन करने के स्थान पर स्पष्ट रूप से ‘राम’ शब्द का उच्चारण किया, जिसके कारण उनका नाम ‘रामबोला’ पड़ा 1। एक और आश्चर्यजनक तथ्य यह था कि वे जन्म के समय ही बत्तीस दांतों से युक्त थे और उनका शारीरिक विकास एक पाँच वर्ष के बालक के समान प्रतीत होता था 1।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, उनका जन्म ‘अभुक्त मूल’ नक्षत्र में हुआ था, जिसे तत्कालीन हिंदू समाज में माता-पिता के लिए अत्यंत अनिष्टकारी माना जाता था 7। इसी भय और विचित्र प्रसव घटनाओं के कारण उनके पिता आत्माराम दुबे ने उन्हें त्यागने का निर्णय लिया। उनकी माता हुलसी ने बालक के प्राणों की रक्षा के लिए उसे अपनी दासी ‘चुनियां’ को सौंप दिया, जो उसे अपने गाँव हरिपुर ले गई 1। हुलसी का निधन बालक के जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया और लगभग साढ़े पाँच वर्षों के पालन-पोषण के बाद चुनियां का भी देहांत हो गया, जिससे रामबोला पूर्णतः अनाथ होकर गलियों में भिक्षा मांगने को विवश हो गए 1। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस कठिन समय में स्वयं माता पार्वती ने एक ब्राह्मणी का वेश धारण कर बालक को नित्य भोजन कराया 1。
गुरु कृपा और शैक्षणिक पृष्ठभूमि: ज्ञान और दीक्षा
रामबोला के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन तब आया जब स्वामी नरहरिदास (जिन्हें नरहर्यानंद भी कहा जाता है), जो रामानंदी संप्रदाय के एक प्रबुद्ध संत थे, ने उन्हें अपनी शरण में लिया। नरहरिदास ने बालक की दिव्यता को पहचाना और उन्हें ‘विभक्त दीक्षा’ (वैरागी दीक्षा) प्रदान की, जिसके साथ ही उनका नया नाम ‘तुलसीदास’ रखा गया 1। नरहरिदास उन्हें अयोध्या ले गए और सात वर्ष की आयु में उनका यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराया 1।
तुलसीदास की प्रारंभिक शिक्षा अयोध्या और चित्रकूट के ‘सुकरखेत’ (वराह क्षेत्र) में हुई, जहाँ उन्होंने अपने गुरु से पहली बार भगवान राम की कथा सुनी 1। इसके पश्चात, वे काशी (वाराणसी) पहुँचे, जो उस समय भारतीय विद्या का केंद्र था। यहाँ उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान शेष सनातन जी के सान्निध्य में लगभग पंद्रह वर्षों तक वेदों, वेदांगों, दर्शनशास्त्र (न्याय, सांख्य, मीमांसा), पुराणों और इतिहास का गहन अध्ययन किया 8। इस अवधि ने तुलसीदास को एक ऐसे दार्शनिक के रूप में गढ़ा, जो बाद में अपनी रचनाओं में ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय करने में सफल रहे।
गृहस्थ जीवन और वैराग्य: रत्नावली की प्रेरणा
शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात तुलसीदास अपने पैतृक स्थान राजापुर लौट आए। यहाँ उनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली (कुछ स्रोतों में बुद्धिमती) से हुआ 1। तुलसीदास अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम और आसक्ति रखते थे। एक बार जब रत्नावली अपने भाई के साथ मायके चली गईं, तो तुलसीदास विरह की व्याकुलता में भारी वर्षा और उफनती यमुना नदी को पार कर रात के अंधेरे में उनके पास पहुँच गए 1। मान्यता है कि नदी पार करने के लिए उन्होंने एक बहते हुए शव को लकड़ी का लट्ठा समझा और पत्नी के कक्ष तक पहुँचने के लिए एक सांप को रस्सी समझकर ऊपर चढ़ गए 9।
उनकी इस कामासक्ति को देखकर रत्नावली अत्यंत व्यथित और लज्जित हुईं। उन्होंने तुलसीदास को झिड़कते हुए वह ऐतिहासिक दोहा कहा जिसने एक प्रेमी को महान संत में बदल दिया:
“अस्थि चर्ममय देह यह, तासों ऐसी प्रीति।
नेक जो होती राम से, तो काहे भव-भीत॥” 1
इन शब्दों ने तुलसीदास के अंतर्मन को झकझोर दिया। उन्हें अपनी शारीरिक आसक्ति पर आत्मग्लानि हुई और वे उसी क्षण घर त्यागकर वैराग्य पथ पर निकल पड़े 1। इसके बाद उन्होंने अगले चौदह वर्षों तक भारत के प्रमुख तीर्थों, जैसे बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम की पैदल यात्रा की, जिससे उनका अनुभव और दृष्टिकोण और भी व्यापक हो गया 5।
हनुमान जी और श्रीराम का साक्षात्कार: चित्रकूट प्रसंग]
तुलसीदास की साधना का चरमोत्कर्ष भगवान राम के प्रत्यक्ष दर्शन में था। काशी में वास के दौरान, वे नित्य शौच के पश्चात जलपात्र का शेष जल एक विशेष वृक्ष की जड़ में अर्पित करते थे, जहाँ एक प्यासे प्रेत (आत्मा) का निवास था 5। उस प्रेत ने तृप्त होकर तुलसीदास को वरदान देने की इच्छा जताई। तुलसीदास ने केवल श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा की 5। प्रेत ने स्वयं असमर्थता जताते हुए बताया कि हनुमान जी प्रतिदिन कोढ़ी के वेश में सबसे अंत में रामकथा सुनने आते हैं, वे ही प्रभु से मिलन करा सकते हैं 5।
तुलसीदास ने हनुमान जी को पहचान लिया और उनके चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी के निर्देशानुसार वे चित्रकूट के मंदाकिनी तट पर स्थित रामघाट पर रहने लगे 5। संवत 1607 के लगभग, उन्हें दो बार दर्शन हुए। पहली बार में वे घोड़े पर सवार दो राजकुमारों को नहीं पहचान सके। दूसरी बार हनुमान जी ने तोते का रूप धारण कर संकेत दिया, जब भगवान राम स्वयं बालक रूप में तुलसीदास से चंदन मांग रहे थे। इस अलौकिक दृश्य ने तुलसीदास को भाव-समाधि में लीन कर दिया 9。
रामचरितमानस की रचना और रचनाकाल की आयु
गोस्वामी तुलसीदास की कीर्ति का आधार स्तंभ ‘श्रीरामचरितमानस’ है। इसकी रचना का प्रारंभ संवत 1631 (1574 ई.) में अयोध्या में रामनवमी के पावन दिन हुआ था 1。
| रामचरितमानस रचना काल का विवरण | तथ्यात्मक विवरण |
| रचना प्रारंभ तिथि |
संवत 1631 (चैत्र शुक्ल नवमी, मंगलवार) 1 |
| रचना समाप्ति तिथि |
संवत 1633 (मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, राम-सीता विवाह तिथि) 8 |
| कुल समय |
2 वर्ष, 7 माह, 26 दिन 8 |
| रचना के समय उम्र (मत 1) |
लगभग 42 वर्ष (यदि जन्म 1532 ई. माना जाए) 4 |
| रचना के समय उम्र (मत 2) |
लगभग 63 वर्ष (यदि जन्म 1511 ई. माना जाए) 2 |
| रचना के समय उम्र (मत 3) |
लगभग 77 वर्ष (यदि जन्म 1497 ई. माना जाए) 6 |
तुलसीदास ने इस महाकाव्य की रचना लोकभाषा अवधी में की ताकि समाज का साधारण व्यक्ति भी प्रभु राम के आदर्शों को समझ सके 1。 रचना के पश्चात काशी के विद्वानों ने इसका विरोध किया क्योंकि यह संस्कृत के बजाय जनभाषा में थी। मान्यता है कि जब इस ग्रंथ को काशी विश्वनाथ मंदिर में वेदों के नीचे रखा गया, तो प्रातःकाल यह वेदों के ऊपर मिला और उस पर ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ अंकित था, जिससे इसकी दिव्यता प्रमाणित हुई 1。
मुस्लिम शासक और जेल का चमत्कार: हनुमान चालीसा की उत्पत्ति
तुलसीदास के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और चमत्कारी प्रसंग मुगल सम्राट अकबर (कुछ लोक कथाओं में जहांगीर का उल्लेख है, किंतु अधिकांश ऐतिहासिक संदर्भ अकबर की ओर संकेत करते हैं) के काल से जुड़ा है। यह प्रसंग न केवल तुलसीदास की भक्ति शक्ति को दर्शाता है, बल्कि तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों के बीच भक्ति की विजय का प्रतीक भी है 17。
सम्राट का बुलावा और कारावास
जब तुलसीदास की प्रसिद्धि और उनके द्वारा किए गए चमत्कारों (जैसे एक मृत व्यक्ति को पुनः जीवित करना) की चर्चा दिल्ली तक पहुँची, तो सम्राट अकबर ने उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया 17। सम्राट ने तुलसीदास से अपनी ‘जादुई शक्तियाँ’ दिखाने या कोई चमत्कार करने की मांग की। तुलसीदास ने बड़ी विनम्रता और दृढ़ता के साथ उत्तर दिया कि उनके पास कोई व्यक्तिगत चमत्कारिक शक्ति नहीं है; वे केवल राम के एक तुच्छ सेवक हैं और जो कुछ भी होता है, वह प्रभु राम की कृपा से होता है 16।
तुलसीदास के इस इनकार को सम्राट ने अपना अपमान समझा और आदेश दिया कि इस ‘फकीर’ को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया जाए 16। उन्हें फतेहपुर सीकरी के किले की जेल में रखा गया और सम्राट ने चुनौती दी कि “यदि तुम्हारा राम सत्य है, तो वह तुम्हें यहाँ से छुड़ाएगा” 25。
जेल में हनुमान चालीसा की रचना
जेल की कालकोठरी में तुलसीदास ने विचलित होने के स्थान पर अपने रक्षक हनुमान जी का ध्यान किया। यहीं पर उन्होंने ‘हनुमान चालीसा’ की रचना की 22। लोक परंपराओं के अनुसार, वे चालीस दिनों तक जेल में रहे और प्रतिदिन हनुमान जी की महिमा में एक-एक पद (चौपाई) लिखते गए, जिसे आज ‘हनुमान चालीसा’ के नाम से जाना जाता है 22। चालीसवें दिन जब यह स्तुति पूर्ण हुई, तब एक ऐसी घटना घटी जिसने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी।
वानरों का आक्रमण और सम्राट का पलायन
जैसे ही हनुमान चालीसा का पाठ संपन्न हुआ, अचानक हजारों-लाखों की संख्या में विशाल और आक्रामक वानरों की एक सेना ने फतेहपुर सीकरी और अकबर के शाही महल पर आक्रमण कर दिया 16। इन वानरों ने पूरे नगर में हाहाकार मचा दिया:
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वानरों ने शाही बागों और इमारतों को नष्ट करना शुरू कर दिया 22।
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वे सुरक्षाकर्मियों के हथियार छीन लेते, उन्हें काटते और महल की छतों को गिराने लगे 29।
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मुगल सेना इन वानरों को रोकने में पूर्णतः असमर्थ रही। जितनी बार सैनिक उन पर हमला करते, वानरों की संख्या और आक्रामकता और बढ़ जाती 21。
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यहाँ तक कि महल के रसोइयों और महिलाओं के कक्षों में भी बंदरों ने घुसकर भारी तबाही मचाई 29।
महल में मचे इस तांडव से सम्राट अकबर अत्यंत भयभीत हो गया। उसके धार्मिक सलाहकारों (हाफिज और मंत्रियों) ने उसे चेतावनी दी कि यह कोई सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि उस हिंदू संत के साथ किए गए दुर्व्यवहार के कारण दैवीय दंड है 21。
मुक्ति और ऐतिहासिक समझौता
अपनी जान और साम्राज्य को बचाने के लिए अकबर स्वयं जेल की कोठरी तक नंगे पैर गया और तुलसीदास के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी 16। तुलसीदास ने जैसे ही हनुमान जी से प्रार्थना की, वानरों का वह झुंड क्षण भर में गायब हो गया 17।
अकबर ने तुलसीदास को ससम्मान मुक्त किया और उनसे मित्रता कर ली 25। इसके पश्चात अकबर ने एक शाही फरमान (firman) जारी किया, जिसमें आदेश दिया गया कि उसके राज्य में भगवान राम और हनुमान के अनुयायियों को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित नहीं किया जाएगा 25। यह भी मान्यता है कि इस घटना के भय से अकबर ने फतेहपुर सीकरी को त्याग दिया और अपनी राजधानी को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया 25। यह प्रसंग भारतीय लोक-साहित्य में “भक्ति की शक्ति बनाम राजसी सत्ता” के सबसे बड़े उदाहरण के रूप में प्रतिष्ठित है।
तुलसीदास का वृहद साहित्यिक योगदान: 12 प्रामाणिक ग्रंथ
रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के अतिरिक्त, तुलसीदास ने विभिन्न विषयों और रसों में ग्यारह अन्य प्रमुख ग्रंथों की रचना की है, जिनमें ब्रज और अवधी दोनों भाषाओं का उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है 16।
| ग्रंथ का नाम | प्रमुख विषय और रस | भाषा |
| विनय पत्रिका | प्रभु राम के प्रति समर्पण और भक्ति के पद (शांत रस) |
ब्रजभाषा 18 |
| कवितावली | रामकथा का छंदबद्ध वर्णन (वीर और भयानक रस) |
ब्रजभाषा 7 |
| दोहावली | नीति, भक्ति और व्यवहार के दोहे |
ब्रज/अवधी 9 |
| गीतावली | पदों के रूप में रामकथा का गायन |
ब्रजभाषा 41 |
| कृष्ण गीतावली | भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन |
ब्रजभाषा 41 |
| हनुमान बाहुक | शारीरिक पीड़ा से मुक्ति हेतु हनुमान स्तुति |
ब्रजभाषा 41 |
| जानकी मंगल | राम-सीता विवाह का मांगलिक वर्णन |
अवधी 41 |
| पार्वती मंगल | शिव-पार्वती विवाह का वर्णन |
अवधी 1 |
| रामाज्ञा प्रश्न | ज्योतिष और शकुन पर आधारित ग्रंथ |
अवधी 41 |
| वैराग्य संदीपनी | ज्ञान और वैराग्य का उपदेश |
अवधी 41 |
| बरवै रामायण | छोटे छंदों में रामकथा |
अवधी 41 |
| रामलला नहछू | संस्कारों के समय गाए जाने वाले गीत |
अवधी 41 |
समन्वयवाद और सामाजिक प्रभाव
तुलसीदास के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा पहलू उनका ‘समन्वय’ था। उन्होंने उस समय के हिंदू धर्म में व्याप्त शैव (शिव के उपासक) और वैष्णव (विष्णु के उपासक) विवाद को समाप्त करने का प्रयास किया 1। रामचरितमानस में भगवान राम द्वारा शिव की स्तुति और भगवान शिव द्वारा राम की महिमा का गान इसी समन्वय का प्रमाण है।
उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के भीतर रहते हुए भी मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि माना। केवट, शबरी और निषादराज जैसे पात्रों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि ईश्वर की दृष्टि में प्रेम और भक्ति ही श्रेष्ठ है, कुल या जाति नहीं। उनके ग्रंथों ने भारतीय समाज को एक ऐसा ‘लोकतंत्र’ और ‘मर्यादा’ प्रदान की, जो मुगल काल के सांस्कृतिक संकट के समय हिंदुओं के लिए आत्मसम्मान का प्रतीक बनी।
अंतिम समय और महाप्रयाण
तुलसीदास ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष काशी के अस्सी घाट पर व्यतीत किए। वृद्धावस्था में उन्हें ‘बाहु-पीड़ा’ (भुजाओं का अत्यधिक दर्द) ने घेर लिया था, जिसके निवारण हेतु उन्होंने ‘हनुमान बाहुक’ की रचना की 41। अंततः संवत 1680 (1623 ई.) में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को उन्होंने अस्सी घाट पर गंगा तट पर अपना शरीर त्याग दिया 1。 उनके निधन पर यह दोहा अत्यंत प्रसिद्ध है:
“संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर॥” 5










