भारतीय योग परंपरा और सनातन धर्म में नाथ संप्रदाय का विशेष स्थान है। यह संप्रदाय आदिनाथ भगवान शिव द्वारा प्रवर्तित हुआ और योग एवं ध्यान के मार्ग को मानवता के लिए खोला। नाथ संप्रदाय का मूल उद्देश्य है आत्मज्ञान, साधना और मोक्ष की प्राप्ति।
नाथ संप्रदाय की स्थापना आदिनाथ भगवान शिव द्वारा हुई, जिन्होंने योग और ध्यान के पवित्र मार्ग को मानवता के लिए खोला। नवनाथों की परंपरा, मौखिक स्तुति और हठयोग की साधना इस संप्रदाय के मूल तत्व हैं। गोरक्षनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ के योगदान ने इसे और अधिक व्यापक और जीवंत बनाया।
नाथ संप्रदाय आज भी योग, ध्यान और आध्यात्मिक साधना का जीवंत प्रतीक है।
नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति और आदिनाथ भगवान शिव का योगदान
नाथ संप्रदाय के इतिहास पर विद्वानों के विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वान इसे जैन और बौद्ध परंपराओं से प्रभावित मानते हैं, जबकि अधिकांश इसे आदिनाथ शिव द्वारा प्रवर्तित मानते हैं। प्रारंभ में इसे सिद्धमत, सिद्धमार्ग, योगमार्ग, योगी संप्रदाय, अवधूत मत, कापालिक आदि नामों से जाना जाता था। समय के साथ “नाथ” और “योगी” शब्द सबसे अधिक प्रचलित हुए।
आदिनाथ भगवान शिव ने मानवता को योग का मार्ग दिखाने के लिए नवनाथों का अवतार कराने की परंपरा की शुरुआत की। इसे नव नारायणों की उत्पत्ति के रूप में माना जाता है।
नव नारायण और नवनाथों की उत्पत्ति
सृष्टि रचना के बाद जब जीव नाश की ओर बढ़ रहे थे, तो शिव ने योगमार्ग का उपदेश देने के लिए नव नारायणों को आदेश दिया। ये नव नारायण ही आगे जाकर नवनाथ बने।
| क्रम | नव नारायण | अवतार | गुरु |
|---|---|---|---|
| 1 | कविनारायण | मत्स्येन्द्रनाथ | शिव |
| 2 | करभाजनारायण | गहनिनाथ | शिव |
| 3 | अंतरिक्षनारायण | जालन्धरनाथ | शिव |
| 4 | हरिनारायण | भर्तृहरिनाथ | गोरक्षनाथ |
| 5 | आविर्होत्रनारायण | नागनाथ | गोरक्षनाथ |
| 6 | पिप्पलायनारायण | चर्पटनाथ | मत्स्येन्द्रनाथ |
| 7 | चमसनारायण | रेवानाथ | मत्स्येन्द्रनाथ |
| 8 | प्रबुद्धनारायण | करणिपानाथ | जालन्धरनाथ |
| 9 | द्रुमिलनारायण | गोपीचन्द्रनाथ | जालन्धरनाथ |
तालिका से स्पष्ट होता है कि नव नारायण ही नवनाथ बने, जबकि शिव और गोरक्षनाथ उनके गुरु थे, परन्तु वे स्वयं नवनाथों में शामिल नहीं हैं।
नवनाथों की प्रमुख सूची
नाथ संप्रदाय में विशेष रूप से जिन नवनाथों का आदर किया जाता है, वे हैं:
आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, संतोषनाथ, अचलअचभनाथ, कन्थडऩाथ, चौरंगीनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ।
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आदिनाथ शिव: संप्रदाय का प्रथम प्रवर्तक, योग और ध्यान के मार्गदर्शक।
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गोरक्षनाथ: बालरूप में निष्कपट और निर्मल, अद्वैत स्वरूप, योग साधकों के मार्गदर्शक।
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मत्स्येन्द्रनाथ: नवनाथों में सर्वाधिक प्रतिष्ठित, मायारूप और दादागुरू के रूप में प्रसिद्ध।
नाथ संप्रदाय की मान्यताएँ
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शिव की दिव्यता:
आदिनाथ शिव को नाथ संप्रदाय का सर्वोच्च गुरु माना जाता है। उनका अद्वैत स्वरूप नाथ योगियों के लिए आदर्श है। -
गुरु-शिष्य परंपरा:
नव नारायणों द्वारा योग का प्रचार किया गया। इनके शिष्य बनकर वे नवनाथ बने। -
मौखिक परंपरा और ग्रंथ:
नाथ संप्रदाय में मौखिक ज्ञान का विशेष महत्व है। नवनाथों की स्तुति, वंदना और मंत्रों का प्रयोग दैनिक साधना में किया जाता है। -
योग साधना और हठयोग:
नाथ संप्रदाय में ध्यान, प्राणायाम और हठयोग का विशेष अभ्यास कराया जाता है। आदिनाथ शिव ने इसे सर्वोच्च साधना माना।
गोरक्षनाथ और अद्वैत योग
गोरक्षनाथ को बालरूप में निष्कपट, निष्पाप और निर्मल माना जाता है। वे शिव के अद्वैत स्वरूप के समान हैं और योग साधकों के लिए मार्गदर्शक हैं।
नाथ संप्रदाय में यह विश्वास है कि साधक को मोक्ष प्राप्ति के लिए गुरु के सान्निध्य में रहना अनिवार्य है। शिव और गोरक्षनाथ का अद्वैत स्वरूप साधकों को जीवन के सभी द्वंद्वों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।
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