Advertisement
Home Religious Dharm-Sanskriti ओ३म् “वेदों पर आधारित वैदिक धर्म मानव धर्म का पयार्य है”

ओ३म् “वेदों पर आधारित वैदिक धर्म मानव धर्म का पयार्य है”

0
831

ओ३म्
“वेदों पर आधारित वैदिक धर्म मानव धर्म का पयार्य है”

सभी प्राणी योनियों में मनुष्य योनि श्रेष्ठ है और सभी प्राणियों में मनुष्य सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। मनुष्य ज्ञान अर्जित कर सकता है परन्तु अन्य प्राणी, पशु व पक्षी आदि, ज्ञान प्राप्त कर उसके चिन्तन, मनन व विश्लेषण द्वारा वह लाभ प्राप्त नहीं कर सकते जो कि मनुष्य करता है। इसलिये मनुष्य श्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। मनुष्य संसार में आया है तो इसका कोई प्रयोजन अवश्य होगा? यह प्रयोजन जानना मनुष्य का पहला कर्तव्य है। उस प्रयोजन को जान लेने के बाद उसे पूरा करना भी मनुष्य का कर्तव्य है। वह प्रयोजन क्या है, इसके लिये हमें वेद व ऋषियों के साहित्य को देखना होगा। वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि मनुष्य के शरीर में एक अनादि, सनातन, चेतन, अल्पज्ञ, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, ज्ञान व पुरुषार्थ करने में समर्थ जीवात्मा का वास है। मनुष्य शरीर में आत्मा की सत्ता अनादि सत्ता है, अतः इसके अनेक व असंख्य पूर्वजन्म सिद्ध हो जाते हैं। अनादि व अमर होने से आत्मा के भविष्य में भी असंख्य व अनन्त जन्मों का होना सिद्ध होता है। जीवात्मा का मनुष्य आदि योनियों व शरीरों में जन्म उसके पूर्वजन्मों के शुभ व अशुभ कर्मों के फल भोगने के लिये होता है। यह पूर्ण तर्कसंगत सिद्धान्त है एवं सृष्टि में घट रहे अनेक उदाहरणों से भी यह सिद्धान्त पुष्ट होता है। एक ही माता-पिता के बच्चों में ज्ञान व शक्ति तथा शारीरिक क्षमतायें समान नहीं होती। सभी बच्चों की आत्मायें पृथक पृथक होती हैं।

Advertisment

इससे यह ज्ञात होता है कि पूर्वजन्मों में कर्मों की कुछ समानता से वह एक माता-पिता व परिवार में जन्म तो प्राप्त करने में समर्थ हुए हैं परन्तु उनके कर्मों के अन्तर के कारण उनकी ज्ञान व पुरुषार्थ की क्षमतायें, रंग, रूप, आकृति तथा रूचियां व स्मरण शक्ति आदि में अन्तर देखा जाता है। मनुष्य के जन्म का विश्लेषण करने पर यह भी ज्ञात होता है कि भविष्य में जीवात्मा का इस जन्म के कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म होगा। एक स्थिति यह भी बनती है मनुष्य कोई अशुभ व पाप कर्म न करे, सभी शुभ व पुण्य कर्म ही करे, ईश्वर व आत्मा विषयक ज्ञान प्राप्त कर सदाचरण का जीवन व्यतीत करे, तो उसका पुनर्जन्म के स्थान पर दुःखरहित तथा आनन्द से युक्त मोक्ष भी हो सकता है। मोक्ष की चर्चा शास्त्रों सहित ऋषि दयानन्द कृत ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में बहुत उत्तमता से की गई है। इससे सबको अवश्य लाभ उठाना चाहिये।

धर्म शब्द व इसके अर्थ पर विचार करते हैं। धर्म वह गुण, कर्म व स्वभाव होते हैं जो मनुष्य के धारण योग्य हों। धारण करने योग्य वह गुण हैं जो मनुष्य को पतन से बचाकर उन्नति के पथ पर आरूढ़ करें और विद्या प्राप्त करवाकर उसके द्वारा उसे दुःख से मुक्त कर इस जन्म की तुलना में भविष्यकाल में अधिक उत्तम मनुष्य जन्म व मुक्ति दिला सके। वेदों में आत्मा की उन्नति के मार्ग व उपाय बताये गये हैं। मनुष्य को क्या धारण करना है, इसका उत्तर है कि मनुष्य को सत्य धर्म को धारण करना है। सत्य धर्म वह है जो मनुष्य का अज्ञान वा अविद्या दूर कर उसे ईश्वर, जीवात्मा, धर्म, मोक्ष के ज्ञान सहित मनुष्य के उत्तम कर्तव्यों का मार्ग बताये। वेद तथा ऋषियों के अनेक ग्रन्थों उपनिषद एवं दर्शन सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों के अध्ययन से ईश्वर को जाना जा सकता है।

आर्यसमाज का दूसरा नियम सूत्ररूप में ईश्वर के स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभाव का चित्रण करता है। इस नियम में कहा गया है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ जीवात्मा के स्वरूप पर विचार करें तो यह सत्य, चेतन, निराकार, अल्पज्ञ, सीमित शक्ति से युक्त, अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ईश्वर से व्याप्य आदि गुणों वाला है। ईश्वर से आत्मा का सम्बन्ध व्याप्य-व्यापक, साध्य-साधक, उपास्य-उपासक तथा स्वामी-सेवक का है। ईश्वर हमारा माता, पिता, बन्धु, सखा, मित्र, आचार्य, राजा व न्यायाधीश, जन्म-मृत्यु का देने वाला, कर्म-फल दाता, सन्मार्ग का प्रेरक एवं दुःख-निवारक आदि हैं। अतः हमें ईश्वर के स्वरूप व गुणों को जानकर उनका चिन्तन, मनन, ध्यान, धारण, आचरण, प्रचार करने सहित उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। ऐसा करने से मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा का साक्षात्कार कर सकते है। मनुष्य शुभ-कर्मों सहित उपासना पर जितना अधिक ध्यान देगा, उसे आत्मा-शुद्धि, ज्ञान व बल में वृद्धि आदि का उतना ही अधिक लाभ होगा।

संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं परन्तु ईश्वर का सत्य व यथार्थ ज्ञान वेद, वैदिक साहित्य एवं वैदिक धर्म में ही उपलब्ध है। उपासना के लिये भी ऋषि पतंजलि का योगदर्शन एवं ऋषि दयानन्द रचित संन्ध्या व देवयज्ञ की पद्धति हैं। इनका साधनोपाय व आचरण करने से मनुष्य को जीवन में अनेक लाभ होते हैं। इससे साधक मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, शरीर स्वस्थ रहता है तथा देश व समाज भी उससे लाभान्वित होते हैं। उपासना की सर्वोत्तम पद्धति वैदिक पद्धति ही है। वेद ईश्वर की वाणी है, उसका उच्चारण करने से व उनके अर्थों के पाठ से ईश्वर से निकटता सम्पादित होती है।

अन्य मतों में ऐसा नहीं होता। वेदेतर किसी मत में ईश्वर के स्वरूप का उतना विशद वर्णन व यथार्थ ज्ञान उपलब्ध नहीं होता जितना वेद व ऋषियों सहित आर्य विद्वानों के अनेक ग्रन्थों से होता है। हम समझते हैं कि ईश्वर के स्वरूप तथा उसके गुण, कर्म व स्वभाव का लगभग पूर्ण वा पर्याप्त ज्ञान वैदिक धर्म को जानने व पालन करने से हो जाता है। देवयज्ञ अग्निहोत्र की लाभकारी विधि का ज्ञान केवल वेदानुयायियों को ही है। उसका क्रियात्मक आचरण भी केवल आर्य वैदिक धर्मी ही विश्व में करते हैं। इससे जो लाभ होता है वह यज्ञ करने से यज्ञकर्ताओं को ही होता है। अन्य मत-मतान्तरों के लोग इससे सर्वथा अनभिज्ञ एवं वंचित हैं। ऋषियों ने शास्त्रों में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म की संज्ञा दी है। यह भी कहा है कि सुख व स्वर्ग की कामना की पूर्ति के लिये यज्ञ करना ही सबसे मुख्य उपाय है। ऋषियों का विधान है कि सभी मनुष्यों को अपने जीवन की उन्नति के लिये प्रतिदिन प्रातः व सायं गोघृत, मिष्ट, ओषधियों तथा पुष्टिकारक पदार्थों से बनी साकल्य की न्यूनतम 16 आहुतियां यज्ञाग्नि में देनी चाहिये। ऐसा करके वह दोषमुक्त होता है। हमारे निमित्त अर्थात् खान-पान व रहन-सहन से जितना वायु, जल व पर्यावरण प्रदुषण होता है उसी मात्रा में हमें पाप लगता है। यह पाप यज्ञ करने से ही दूर होता है।

विधिपूर्वक अग्निहोत्र-यज्ञ वर्तमान समय में केवल ऋषि दयानन्द एवं आर्यसमाज के अनुयायी ही करते हैं। इसलिये आर्यों का भविष्य व भावी जीवन यज्ञ के परिणाम से सुखदायक होकर दुःखों से रहित होता है। इन कारणों से वैदिक धर्म ही सभी मत-मतान्तरों की तुलना में श्रेष्ठ व आचरणीय है। हमें वेदों की आत्मा व भावना के अनुरूप आचरण व व्यवहार करना चाहिये। ऐसा करने से हमें इसका लाभ प्राप्त होगा।

वैदिक धर्म में सत्य व्यवहार पर विशेष बल दिया जाता है। अनेक मत ऐसे हैं जहां के मताचार्य सत्य का व्यवहार नहीं करते। वहां दूसरे मतों के प्रति छल व कपट का व्यवहार किया जाता है। अनेक मतों में पशुओं का मांस खाने की प्रेरणा मिलती है व उनके अधिकांश अनुयायी ऐसा करते भी हैं। वैदिक धर्म मांसाहार, अण्डों का सेवन, धूम्रपान, व किसी भी प्रकार के सामिष भोजन का निषेध करता है। वैदिक धर्म में यहां तक विधान है कि हमें अपनी पवित्र कमाई वा साधनों से भोजन प्राप्त करना चाहिये। किसी के प्रति पक्षपात, शोषण एवं अन्याय करने की भी वैदिक धर्म में मनाही है।

अन्य मतों में दूसरे मत के लोगों व इतर प्राणियों को पीड़ित व कष्ट देने सहित अनेक प्रकार की हानि पहुंचाने तक का विधान है। कुछ मत ऐसे भी हैं जो छद्म व्यवहार कर लोभ व भय से मतान्तरण वा धर्मान्तरण करते हैं। वैदिक मत असत्य मतों के मानने वालों को सत्य का प्रचार कर उनकी शुद्धि करने का विधान करते हैं। ऐसे अनेक कारण बतायें जा सकते हैं जिससे वैदिक धर्म ही संसार का श्रेष्ठ धर्म सिद्ध होता है। वैदिक धर्म को अपनाने से जन्म-जन्मान्तर में उन्नति होती है।

कुछ मत ऐसे भी हैं जो अज्ञान के कारण पुनर्जन्म को नहीं मानते हैं। अतः ज्ञानी व विवेकी व्यक्ति को वेदाध्ययन करने सहित सत्यार्थप्रकाश का गम्भीरता से अध्ययन कर सत्य को स्वीकार और असत्य का त्याग करना चाहिये। इससे उसे जन्म-जन्मान्तरों में लाभ होगा। हम ईश्वरीय की व्यवस्था से पाप कर्मों के फल दुःखों से बच सकेंगे। यह निष्कर्ष निकलता है कि वेद एवं वैदिक धर्म ही शुद्ध मानव धर्म का पर्याय है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here