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पलटे कश्मीर के रिसते घावों के पन्ने:‘द कश्मीर फाइल्स’

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तीन दशक पहले जो कुछ कश्मीर में हुआ, उसके नंगे सच को उजारगर कर रही है फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ । बालीवुड की नंगी जमात को बेशक यह फिल्म बेशक रास नहीं आ रही हो, लेकिन सच यही है, जो कुछ फिल्म में दिखाया गया है। यह भी सच है कि तीन दशक पहले यह सबकुछ अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इस स्थिति तक जम्मू-कश्मीर तक लाने के लिए दशकों पहले से षड्यंत्रों का तानाबाना बुना गया था। यह तानाबाना आजादी के बाद से ही बुना जाने लगा था, इसी के तहत जम्मू-कश्मीर में धारा 37० व अन्य वैधानिक व्यवस्था का तानाबाना बुना गया था।

आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर को इस तरह से अन्य राज्यों से अलग रखने का कुचक्र कुछ तत्कालीन सत्ताधारों ने रचा था। इसे दुर्भाग्य कहे कि जिस वक्त या जिन परिस्थितियों में देश को आजादी मिली, उस वक्त कांग्रेस ने देश की सियासत पर पूरी तरह से कब्जा किया हुआ था, वहीं दूसरे आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को हाशिये पर ढकेल दिया गया था। चूंकि अंग्रेजों ने सत्ता की कांग्रेस को सौपी थी, सो अन्य आजादी के लिए आवाज उठाने वाले गरम दल के क्रांतिकारी हाशिए में ढकेल दिए गए। अंग्रेजों ने सत्ता कांग्रेस को ही क्यों सौपी, यह अलग विचारणीय बिंदु है।

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सत्ता सरदार पटेल के बजाय जवाहर लाल नेहरु को क्यों सौपी, यह अन्य विचारणीय बिंदु है। संघ व समान विचारधारा वाले संगठनों के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए गए। यह भी एक अलग सवाल है, बटवारे में मारे गए लाखों हिंदुओं की हत्या के सच को क्यो दबाया गया, यह अलग ही विचारणीय बिंदु है। चूंकि आजादी के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में थी तो इतिहास भी उन्होंने अपने हिसाब से गढ़ने का षड्यंत्र किया और देश पर इस कदर काबिज हो गए कि अन्य विचाराधाराओं को करीब-करीब कुचल ही दिया। लेकिन नब्बे के दशक से पहले जो हुआ, उससे कांग्रेस हैरान हो गई और उसे अपना जनाधार जाता हुआ दिखा दिया। ऐसे वक्त में कश्मीर में इस तरह की वारदात तत्कालील विपक्ष को समाप्त करने के लिए काफी थी, क्योंकि जिस साल यह घटना हुई, उसी साल चंद महीन पहले विपक्ष के हाथ सत्ता लगी थी।

हालांकि इसके बाद भी विपक्ष की सरकार जैसे-तैसे चली और अपना जनाधार स्थिर नहीं रख पाई। इसकी कई अन्य वजह भी रही, लेकिन उन चर्चा कोई औचित्य नहीं है। परंतु 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद भाजपा का वर्चस्व बढ़ने लगा और वह धीरे- धीरे एक कांग्रेस के विकल्प के रूप में तैयार होने लगी। यह वह समय था, जब भाजपा या यूं कहें कि हिंदू धर्म की पैरवी करने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था, उन्हें हर तरफ विरोध का सामना करना पड़ता था,आलम यह था कि कांग्रेस के कुछ नेता इस समय में क्रांतिकारियों को आतंकवादी तक कहने से भी नहीं चूके, लेकिन धीरे- धीरे वक्त बदला और भाजपा सत्ता पर काबिज हो गई, लेकिन विडम्बना यह है कि भाजपा की एक सशक्त सरकार के गठन के करीब सात साल बाद भी फिल्म के प्रदर्शन कैसी हाय तौबा मचा रखी है, इसी से कांग्रेस और वैसी सोच वाले दलों के पूर्वाग्रह का अनुमान लगाया जा सकता है। उनके हिंदुओं के प्रति विद्बेष को समझा जा सकता है।

अगर आज भी कांग्रेस सत्ता में होती तो इस सच को दफना दिया था, जैसे बटवाले में लाखों हिंदुओं कत्ल, 77 में हिंदू साधुओं की हत्या और 84 में सिखों की हत्या को दबाया गया है। फिल्म में कश्मीरी पंडितों के दर्द को बयान किया गया है, जिसका आज भी कांग्रेस को कोई अहसास नहीं दिख रहा है।

‘द कश्मीर फाइल्स’

‘द कश्मीर फाइल्स’ एक तरह से इतिहास की उन ‘फाइल्स’ को पलटने की कोशिश है जिनमें भारत देश में वीभत्स नरसंहारों के चलते हुए सबसे बड़े पलायन की कहानी है। देश में कश्मीर पंडित ही शायद इकलौती ऐसी कौम है जिसे उनके घर से आजादी के बाद बेदखल कर दिया गया है और करोड़ों की आबादी वाले इस देश के किसी भी हिस्से में कोई हलचल तक न हुई। जिस कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने वाले देश का दम बार बार बड़े बड़े नेता भरते रहे हैं, उसके हालात की ये बानगी किसी भी इंसान को सिहरा सकती है। कोई 32 साल पहले शुरू होती फिल्म की इस कहानी की शुरुआत ही एक ऐसे लम्हे से होती है जो क्रिकेट के बहाने एक बड़ी बात बोलती है। घाटी में जो कुछ हुआ वह दर्दनाक रहा है। उसे पर्दे पर देखना और दर्दनाक है। आतंक का ये एक ऐसा चेहरा है जिसे पूरी दुनिया को दिखाना बहुत जरूरी है। कहानी कहने में इसके एक डॉक्यूमेंट्री बन जाने का भी खतरा था, लेकिन सच्चाई लाने के लिए खतरों से किसी को तो खेलना ही होगा।

वीभत्स एहसास उससे कुछ कम भी नहीं

सिनेमा के लिहाज से ये फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ तक पहुंचने की कोशिश करती फिल्म है। यहां का नरसंहार भले उस पैमाने सा ना हो लेकिन इसका भयानक और वीभत्स एहसास उससे कुछ कम भी नहीं है। फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ पूरी तरह से विवेक अग्निहोत्री की फिल्म है। फिल्म की रिसर्च इतनी तगड़ी है कि एक बार फिल्म शुरू होती है तो दर्शक फिर इससे आखिर तक बाहर निकल नहीं पाते। वे एंड क्रेडिट्स के वक्त एकदम गुमसुम और खामोश से बस खड़े के खड़े रह जाते हैं और पता ही नही चलता कि पूरा हॉल खड़े होकर एक निर्देशक के कर्म को शाबासी दे रहा है। शिकायत कुछ लोगों को ये हो सकती है कि फिल्म अपने विषय के हिसाब से कैनवास का विस्तार नहीं पा सकी और फिल्म को तकनीकी रूप से और बेहतर होना चाहिए था। लेकिन, जिन हालात और जिस बजट में ये फिल्म बनी दिखती है, उसमें ऐसी कोई उम्मीद भी इस फिल्म से नहीं करनी चाहिए।

फिल्म में काबिले तारीफ

मौजूदा दौर में सिनेमा की कड़वी सच्चाई यही है कि एक तेलुगू फिल्म का हिंदी संस्करण एक हिंदी फिल्म से ज्यादा स्क्रीन्स पर दिखाया जा रहा है। फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर कहीं किसी तरह का शोर शराबा नहीं। कहीं किसी तरह का हैशटैग रिलीज से पहले ट्रेंड करने में किसी बड़ी सेलिब्रिटी का सहयोग भी नहीं। ये फिल्म अपना प्रचार अपने आप करती है। बतौर निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने इस फिल्म में जज्बात बोए हैं और एहसास काटे हैं। चिनार जैसे ऊंचे इम्तिहान में वह पूरे नंबरों के साथ पास हुए हैं तो बस इसलिए कि उनके साथ कंधे से कंधा मिलाने वाले कलाकारों और तकनीशियनों ने फिल्म में काबिले तारीफ काम किया है।

अनुपम खेर अरसे बाद अपने पूरे रंग मे दिखे

फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को इसके कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी देखा जाना चाहिए। अनुपम खेर अरसे बाद अपने पूरे रंग मे दिखे हैं। वह परदे पर जब भी आते हैं, दर्द का एक दरिया सा उफनाता है और दर्शकों को अपने साथ बहा ले जाता है। उनका अभिनय फिल्म में ऐसा है कि इसे देखने के बाद अगले साल का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उनके नाम होना बनता ही है। दर्शन कुमार ने फिल्म के अतीत को वर्तमान से जोड़ने का शानदार काम किया है। उनके कैंपस वाले भाषण और इस दौरान उनकी भाव भंगिमाएं देखने लायक हैं। चिन्मय मांडलेकर का अभिनय फिल्म की एक और मजबूत कड़ी है। तकनीकी तौर पर फिल्म बहुत कमाल की भले न हो लेकिन उदय सिंह मोहिले ने अपने कैमरे के सहारे फिल्म का दर्द धीरे धीरे रिसते देने में कामयाबी पाई है। फिल्म की अवधि इसकी सबसे कमजोर कड़ी है। फिल्म की अवधि कम करके इसका असर और मारक किया जा सकता है। फिल्म का संगीत कश्मीर के लोक से प्रेरणा पाता है और हिंदी भाषी दर्शकों को इसे समझाने के लिए विवेक ने मेहनत भी काफी की है। मुख्यधारा की फिल्म के हिसाब से फिल्म का संगीत हालांकि कमजोर है। लेकिन, इस सबके बावजूद फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ कथानक के लिहाज से इस साल की एक दमदार फिल्म साबित होती है।

फिल्म को मिल रही सराहना पर अनुपम खेर का रिएक्शन
वहीं फिल्म और इसकी टीम को हर तरफ से मिल रही सराहना पर अनुपम खेर ने पोस्ट शेयर कर लिखा, “जब एयरपोर्ट पर आपको 12-15 लोग बोलें- ‘आपकी ‘द कश्मीर फाइल्स’ देखी। सॉरी, हमें पता ही नहीं था कि कश्मीरी पंडितों के साथ ये सब हुआ था।’ और फिर सिक्योरिटी ऑफिसर कहे-खेर साहब! आपकी फिल्म ने दहला दिया!’ तो इसका मतलब है हमारी फिल्म लोगों के दिलों तक जा रही है। झकझोर रही है! जय हो।”

फिल्म में कोई बड़ा स्टार नहीं
इस फिल्म में अनुपम खेर के अलावा मिथुन चक्रवर्ती, दर्शन कुमार, पल्लवी जोशी, पुनीत इस्सर, मृणाल कुलकर्णी समेत कई कलाकार लीड रोल में हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी पंडितों की उस वक्त की कहानी को दिखाया गया है जब 90 के दशक में उन्हें अपने ही राज्य से निकाल दिया गया था। फिल्म को अभिषेक अग्रवाल ने प्रोड्यूस किया है।

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