भारतीय दवाओं ने बदला दक्षिण एशिया का खेल
नई दिल्ली, 16 जनवरी, (विशेष संवाददाता)। दक्षिण एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव हमेशा किसी शिखर सम्मेलन, किसी औपचारिक संधि या किसी संयुक्त प्रेस बयान से ही नहीं आते। कई बार इतिहास बेहद शांत तरीक़े से, बिना शोर किए, आम लोगों की ज़िंदगी के भीतर आकार लेता है। अफ़ग़ानिस्तान में इन दिनों ठीक यही हो रहा है। यह बदलाव न तो किसी युद्ध की घोषणा है और न ही किसी औपचारिक गठबंधन का ऐलान, बल्कि यह बदलाव काबुल की फ़ार्मेसियों, अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों की अलमारियों में दिखाई दे रहा है।
कभी जो देश अपनी बुनियादी स्वास्थ्य ज़रूरतों के लिए पाकिस्तान पर लगभग पूरी तरह निर्भर था, वह अब उसी पाकिस्तान को धीरे-धीरे अपने बाज़ार और अपनी ज़िंदगी से बाहर कर रहा है। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, बल्कि वर्षों से जमा होते अविश्वास, सीमा विवादों और दबाव की राजनीति का स्वाभाविक परिणाम है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार अफ़ग़ानिस्तान ने चुपचाप, लेकिन निर्णायक ढंग से रास्ता बदल लिया है।
इस पूरे बदलाव की ओर दुनिया का ध्यान एक अफ़ग़ान ब्लॉगर की साधारण-सी सोशल मीडिया पोस्ट ने खींचा। फ़ज़ल अफ़ग़ान नामक यह ब्लॉगर काबुल की एक फ़ार्मेसी में सिरदर्द की दवा खरीदने गया था। उसकी प्राथमिकता तुर्की या पाकिस्तानी ब्रांड थी, क्योंकि वर्षों से अफ़ग़ान उपभोक्ताओं के मन में यही धारणा बैठाई गई थी कि वही दवाएं भरोसेमंद हैं। लेकिन दुकानदार ने उसे भारतीय दवा आज़माने की सलाह दी।
जो सामने आया, वह केवल कीमत का अंतर नहीं था, बल्कि एक सोच का फर्क था। तुर्की में बनी पैरासिटामोल की दस गोलियों का पैकेट चालीस अफ़ग़ानी में मिल रहा था, जबकि वही साल्ट, वही मात्रा और वही उपयोग वाली भारतीय दवा केवल दस अफ़ग़ानी में उपलब्ध थी। दुकानदार का दावा था कि भारतीय दवाएं न केवल सस्ती हैं, बल्कि उनका असर भी ज़्यादा तेज़ और भरोसेमंद है। फ़ज़ल ने भारतीय दवा खरीदी, उसका सिरदर्द जल्दी ठीक हुआ और उसने जो लिखा, वह आज पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय बन चुका है। उसने साफ़ कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय दवाएं अब पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं।
यह एक व्यक्ति का अनुभव भर नहीं था। यह उस बड़े बदलाव की झलक थी, जो अफ़ग़ानिस्तान के स्वास्थ्य क्षेत्र में चुपचाप घटित हो रहा है। दशकों तक पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान की भौगोलिक मजबूरी का फ़ायदा उठाया। लैंडलॉक देश होने के कारण अफ़ग़ानिस्तान को ज़मीनी रास्तों से आयात पर निर्भर रहना पड़ा और तोरखम तथा चमन जैसे बॉर्डर पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक हथियार बन गए। अफ़ग़ानिस्तान का घरेलू फ़ार्मास्युटिकल उत्पादन बेहद सीमित रहा, जिससे दवाओं की भारी निर्भरता पाकिस्तान पर बनी रही।
2024 तक स्थिति यह थी कि अफ़ग़ानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली अधिकांश दवाएं पाकिस्तान से आती थीं। पाकिस्तान का अफ़ग़ान फ़ार्मा बाज़ार में प्रभुत्व इतना मज़बूत था कि उसे यह भ्रम हो गया कि यह निर्भरता कभी टूट नहीं सकती। यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। उसने निर्भरता को स्थायी वफ़ादारी मान लिया और वही पुरानी नीति अपनाई, जिसे वह हर पड़ोसी के साथ अपनाता आया है—दबाव, धमकी और सीमा बंद करने की राजनीति।
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते लगातार बिगड़ते गए। सीमा पर झड़पें बढ़ीं, व्यापारिक मार्ग बंद किए गए और अफ़ग़ान व्यापारियों को बार-बार नुकसान उठाना पड़ा। अक्टूबर और नवंबर 2025 में हालात उस बिंदु पर पहुँच गए, जहाँ अफ़ग़ान नेतृत्व ने फैसला कर लिया कि अब पाकिस्तान पर निर्भर रहना आत्मघाती है। इसके बाद अफ़ग़ान उप-प्रधानमंत्री अब्दुल ग़नी बरादर ने पाकिस्तानी दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया। आधिकारिक तौर पर वजह खराब गुणवत्ता बताई गई, लेकिन असल वजह यह थी कि भरोसा पूरी तरह टूट चुका था।
इस फैसले का असर तुरंत दिखा। अफ़ग़ानिस्तान में दवाओं की कमी हो गई। एंटीबायोटिक्स, इंसुलिन और दिल की दवाओं की किल्लत सामने आई। कुछ जगहों पर नकली दवाएं बिकने लगीं और कीमतें आसमान छूने लगीं। यही वह क्षण था, जब यह तय होना था कि अफ़ग़ानिस्तान के साथ असल में कौन खड़ा है।
पाकिस्तान, जो वर्षों तक खुद को अफ़ग़ानिस्तान का सबसे करीबी बताता रहा, इस संकट की घड़ी में कहीं दिखाई नहीं दिया। इसके उलट भारत ने बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी राजनीतिक शर्त के, अफ़ग़ानिस्तान को जीवन रक्षक दवाओं की इमरजेंसी खेप भेजी। नवंबर 2025 में भारत ने 73 टन मेडिकल सप्लाई काबुल पहुंचाई। यह कोई पहली मदद नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही उस नीति का हिस्सा थी, जिसमें भारत ने अफ़ग़ान जनता के साथ संबंध बनाए, न कि सत्ता के साथ सौदेबाज़ी की।
पिछले चार वर्षों में भारत ने सैकड़ों टन मेडिकल सप्लाई अफ़ग़ानिस्तान को दी है। अस्पताल, मातृत्व केंद्र, एंबुलेंस, टीके, डायग्नोस्टिक उपकरण और डॉक्टरों की ट्रेनिंग—ये सभी कदम किसी रणनीतिक बयान से ज़्यादा प्रभावी साबित हुए। यही वजह है कि आज अफ़ग़ान बाज़ार में भारतीय दवाएं केवल सस्ती विकल्प नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक बन चुकी हैं।
इसका असर सीधे अफ़ग़ान फ़ार्मा बाज़ार के आंकड़ों में दिख रहा है। जहाँ कभी पाकिस्तान की हिस्सेदारी लगभग चालीस प्रतिशत थी, वह अब लगभग समाप्त हो चुकी है। भारत का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसके और बढ़ने की पूरी संभावना है। भारतीय फ़ार्मा कंपनियां अब केवल निर्यात तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थानीय उत्पादन, तकनीकी सहयोग और दीर्घकालिक निवेश की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
यह बदलाव केवल व्यापारिक नहीं है। यह बदलाव उस मानसिकता का अंत है, जिसमें पाकिस्तान खुद को क्षेत्रीय अपरिहार्यता मानता था। अफ़ग़ानिस्तान अब यह समझ चुका है कि दबाव की राजनीति उसे कमज़ोर बनाती है, जबकि सहयोग उसे आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है। भारत ने इसी सहयोग की नीति को लगातार, बिना आक्रामक बयानबाज़ी के आगे बढ़ाया है।
अंततः यह कहानी केवल दवाओं की नहीं है। यह कहानी उस भरोसे की है, जो पाकिस्तान ने खो दिया और भारत ने कमाया। आज अफ़ग़ानिस्तान की फार्मेसियों में रखी भारतीय दवाएं इस बात का संकेत हैं कि दक्षिण एशिया की राजनीति अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी। यह एक शांत लेकिन गहरा परिवर्तन है, जिसमें पाकिस्तान की खटिया सचमुच खड़ी होती दिखाई दे रही है।
इतिहास कभी-कभी युद्ध के मैदान में लिखा जाता है, लेकिन कई बार वह बाज़ार की अलमारियों में लिखा जाता है। अफ़ग़ानिस्तान में इस समय वही इतिहास आकार ले रहा है।










