यूजीसी पर धर्मेंद्र प्रधान का बयान देश के एक वर्ग के साथ खुला अन्याय
नई दिल्ली, 29 जनवरी (भृगु नागर)। यूजीसी (UGC) से जुड़े विवादित प्रावधानों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का ताज़ा बयान न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह सत्ता के उस अहंकार को भी उजागर करता है, जिसमें संवेदना, संवाद और सामाजिक संतुलन के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। उनके बयान ने देश के एक बड़े वर्ग को आहत किया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार जमीनी सच्चाइयों से कट चुकी है।
धर्मेंद्र प्रधान ने यूजीसी कानून को लेकर उठ रहे सवालों और विरोध को जिस हल्के और हठधर्मी अंदाज़ में खारिज किया, उसने यह संदेश दिया कि सरकार को न तो प्रभावित समुदायों की पीड़ा से कोई सरोकार है और न ही लोकतांत्रिक असहमति का सम्मान। यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि सत्ता की मानसिकता का प्रतिबिंब है—जहां आलोचना को दबाना ही समाधान मान लिया गया है।
हठधर्मिता बनाम संवाद
मंत्री का यह कहना कि “कानून सभी के हित में है” और “भ्रम फैलाया जा रहा है”, उन हजारों शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की चिंताओं का अपमान है जो इस कानून के चलते असुरक्षा और भय के माहौल में जी रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि कानून किसने बनाया, सवाल यह है कि क्या उसे बनाने से पहले समाज के हर वर्ग की आवाज़ सुनी गई?
मुकदमे और भय का माहौल
इस एक्ट के तहत अब तक जिन मामलों में मुकदमे दर्ज हुए हैं, वे इस बात की गवाही देते हैं कि कानून का इस्तेमाल सुधार के लिए नहीं, बल्कि डर पैदा करने के औज़ार के रूप में किया जा रहा है। कई मामलों में अकादमिक असहमति को “अपराध” की श्रेणी में डाल दिया गया है। यह विश्वविद्यालयों को ज्ञान के केंद्र से नियंत्रण के केंद्र में बदलने की खतरनाक कोशिश है।
शिक्षाविदों का कहना है कि जिन मामलों में एफआईआर और नोटिस जारी हुए हैं, वे संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला हैं। इसके बावजूद मंत्री का संवेदनहीन रवैया यह दिखाता है कि सरकार को न तो भविष्य की पीढ़ी की चिंता है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों की।
सत्ता का अहंकार और टूटता विश्वास
धर्मेंद्र प्रधान का बयान इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार अब संवाद नहीं, आदेश की भाषा बोल रही है। यह वही अहंकार है जिसने पहले भी कई जनविरोधी फैसलों को जन्म दिया और आज उसी राह पर यूजीसी को लेकर सरकार आगे बढ़ती दिख रही है।
यदि यही रवैया जारी रहा, तो यह कानून शिक्षा सुधार का नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन और अविश्वास का प्रतीक बन जाएगा। इतिहास गवाह है—जब सत्ता संवेदना खो देती है, तब उसका पतन निश्चित हो जाता है।










