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झटकों के बीच भाजपा की चुप्पी पर उठे सवाल, बढ़ी सियासी तपिश

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नई दिल्ली, 3 मार्च, (एजेंसियां)। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नई दिशा-निर्देशावली को लेकर उपजा विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रूप ले चुका है।  भारत का उच्चतम न्यायालय द्वारा इस दिशा-निर्देशावली पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद भी देशभर में इसकी गूंज सुनाई दे रही है। विपक्ष इसे केंद्र सरकार की बड़ी नीतिगत चूक बता रहा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर खुलकर स्पष्टीकरण देने से बचती नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी की ओर से भी अब तक कोई प्रत्यक्ष वक्तव्य न आने से राजनीतिक हलकों में चर्चा और तेज हो गई है। दिशा-निर्देशावली सामने आते ही समाज के विभिन्न वर्गों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। सवर्ण समाज के कुछ संगठनों ने इसे अपने अधिकारों के विपरीत बताया, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बताते हुए लागू करने की मांग की। मामला बढ़ते-बढ़ते न्यायालय पहुंचा और अंततः भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। न्यायालय की इस कार्रवाई ने राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया।

भारतीय जनता पार्टी के लिए स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उसका समर्थन आधार विभिन्न सामाजिक वर्गों में फैला हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ स्पष्ट रूप से खड़े होने से दूसरे वर्ग की नाराजगी बढ़ सकती है। पार्टी की रणनीति फिलहाल संतुलन साधने की प्रतीत हो रही है, किंतु इसी संतुलन को विपक्ष “अस्पष्ट रुख” और “चुप्पी” का नाम दे रहा है।

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इस विवाद का प्रभाव हालिया चुनाव परिणामों में भी दिखाई दिया है। Jharkhand में संपन्न नगर निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी समर्थित प्रत्याशियों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यद्यपि ये चुनाव औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं थे, फिर भी सभी प्रमुख दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के समर्थन में व्यापक प्रचार किया। पार्टी के कई राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने जिलों में प्रवास किया, लेकिन परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे। नौ में से केवल तीन महापौर पद पर ही पार्टी समर्थित प्रत्याशी विजयी हो सके। इसी प्रकार Patna University छात्रसंघ चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई को झटका लगा। कांग्रेस की छात्र इकाई National Students’ Union of India ने अध्यक्ष और महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर विजय प्राप्त की। कई दशकों बाद अध्यक्ष पद पर इस छात्र संगठन की वापसी को कांग्रेस ने वैचारिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया। छात्र राजनीति को अक्सर भविष्य की मुख्यधारा राजनीति का संकेतक माना जाता है, इसलिए इन परिणामों को गंभीर संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की चुप्पी पर विपक्ष लगातार प्रश्न उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि जब देश का सर्वोच्च न्यायालय दिशा-निर्देशावली पर रोक लगा चुका है और देशभर में इस पर चर्चा चल रही है, तब सरकार को अपना स्पष्ट पक्ष सामने रखना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी की ओर से यह कहा जा रहा है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए सार्वजनिक वक्तव्य देना उचित नहीं होगा। किंतु राजनीतिक दृष्टि से यह चुप्पी विपक्ष को आक्रामक रुख अपनाने का अवसर दे रही है।

विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान बनाए रखना है, तो दूसरी ओर अपने समर्थन आधार को आश्वस्त भी करना है। यदि पार्टी समय रहते व्यापक संवाद स्थापित नहीं करती, तो विरोधी दल इस मुद्दे को सामाजिक असंतोष के प्रतीक के रूप में स्थापित करने का प्रयास करेंगे।

स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की यह दिशा-निर्देशावली अब केवल शैक्षणिक नीति का विषय नहीं रह गई है। यह सामाजिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और अवसरों की समानता जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़ चुकी है। ऐसे में इसका राजनीतिक प्रभाव दूरगामी हो सकता है। लगातार मिल रहे चुनावी झटकों के बीच भारतीय जनता पार्टी किस प्रकार अपनी रणनीति में संशोधन करती है और किस तरह जनता के बीच विश्वास बहाल करने का प्रयास करती है, यही आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करेगा।

यूजीसी लाते ही भाजपा को पहला झटका

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