Advertisement
Home National Sanjay Raut का ‘बड़बोलापन’ या कूटनीतिक समझ?

Sanjay Raut का ‘बड़बोलापन’ या कूटनीतिक समझ?

0
50

मोदी पर ‘ट्रंप की गुलामी’ वाले तंज से उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली, 3 मार्च, भृगु नागर।  राष्ट्रपति भवन में Chakravarti Rajagopalachari की प्रतिमा के अनावरण के बाद शुरू हुआ राजनीतिक बयानबाज़ी का सिलसिला अब नई दिशा ले चुका है। Shiv Sena (UBT) के सांसद Sanjay Raut ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि यदि सरकार ‘गुलामी’ के खिलाफ है तो वह Donald Trump और अमेरिका के साथ रिश्ते क्यों निभा रही है। राउत ने यहां तक कहा कि अगर गुलामी से इतनी ही नफरत है तो भारत-अमेरिका व्यापार समझौता रद्द कर देना चाहिए और फ्रांस से राफेल क्यों खरीदा गया।

राउत का यह बयान राजनीतिक सुर्खियों में जरूर आया, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह गंभीर कूटनीतिक समझ का परिणाम है या फिर महज़ तात्कालिक राजनीतिक बयानबाज़ी? अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल भावनात्मक नारों से नहीं चलते; वे राष्ट्रीय हित, सामरिक संतुलन और आर्थिक आवश्यकताओं पर आधारित होते हैं। ऐसे में किसी भी व्यापार समझौते या रक्षा सौदे को ‘गुलामी’ की संज्ञा देना क्या उचित विश्लेषण है या राजनीतिक अतिशयोक्ति?

Advertisment

Narendra Modi के नेतृत्व में भारत ने पिछले वर्षों में अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियां मजबूत की हैं। रक्षा सौदों से लेकर प्रौद्योगिकी सहयोग तक, यह नीति बहुध्रुवीय कूटनीति की ओर इशारा करती है। फ्रांस से राफेल खरीद को लेकर पहले भी विपक्ष ने सवाल उठाए, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की प्रक्रियाओं के बाद वह मुद्दा कानूनी रूप से टिक नहीं पाया। ऐसे में फिर से उसी विषय को ‘गुलामी’ के फ्रेम में पेश करना क्या एक परखा हुआ राजनीतिक हथियार दोहराने जैसा नहीं है?

राउत का तर्क यह है कि औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध कदम उठाने का दावा करने वाली सरकार पश्चिमी देशों से करीबी संबंध क्यों रखती है। लेकिन क्या आधुनिक वैश्विक कूटनीति को औपनिवेशिक संदर्भ में ही देखना उचित है? आज की दुनिया परस्पर निर्भरता पर आधारित है। व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को दासता कहना क्या वैश्विक राजनीति की जटिलताओं को नजरअंदाज करना नहीं है?

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस मंच से यह टिप्पणी आई, वह प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम था। राष्ट्रपति भवन में Chakravarti Rajagopalachari की प्रतिमा स्थापित करना औपनिवेशिक प्रतीकों के स्थान पर भारतीय व्यक्तित्वों को सम्मान देने की पहल के रूप में देखा गया। इसी क्रम में वास्तुकार Edwin Lutyens की प्रतिमा हटाए जाने पर उनके वंशज Matt Ridley ने भी प्रतिक्रिया दी। सरकार ने इसे औपनिवेशिक अवशेषों से मुक्ति का कदम बताया। ऐसे अवसर पर विदेश नीति को ‘गुलामी’ के आरोपों से जोड़ना क्या मुद्दे को भटकाने जैसा नहीं है?

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि राउत की बयान शैली अक्सर तीखी और उत्तेजक रही है। महाराष्ट्र की राजनीति में भी उनके कई बयानों ने विवाद खड़े किए। सवाल यह उठता है कि क्या यह रणनीतिक आक्रामकता है या फिर बड़बोलापन, जिसने समय-समय पर उनकी पार्टी को असहज स्थिति में डाला? Uddhav Thackeray के नेतृत्व वाले गुट की राजनीतिक चुनौतियों के बीच ऐसे बयान क्या संगठन को वैचारिक मजबूती देते हैं या केवल सुर्खियां?

विदेश नीति पर बहस लोकतंत्र का हिस्सा है। किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचना होना स्वाभाविक है। लेकिन आलोचना और अतिशयोक्ति के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि हर सामरिक साझेदारी को ‘गुलामी’ कहा जाए तो क्या भारत की स्वायत्त विदेश नीति की अवधारणा को ही कमजोर नहीं किया जाएगा? भारत आज क्वाड, जी-20 और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रिय है। ऐसे में एकतरफा शब्दावली से जटिल संबंधों को परिभाषित करना क्या राजनीतिक सरलीकरण नहीं है?

यह भी विचारणीय है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते केवल एक पक्ष के दबाव में नहीं होते। वे लंबी वार्ताओं, आर्थिक गणनाओं और रणनीतिक संतुलन के बाद तय होते हैं। भारत-अमेरिका संबंधों में मतभेद भी रहे हैं—चाहे वह वीज़ा नीति हो या व्यापार शुल्क। फिर भी दोनों देश सहयोग के क्षेत्र तलाशते रहे हैं। ऐसे में इसे ‘गुलामी’ कहना क्या कूटनीतिक वास्तविकताओं से परे भावनात्मक विमर्श नहीं है?

अंततः यह विवाद केवल एक बयान का नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद की गुणवत्ता का प्रश्न है। क्या विपक्ष को सरकार की नीतियों की आलोचना तथ्यों और वैकल्पिक दृष्टिकोण के आधार पर करनी चाहिए, या फिर तीखे नारों से बहस को धार देनी चाहिए? राउत के तंज ने बहस तो छेड़ी है, लेकिन इससे अधिक यह प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति की समझ का प्रतीक है या फिर सुर्खियों के लिए किया गया प्रहार?

राजनीति में शब्दों की ताकत होती है। वे समर्थकों को ऊर्जा दे सकते हैं, परंतु अतिरेक कभी-कभी विश्वसनीयता को भी क्षति पहुंचा सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बयानबाज़ी विपक्षी रणनीति का हिस्सा बनती है या फिर केवल एक और विवादित टिप्पणी बनकर रह जाती है।

लेखक- भृगु नागर 

परिचय-भृगु नागर वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दो दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव है। फ्रंट पेज संपादन, राजनीतिक विश्लेषण, राज्य स्तरीय रिपोर्टिंग और न्यूज़रूम प्रबंधन उनकी विशेष पहचान है। उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और चुनावी परिदृश्य पर उनकी पकड़ गहरी और तथ्यपरक मानी जाती है। विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में राज्य संवाददाता, पेज वन एडिटर और डेस्क इंचार्ज के रूप में उन्होंने प्रभावशाली भूमिका निभाई है। डिजिटल न्यूज़ ऑपरेशन और ऑनलाइन एडिशन संचालन में भी उनका अनुभव मजबूत है। तेज, सटीक और प्रभावी हेडलाइन निर्माण उनकी विशिष्ट क्षमता है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में दक्षता के साथ वे अनुवाद और विश्लेषण में भी निपुण हैं। जमीनी रिपोर्टिंग से लेकर संपादकीय नेतृत्व तक उनका सफर प्रतिबद्ध पत्रकारिता का उदाहरण है। निष्पक्षता, साहस और जनहित उनके लेखन की मूल भावना है। वर्तमान में वे लखनऊ से सक्रिय पत्रकारिता और वैचारिक लेखन में संलग्न हैं।
ई मेल- satyasanatanjan@gmail.com
सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here