सनातन परंपरा के त्रुटिहीन संरक्षक आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में पूरे भारत में चार मठों की स्थापना कर हिन्दू समाज को एक सूत्र में बाँधा था। वैदिक धर्म के परिष्कारक के रूप में उन्हें हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने का श्रेय भी दिया जाता है। आदि शंकराचार्य के द्वारा स्थापित इन चार पीठों में वर्तमान में जिन चार शंकराचार्यों ने अभिषेक ग्रहण किया है, वे न केवल चारों वेदों के संरक्षक हैं, बल्कि आदि शंकराचार्य की विचारधारा और विरासत को भी आगे बढ़ाते हैं। शंकराचार्य पद हिंदू धर्म में सर्वोच्च धार्मिक गुरु का पद है और आधुनिक युग में ये मार्गदर्शक माने जाते हैं। इस पद पर रह कर शंकराचार्य अपने अनुयायियों को धर्म के प्रति जागरूक करते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक फैसलों में इनकी सलाह को भी प्रमुखता मिलती है।
इतिहास में २०१४ के धर्म संसद सम्मेलन में साईं बाबा की मूर्ति विवाद पर शंकराचार्य एकमत होकर सामने आए थे। उस अगस्त २०१४ में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम में बसे धाम परिषद की धर्म संसद में काशी विद्वत परिषद ने निर्विवाद रूप से निर्णय लिया कि “साईं बाबा न भगवान हैं और न ही गुरु, इसलिए उनकी पूजा नहीं हो सकती”। द्वारका पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा कि अब मंदिरों में साईं की पूजा नहीं होगी और भविष्य में साईं के नाम से कोई मंदिर नहीं बनाया जाएगा। परिषद ने आगे स्पष्ट किया कि वेद-शास्त्रों के अनुसार अवतार की संज्ञा के योग्य केवल वही हैं जो अपनी इच्छा से अवतार लेते हैं, जबकि साईं को अपने जन्म-दिवस का भी पता नहीं था, अतः उन्हें परमात्मा मानना शास्त्र सम्मत नहीं। इस ऐतिहासिक फैसले में देश भर से आए साधु-संतों और महामंडलेश्वरों ने साथ दिया था।
इसी तरह की एकता की मिसाल हाल ही में जनवरी २०२५ में महाकुंभ मेले में भी देखने को मिली। प्रयागराज महाकुंभ के दौरान श्री बद्रीकाशी शारदा पीठ (श्रृंगेरी) के शंकराचार्य स्वामी विधुशेखर भारती, द्वारका शारदा पीठ के स्वामी सदानंद सरस्वती और ज्योतिर्मठ उत्तराखंड के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक मंच पर एकत्रित हुए और उन्होंने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए २७ बिंदुओं वाला संयुक्त धर्मादेश जारी किया। इस धर्मादेश में देश की एकता-अखंडता, सामाजिक समरसता तथा गाय व परिवार जैसे संस्थानों की रक्षा पर विशेष जोर दिया गया। शंकराचार्यों ने भाषणों में भक्ति-संस्कार और हिन्दू शिक्षाओं को बढ़ावा देने की पहल की। इस तरह के सामूहिक धर्मसभा ने दिखा दिया कि जब वे मिलकर रणनीति तैयार करते हैं तो उसके परिणाम व्यापक असर छोड़ते हैं।
इन्हीं उदाहरणों से प्रेरणा लेकर वर्तमान में भी सभी शंकराचार्यों से अपेक्षा है कि वे अपने मतभेद भूलकर नियमित मिलें और धर्म की प्रासंगिक चर्चा करें। मासिक स्तर पर मिलकर अगर वे महत्वपूर्ण निर्णय लें और सनातन धर्म की रक्षा हेतु गंभीर पहल करें तो हिंदू समाज को उनका महत्व और स्पष्ट रूप से समझ आएगा। शंकराचार्य न सिर्फ संन्यासी और विद्वान होते हैं, बल्कि आधुनिक युग में सनातन धर्म के पथप्रदर्शक भी हैं। उनकी साझा घोषणाएँ और निर्देश धर्मप्रेमियों के लिए आदर्श बनते हैं और अनुयायियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाते हैं।










