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शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों करनी चाहिए ? जाने, शास्त्र मत

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गवान शिव निराकार है और साकार भी। श्रद्धालु उनके मंदिर में पूजन-अर्चन करने जाते हैं, लेकिन अधिसंख्य भक्त यह नहीं जानते हैं कि वह जिन भोलेनाथ की शिवलिंग पर जल, दुग्ध या अन्य पवित्र सामग्री अर्पित कर रहे हैं और फिर वह ज्योतिर्लिंग की आधी परिक्रमा कर रहे हैं। वह आधी परिक्रमा क्यों कर रहे हैं? क्यों आधी ही परिक्रमा करनी चाहिए। शास्त्रों के इसके बारे क्या उल्लेख है? और क्यों आधी ही परिक्रमा करना श्रेयस्कर और फलदायक होता है? संत प्रवृत्ति के जनों के लिए यह विचारणीय बिंदु हैं। जिस आराध्य का आप पूजन अर्चन करने जा रहे हैं, वह कैसे प्रसन्न होंगे? यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि हमारे पूजन में कोई त्रुटि तो नहीं है।

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किसी  परिस्थितियों में भूलवश सोमसूत्र को लांघ लिया जाता है,सोमसूत्र यानी वह स्थान जहां से शिवलिंग को अर्पित किया गया जल निकलता है। बहरहाल सोमसूत्र लांघने में तब तप पाप नहीं लगता है, जब सोम सूत्र तृण, काष्ठ, पत्ता या पत्थर से ढका होता है। हालांकि एक बात महत्वपूर्ण है कि सूत्र लांघना नहीं चाहिए, आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए? कैसे करनी चाहिए, यह हम आपको लेख में बताने जा रहे हैं।

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 शिवलिंग को ज्योति रूप माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए कि शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं।

शास्त्र वचन

अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।

 

हम आपको बताते है कि सोमसूत्र क्या है? क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र?

शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है।

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सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। वास्तव में देखा जाये तो सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है, अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और पांच अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

अब हम आपको बताते है कि सोम सूत्र कब लांघ सकते हैं ?

शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,

लेकिन
शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

कैसे करें शिवलिंग की परिक्रमा करे

भगवान की शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें। यह परिक्रमा का विधान शास्त्रों के अनुसार धर्मं संगत माना जाता है।

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