नई दिल्ली, 29 जनवरी, (भृगु नागर)। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर रोक सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं है, यह केंद्र की नीति, नीयत और राजनीतिक समझ पर सीधा प्रश्नचिह्न है। 2012 के नियमों को बहाल कर अदालत ने साफ कर दिया कि “समानता” के नाम पर थोपे गए प्रयोग संवैधानिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते। सीजेआई की यह टिप्पणी कि देश को जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए, दरअसल उस संतुलन की याद दिलाती है जिसे केंद्र सरकार अपने जल्दबाजी भरे फैसलों में भूलती दिखी। अदालत का हस्तक्षेप यह भी बताता है कि यूजीसी जैसे संस्थानों को राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द—दोनों के लिए घातक हो सकता है।
मोदी सरकार ने यूजीसी के 2026 विनियमों को जिस तरह आगे बढ़ाया, उसने न केवल उच्च शिक्षा में अनावश्यक भ्रम पैदा किया, बल्कि उस सामाजिक वर्ग में भी गहरी बेचैनी पैदा की जो दशकों से भाजपा का स्थायी समर्थन आधार रहा है। सवर्ण समाज के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि “समानता” की आड़ में उन्हें लक्षित किया जा रहा है, जबकि वास्तविक उद्देश्य सामाजिक न्याय के बजाय राजनीतिक संदेशबाज़ी अधिक प्रतीत होती है। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इसी असंतोष को वैधानिक आवाज दी है। यह आदेश इस बात की तस्दीक है कि नीति निर्माण में संवेदनशीलता और व्यापक विमर्श के बिना उठाए गए कदम अंततः न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित करते हैं।
यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि क्या केंद्र सरकार ने अपने परंपरागत वोट बैंक की नब्ज़ को गलत पढ़ा। भाजपा की राजनीति लंबे समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक संतुलन के दावे पर टिकी रही है। मगर यूजीसी प्रकरण ने इस दावे को कमजोर किया है। विश्वविद्यालय परिसरों में कथित भेदभाव की परिभाषा को जिस तरह विस्तृत किया गया, उसने आरोप-प्रत्यारोप की ऐसी जमीन तैयार की, जहां संवाद के बजाय दंड और भय का माहौल बनने का खतरा था। अदालत की रोक ने इस संभावित टकराव को फिलहाल थाम लिया, लेकिन संदेश साफ है—नीतियां समाज को जोड़ें, बांटें नहीं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह प्रकरण भाजपा के लिए चेतावनी है। सवर्णों का भरोसा दरकने की चर्चा अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रही। जमीन पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच असहज सवाल उठ रहे हैं। क्या पार्टी अपनी वैचारिक पहचान से भटक रही है? क्या प्रशासनिक आदेशों के जरिए सामाजिक इंजीनियरिंग करना ही अब शासन का तरीका बन गया है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ये सवाल और तेज होंगे। यदि सरकार इसे “तकनीकी रोक” मानकर आगे बढ़ती है, तो नुकसान और गहरा हो सकता है।
मोदी सरकार के सामने अब भरपाई की चुनौती है। यह भरपाई भाषणों से नहीं, ठोस कदमों से होगी। सबसे पहले तो व्यापक परामर्श की संस्कृति लौटानी होगी। विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, छात्रों और सामाजिक समूहों के साथ ईमानदार संवाद जरूरी है। दूसरा, नीति का उद्देश्य स्पष्ट करना होगा—क्या लक्ष्य वास्तव में समान अवसर सुनिश्चित करना है या केवल प्रतीकात्मक राजनीतिक संकेत देना? तीसरा, संघीय ढांचे और स्वायत्त संस्थानों की गरिमा का सम्मान करना होगा, ताकि यूजीसी जैसे निकाय राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर काम कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। यदि पार्टी समय रहते संकेत नहीं समझती, तो नुकसान सिर्फ एक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा। उच्च शिक्षा के मुद्दे देश के भविष्य से जुड़े हैं। यहां लिया गया हर फैसला दूरगामी असर डालता है। न्यायालय ने 2012 के नियमों को लागू रखकर स्थिरता बहाल की है; अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह टकराव की राजनीति छोड़े या संतुलन की राह चुने।
अंततः यह प्रकरण याद दिलाता है कि लोकतंत्र में आखिरी कसौटी न्याय और संविधान है। सत्ता चाहे जितनी मजबूत हो, संवैधानिक विवेक से ऊपर नहीं। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने न केवल यूजीसी नियमों पर विराम लगाया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि सामाजिक समरसता के नाम पर किए गए अधकचरे प्रयोग जनता और संस्थानों—दोनों को असहज कर देते हैं। अगर मोदी सरकार इस संदेश को गंभीरता से लेती है, तो भरोसा लौट सकता है; यदि नहीं, तो यह दरार भविष्य की राजनीति में गहरी खाई बन सकती है।










