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आईआईटी छात्रों की संदिग्ध आत्महत्या: एफआईआर के सुप्रीम कोर्ट का आदेश

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नयी दिल्ली, 25 मार्च (एजेंसी)। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में 2023 में कथित जातिय भेदभाव के कारण दो छात्रों की संदिग्ध आत्महत्या मामले में मुकदमा दर्ज करने का सोमवार को दिल्ली पुलिस को आदेश दिया।

अदालत ने इसके साथ ही उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया।

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न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश पारित किया।

पीठ ने आईआईटी छात्रों -आयुष आशना और अनिल कुमार की मौत के मामले में दिल्ली पुलिस को एफआईआर यानी प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। इन छात्रों की कथित तौर पर आठ जुलाई, 2023 और एक सितंबर, 2023 को आत्महत्या करने मृत्यु हो गई थी।

इस मामले में उनके माता-पिता ने यहां आईआईटी दिल्ली में जाति आधारित भेदभाव का आरोप लगाया था।

पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा याचिका पर विचार करने से इनकार करने के खिलाफ दायर याचिका स्वीकार कर लिया। साथ ही, अदालत ने इस मामले में दिल्ली पुलिस को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हुए कहा,“भले ही पुलिस का मानना ​​​​था कि जो आरोप लगाया गया था उसमें सच्चाई का कोई तत्व नहीं था, वह प्राथमिकी दर्ज कर जांच करने के बाद ही ऐसा कह सकती थी। हम ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कानून है।”

शीर्ष अदालत ने इस मामले में आईआईटी दिल्ली प्रशासन को भी उनके कर्तव्यों की याद दिलाई और कहा,“किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना में, जैसे कि परिसर में होने वाली आत्महत्या, कॉलेज अधिकारियों का तुरंत एफआईआर दर्ज करना एक स्पष्ट कर्तव्य बन जाता है।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस पर भी बिना इनकार या देरी के एफआईआर दर्ज करके तत्परता और जिम्मेदारी के साथ काम करना समान रूप से आवश्यक है।

पीठ ने प्राथमिक दर्ज करने का आदेश देते हुए कहा,“यह एफआईआर न केवल पुलिस के लिए बल्कि अभिभावकों के लिए भी आंखें खोलने वाला है।”

पीठ ने इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि ये त्रासदियाँ विभिन्न कारकों से निपटने के लिए एक अधिक मजबूत, व्यापक और उत्तरदायी तंत्र की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं, जो कुछ छात्रों को अपनी जान लेने के लिए मजबूर करते हैं।

पीठ ने कहा,“अब समय आ गया है कि हम इस गंभीर मुद्दे का संज्ञान लें और छात्रों के बीच इस तरह के संकट में योगदान देने वाले अंतर्निहित कारणों को दूर करने और कम करने के लिए व्यापक और प्रभावी दिशानिर्देश तैयार करें।”

पीठ ने छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और ऐसे संस्थानों में आत्महत्याओं को रोकने के लिए शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया।

इस टास्क फोर्स में मनोचिकित्सक डॉ. आलोक सरीन, प्रोफेसर मैरी ई जॉन, अरमान अली, प्रोफेसर राजेंद्र काचरू, डॉ. अक्सा शेख, डॉ. सीमा मेहरोत्रा, प्रोफेसर वर्जिनियस ज़ाक्सा, डॉ. निधि एस. सब्बरवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट भी शामिल होंगे।

उच्च शिक्षा विभाग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और विधिक मामलों के विभाग के सचिवों को टास्क फोर्स का पदेन सदस्य बनाया गया है।

टास्क फोर्स को एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया है, जिसमें छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के प्रमुख कारणों की पहचान शामिल है। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के विभिन्न कारणों की जांच, जिसमें रैगिंग, जाति-आधारित भेदभाव, लिंग-आधारित भेदभाव, यौन उत्पीड़न, शैक्षणिक दबाव, वित्तीय बोझ, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कलंक, जातीयता, आदिवासी पहचान, विकलांगता, यौन अभिविन्यास, राजनीतिक विचार, धार्मिक विश्वास या किसी अन्य आधार पर भेदभाव शामिल है।

शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को उच्च शिक्षा विभाग में संयुक्त सचिव के पद से नीचे न होने वाले एक उच्च पदस्थ अधिकारी को नोडल अधिकारी के रूप में नामित करने का निर्देश दिया।

पीठ ने टास्क फोर्स को चार महीने की अवधि के भीतर एक अंतरिम रिपोर्ट और अंतिम रिपोर्ट और अधिमानतः आठ महीने के भीतर अंतिम रिपोर्ट देने का भी निर्देश दिया।

शीर्ष न्यायालय ने केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री द्वारा 2023 में राज्यसभा को दिए गए आंकड़ों पर भी गौर किया। उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2018 से उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कीं। इनमें 39 आईआईटी से, 25 एनआईटी से, 25 केंद्रीय विश्वविद्यालयों से, चार आईआईएम से, तीन आईआईएसईआर से और दो आईआईआईटी से थे‌।

एक अलग पीठ ‘अबेदा सलीम तड़वी और अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य’ के मामले में शैक्षणिक संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव के मुद्दे की जांच कर रही है।

शीर्ष अदालत के दबाव पर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2025 का मसौदा प्रकाशित किया है।

इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोककर सभी विद्यार्थियों, संकाय सदस्यों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित, समावेशी और न्यायसंगत शिक्षण वातावरण सुनिश्चित किया जाना है।

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