Trump on India: 68 अपाचे हेलीकॉप्टर और टैरिफ की धमकी—
वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 7 जनवरी (एजेंसियां)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ देश की आंतरिक वैचारिक बहस को भी तेज कर दिया है। ट्रंप ने जहां एक ओर भारत के साथ रक्षा सहयोग का हवाला देते हुए 68 अपाचे हेलीकॉप्टर सौदे का जिक्र किया, वहीं दूसरी ओर रूस से तेल खरीद को लेकर भारत को खुली धमकी भी दे डाली।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि उसकी विदेश नीति किसी दबाव के आगे नहीं झुकती और राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता सर्वोपरि है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की यह नाराजगी दरअसल उसी हिंदूवादी राष्ट्रवादी नीति का परिणाम है, जिसमें भारत अब किसी भी वैश्विक शक्ति के सामने झुकने को तैयार नहीं है।
“पीएम मोदी मुझसे खुश नहीं हैं”—ट्रंप का दावा
एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनसे मिलने के लिए समय मांगा था। ट्रंप ने इसे दोनों नेताओं के रिश्तों की मजबूती से जोड़ा, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि “मोदी जानते हैं कि इस वक्त मैं खुश नहीं हूं और मुझे खुश करना जरूरी है।”
इस बयान को लेकर भारत में सियासी हलचल तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह बयान कूटनीति कम, दबाव की राजनीति ज्यादा है। भारत ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि वह किसी देश को “खुश” करने के लिए अपनी नीतियां बदलेगा।
रूसी तेल और टैरिफ: दबाव की वही पुरानी रणनीति
ट्रंप की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदना है। ट्रंप ने साफ कहा कि जो देश रूस के साथ व्यापार करेंगे, उन्हें अमेरिका की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। इसी नीति के तहत पहले भी भारत पर 25% रेसिप्रोकल टैरिफ और 25% अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ लगाया गया था, जिससे कुछ भारतीय उत्पादों पर कुल टैक्स 50% तक पहुंच गया।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इन दबावों के बावजूद भारत ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया। भारत सरकार ने स्पष्ट कहा कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए गैर-परक्राम्य विषय है। यह वही बिंदु है जिसे हिंदूवादी और राष्ट्रवादी विचारधारा की वैचारिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
68 अपाचे हेलीकॉप्टर: सहयोग या सौदेबाज़ी?
ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि भारत लंबे समय से 68 अपाचे हेलीकॉप्टरों का इंतजार कर रहा था और अमेरिका “इसे बदल रहा है।” रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस सौदे को एक तरह के दबाव उपकरण के रूप में पेश कर रहे हैं।
भारत के दृष्टिकोण से यह सौदा किसी कृपा का परिणाम नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत और व्यावसायिक समझौते का हिस्सा है। भारत पहले भी साफ कर चुका है कि रक्षा खरीद को वह किसी देश की राजनीतिक शर्तों से नहीं जोड़ता।
हिंदू राष्ट्रवादी नीति बनाम वैश्विक दबाव
ट्रंप की धमकियों को हिंदूवादी राजनीति के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में स्पष्ट कर दिया है कि वह अब गुटनिरपेक्ष नहीं, बल्कि राष्ट्रहितपरक नीति पर चलता है।
चाहे रूस से तेल खरीद हो, या पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद अपने निर्णय पर टिके रहना—यह सब उसी वैचारिक बदलाव का संकेत है जिसमें भारत खुद को किसी “वैश्विक आदेश पालनकर्ता” की बजाय सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
चावल से लेकर व्यापार तक: ट्रंप की नाराजगी की सूची लंबी
रूस और टैरिफ के अलावा ट्रंप ने भारतीय चावल को लेकर भी आपत्ति जताई थी। एक राउंड टेबल बैठक में उन्होंने सवाल उठाया कि भारत को चावल पर छूट क्यों मिल रही है और चेतावनी दी कि भारत को भी टैरिफ देना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नाराजगी असल में भारत की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक स्वतंत्रता से उपजी है। अमेरिका अब भारत को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में देख रहा है, जो उसकी शर्तों पर नहीं चलता।
फोन कॉल और असली संदेश
गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप की यह बयानबाजी उस फोन कॉल के कुछ हफ्तों बाद आई है, जिसमें ट्रंप और पीएम मोदी ने टैरिफ तनाव के बावजूद व्यापार और सहयोग आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इससे साफ है कि सार्वजनिक मंच पर दी जा रही धमकियां दरअसल घरेलू अमेरिकी राजनीति और चुनावी बयानबाजी का हिस्सा भी हो सकती हैं।
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप की भारत को दी गई धमकी, चाहे वह अपाचे हेलीकॉप्टर हों या टैरिफ—असल में भारत की बदली हुई पहचान को स्वीकार न कर पाने की झुंझलाहट है। हिंदूवादी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण ने भारत को यह आत्मविश्वास दिया है कि वह अपनी सभ्यता, संप्रभुता और संसाधनों पर किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।
यह टकराव दिखाता है कि आज का भारत कमजोर राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने निर्णय स्वयं लेने वाला सभ्यतागत राज्य है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद भारत का अपने रुख पर कायम रहना, निस्संदेह राष्ट्रवादी विचारधारा की एक और निर्णायक जीत के रूप में देखा जा रहा है।










