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कलियुग की सबसे सरल साधना

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नाम जप कोई भारी साधना नहीं, बल्कि थके हुए मन का सहारा है। जब शब्द समाप्त हो जाते हैं, तब नाम अपने आप होठों पर आ जाता है। ईश्वर का नाम लेते ही भीतर कोई अनकही शांति उतरने लगती है। नाम जप मन को यह याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं। यह साधना नहीं, एक भरोसा है जो हर साँस के साथ चलता है। दुख में नाम पुकार बन जाता है और सुख में कृतज्ञता। नाम जप करते-करते मन धीरे-धीरे हल्का हो जाता है। इसमें न प्रदर्शन है, न दिखावा, बस भीतर की सच्ची पुकार। नाम जप से जीवन की गति नहीं रुकती, दृष्टि बदल जाती है। अंततः नाम ही वह दीप है, जो भीतर के अंधकार में जल उठता है। सनातन अर्थात शाश्वत धर्म की आत्मा यदि किसी एक साधना में प्रकट होती है, तो वह है नाम जप। हिंदू या सनातन धर्म में नाम जप केवल किसी शब्द या ध्वनि का बार‑बार उच्चारण नहीं है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के बीच सेतु है। यह वह साधना है जो युगों, जातियों, आश्रमों और परिस्थितियों से परे होकर हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपलब्ध है। वेदों से लेकर पुराणों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत और भक्ति आंदोलन तक नाम जप को सर्वोच्च साधन माना गया है। कलियुग में तो इसे मोक्ष का सबसे सरल, सुरक्षित और प्रभावी मार्ग कहा गया है।

सनातन परंपरा में यह मान्यता है कि ब्रह्मांड की रचना शब्द से हुई है। ऋग्वेद में ‘वाक्’ को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषद कहते हैं कि नाद से सृष्टि उत्पन्न हुई और उसी नाद में उसका लय होता है। ओंकार को समस्त मंत्रों का मूल माना गया। जब पूरा ब्रह्मांड ही ध्वनि और स्पंदन से बना है, तब ईश्वर के नाम का जप उस मूल स्पंदन से जुड़ने का माध्यम बन जाता है। नाम जप व्यक्ति को सीमित अहंकार से उठाकर व्यापक चेतना से जोड़ता है। नाम और नामी का अभेद सनातन दर्शन की एक गूढ़ अवधारणा है। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान का नाम स्वयं भगवान से अलग नहीं है। जैसे अग्नि और उसकी ऊष्मा अलग नहीं की जा सकती, वैसे ही ईश्वर और उसका नाम भी अभिन्न हैं। रामचरितमानस में तुलसीदास ने स्पष्ट कहा है कि राम नाम राम से भी बड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं कि नाम ईश्वर से श्रेष्ठ है, बल्कि यह कि कलियुग में नाम ही ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सुलभ स्वरूप है।

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नाम जप का महत्व इसलिए भी अद्वितीय है क्योंकि इसमें किसी विशेष योग्यता, धन, विद्या या शारीरिक क्षमता की आवश्यकता नहीं होती। न जटिल अनुष्ठान, न कठिन आसन, न ही लंबी साधना की बाध्यता। एक बालक, वृद्ध, गृहस्थ, संन्यासी, स्त्री, पुरुष, रोगी या स्वस्थ – सभी समान अधिकार से नाम जप कर सकते हैं। यही कारण है कि संतों ने इसे ‘सर्वसुलभ साधना’ कहा है। नाम जप के माध्यम से मन की चंचलता धीरे‑धीरे शांत होने लगती है। मानव मन स्वभाव से ही भटकने वाला है। वह भूत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं में उलझा रहता है। नाम जप मन को एक केंद्र प्रदान करता है। जब जीभ नाम का उच्चारण करती है, कान उसे सुनते हैं और मन उसमें रमता है, तब चेतना वर्तमान क्षण में स्थिर होने लगती है। यही ध्यान की प्रारंभिक अवस्था है।

आध्यात्मिक दृष्टि से नाम जप आत्मशुद्धि का साधन है। सनातन धर्म में माना गया है कि जीव अनेक जन्मों के संस्कारों के कारण बंधन में है। ये संस्कार मन पर वासनाओं और प्रवृत्तियों के रूप में छपे रहते हैं। नाम जप अग्नि के समान है जो इन संस्कारों को धीरे‑धीरे भस्म करता है। जिस प्रकार साबुन मैल को हटाता है, उसी प्रकार नाम जप चित्त की अशुद्धियों को साफ करता है। नाम जप का प्रभाव केवल आध्यात्मिक ही नहीं, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी पड़ता है। निरंतर नाम स्मरण करने वाला व्यक्ति धीरे‑धीरे भय, चिंता, क्रोध और अवसाद से मुक्त होने लगता है। नाम में एक अद्भुत सांत्वना शक्ति होती है। संकट, रोग, शोक या अकेलेपन में नाम जप मन को सहारा देता है। यही कारण है कि भारत की लोक परंपरा में दुख के समय लोग स्वतः ईश्वर का नाम लेने लगते हैं।

सनातन धर्म में यह भी माना गया है कि नाम जप कर्मों के प्रभाव को कम करता है। कर्म सिद्धांत के अनुसार हर कर्म का फल निश्चित है, लेकिन शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर की कृपा से कर्मों की तीव्रता को बदला जा सकता है। नाम जप उस कृपा को आकर्षित करता है। यह व्यक्ति को कर्मों के बंधन से मुक्त करने की दिशा में ले जाता है। भक्ति आंदोलन ने नाम जप को जन‑जन तक पहुंचाया। संत कबीर, मीरा, नामदेव, चैतन्य महाप्रभु, सूरदास, तुलसीदास – सभी ने नाम की महिमा गाई। चैतन्य महाप्रभु ने हरि नाम संकीर्तन को कलियुग का धर्म बताया। उनके अनुसार सामूहिक रूप से नाम का उच्चारण करने से समाज की चेतना शुद्ध होती है और प्रेम, करुणा तथा समानता का विकास होता है।

नाम जप का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह अहंकार को गलाता है। जब साधक बार‑बार ईश्वर का नाम लेता है, तो उसे यह अनुभूति होने लगती है कि वह स्वयं सर्वेसर्वा नहीं है। जीवन में जो कुछ भी है, वह किसी उच्च सत्ता की कृपा से है। यह भावना विनम्रता को जन्म देती है। विनम्रता ही आध्यात्मिक प्रगति की आधारशिला है। सनातन धर्म में विभिन्न देवताओं के नाम जप की परंपरा है – राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, नारायण, दुर्गा, काली, हनुमान, गणेश। रूप और नाम भिन्न‑भिन्न हो सकते हैं, लेकिन तत्व एक ही है। शास्त्र कहते हैं कि सभी नाम उसी एक ब्रह्म की ओर ले जाते हैं। साधक अपनी श्रद्धा और संस्कार के अनुसार किसी भी नाम को चुन सकता है।

नाम जप से जीवन में अनुशासन आता है। जब व्यक्ति प्रतिदिन निश्चित समय पर नाम स्मरण करता है, तो उसके जीवन में नियमितता और संयम विकसित होता है। यह साधना धीरे‑धीरे आहार, व्यवहार और विचार तक को शुद्ध करती है। व्यक्ति असत्य, हिंसा और अनैतिकता से दूर होने लगता है, क्योंकि उसका अंतर्मन जाग्रत हो जाता है।

कलियुग की विशेषता यह है कि मनुष्य व्यस्त, तनावग्रस्त और विचलित है। उसके पास न तो लंबी तपस्या का समय है और न ही जटिल साधनाओं की क्षमता। इसी कारण शास्त्रों ने कहा है कि कलियुग में केवल नाम जप से ही उद्धार संभव है। भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि हरि नाम का स्मरण करने मात्र से जीव भवसागर से पार हो सकता है। नाम जप सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को भीतर से शांत बनाता है, और शांत व्यक्ति ही शांत समाज की रचना कर सकता है। जब व्यक्ति के भीतर करुणा और प्रेम जाग्रत होता है, तो उसका व्यवहार भी मानवीय बनता है। इस प्रकार नाम जप केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण का भी माध्यम है।

अंततः नाम जप जीवन को अर्थ देता है। यह व्यक्ति को यह स्मरण कराता है कि जीवन केवल भोग, संग्रह और प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं है, बल्कि आत्मिक उन्नति के लिए है। नाम जप करते‑करते साधक को यह अनुभूति होती है कि ईश्वर दूर कहीं नहीं, बल्कि उसके हृदय में ही निवास करता है। यही अनुभूति सनातन धर्म का परम लक्ष्य है। इस प्रकार नाम जप हिंदू या सनातन धर्म की वह धुरी है जिस पर संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन घूमता है। यह साधना सरल भी है, गहन भी; व्यक्तिगत भी है और सार्वभौमिक भी। नाम जप से मन शुद्ध होता है, बुद्धि निर्मल होती है, हृदय में भक्ति का संचार होता है और अंततः आत्मा अपने परम स्रोत से एकाकार होने की दिशा में अग्रसर होती है।

श्रीमद्भागवत पुराण (12.3.51)

कलौ दोषनिधे राजन्

अस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य
मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥

अर्थ
हे राजन्! कलियुग दोषों का भंडार है,
पर इसमें एक महान गुण है —
केवल श्रीकृष्ण के नाम कीर्तन से
मनुष्य बंधनों से मुक्त होकर
परम गति (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।

बृहन्नारदीय पुराण

श्लोकहरिर्नाम हरिर्नाम
हरिर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा॥

अर्थ
कलियुग में केवल और केवल हरि का नाम ही साधन है।
इसके अतिरिक्त
न कोई मार्ग है,
न कोई मार्ग है,
और न ही कोई अन्य मार्ग है।

विष्णु पुराण (6.2.17)

कृते यद् ध्यायतो विष्णुं

त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां
कलौ तद् हरिकीर्तनात्॥

अर्थ
सतयुग में ध्यान से,
त्रेता में यज्ञ से,
द्वापर में विधिवत पूजा से
जो फल मिलता है,
वही फल कलियुग में हरि-नाम कीर्तन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

पद्म पुराण

श्लोकनाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः।

पूर्णः शुद्धो नित्य मुक्तो
ऽभिन्नत्वान् नामनामिनोः॥

अर्थ
भगवान का नाम
चिंतामणि के समान है।
वह पूर्ण, शुद्ध, नित्य और मुक्त है,
क्योंकि नाम और नामी (भगवान) में कोई भेद नहीं

गरुड़ पुराण

अघं धुन्वन्ति कर्णेन

नीहारमिव भास्करः।
कीर्तयन्ति ये हरिं
तेषां न स्यात् पराभवः॥

अर्थ
जैसे सूर्य कोहरे को नष्ट कर देता है,
वैसे ही हरि का नाम
कानों में पड़ते ही पापों का नाश कर देता है।
जो हरि का कीर्तन करते हैं,
उनका कभी पतन नहीं होता।

महाभारत, अनुशासन पर्व: नाम जप को महामंत्र कहा गया है।

रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।

सहस्रनाम तत्तुल्यं
रामनाम वरानने॥

अर्थ
हे सुंदर मुख वाली!
मैं राम-राम कहकर उसी में रम जाता हूँ।
राम नाम का एक बार जप
हजार नामों के जप के समान फल देता है।

नारद भक्ति सूत्र (72)

नामस्मरणात् मुक्तिः।

अर्थ
नाम-स्मरण से ही मुक्ति है।

रामचरितमानस (कलियुग वर्णन)

कलियुग केवल नाम अधारा।

सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा॥

अर्थ
कलियुग में केवल नाम ही आधार है।
नाम का स्मरण करते-करते
मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

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