—मोदी सरकार की मंशा पर क्यों उठे सवाल?
नई दिल्ली, 20 फरवरी (भृगु नागर)। देश में जब भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़ा कोई बड़ा नियम आता है, उसका असर केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संतुलन और राजनीतिक नीयत तक पर प्रश्न खड़े करता है। हालिया यूजीसी नियम भी कुछ ऐसा ही साबित हुआ। सरकार इसे शैक्षिक सुधार बताने में लगी रही, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इस नियम को देखकर एक सामान्य सवर्ण नागरिक के मन में यह धारणा बनी कि यह व्यवस्था सवर्णों पर अप्रत्यक्ष अत्याचार की छूट देने जैसी है। यही कारण है कि इस नियम के विरुद्ध व्यापक आक्रोश देखने को मिला और अंततः उच्चतम न्यायालय को भी तत्काल प्रभाव से इस पर रोक लगानी पड़ी।
उच्चतम न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक अपने आप में यह संकेत थी कि नियम में गंभीर संवैधानिक और सामाजिक प्रश्न निहित हैं। सामान्यतः ऐसी स्थिति में सरकार पुनर्विचार करती है, संवाद की पहल करती है या स्पष्टीकरण जारी करती है। किंतु यहां आश्चर्यजनक रूप से केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट आत्ममंथन के संकेत नहीं दिखे। यही वह बिंदु है, जहां से नरेंद्र मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठने लगे। प्रधानमंत्री की चुप्पी को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना गया, बल्कि इसे एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाने लगा।
सवर्ण समाज में पहले से ही यह भावना रही है कि नीतिगत स्तर पर उसकी आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। शिक्षा, नियुक्ति और पदोन्नति जैसे क्षेत्रों में अवसरों की समानता को लेकर असंतोष पहले से मौजूद है। ऐसे में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसा संस्थान ऐसा नियम लेकर आता है, जिसे कई लोग योग्यता के सिद्धांत के विरुद्ध मानते हैं, तो असंतोष स्वाभाविक है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस नियम के सामाजिक प्रभावों का पूर्व आकलन किया गया था, या इसे केवल प्रशासनिक औपचारिकता समझकर लागू करने की कोशिश की गई?
इस पूरे विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का वक्तव्य भी चर्चा का विषय बना। संघ से सामान्यतः अपेक्षा की जाती है कि वह समाज के सभी वर्गों के बीच संतुलन और समरसता की बात करेगा। किंतु यूजीसी प्रकरण पर उनका बयान कई सवर्णों को संतोष देने के बजाय उपदेशात्मक प्रतीत हुआ। जब समाज का एक वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा हो, तब केवल समरसता और ऐतिहासिक दृष्टि की बात करना उसके घावों पर मरहम के बजाय नमक जैसा प्रतीत हो सकता है। यही कारण है कि संघ प्रमुख के वक्तव्य को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया गया।
केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों की प्रतिक्रियाएं भी स्थिति को शांत करने के बजाय और उलझाने वाली रहीं। विरोध को पिछड़ी सोच बताना या इसे सुधार-विरोधी मानसिकता कहना, संवाद के द्वार खोलने के बजाय उन्हें और संकीर्ण करता है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि सरकार सवर्ण समाज की भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें नजरअंदाज कर रही है।
यह प्रश्न अब केवल एक नियम तक सीमित नहीं है। यह भरोसे का प्रश्न बन चुका है। क्या सरकार सामाजिक संतुलन को साधने में विफल हो रही है, या फिर वह किसी व्यापक राजनीतिक गणना के तहत आगे बढ़ रही है? क्या यह मान लिया गया है कि असंतोष के बावजूद राजनीतिक समीकरण प्रभावित नहीं होंगे? यदि ऐसा है, तो यह आकलन भविष्य में भारी पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री की भूमिका ऐसे समय में निर्णायक होती है। एक स्पष्ट वक्तव्य, संवाद का आश्वासन या नियम पर पुनर्विचार की घोषणा, स्थिति को शांत कर सकती थी। किंतु मौन ने संदेह को और गहरा कर दिया। लोकतंत्र में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविकता। यदि समाज का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगे कि उसके साथ न्याय नहीं हो रहा, तो यह केवल सामाजिक तनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता का कारण भी बन सकता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस नियम ने शिक्षा से अधिक राजनीति और समाज को प्रभावित किया है। उच्चतम न्यायालय की रोक ने कानूनी स्तर पर राहत दी है, परंतु सामाजिक स्तर पर जो अविश्वास पैदा हुआ है, वह अभी भी बना हुआ है। यदि सरकार इस अविश्वास को दूर करने के लिए पहल नहीं करती, तो यह विवाद आने वाले समय में और व्यापक रूप ले सकता है। सवाल नियम का नहीं, विश्वास का है—और विश्वास एक बार टूट जाए, तो उसे पुनः स्थापित करना सबसे कठिन कार्य होता है।










