देवगुरु बृहस्पति, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की त्रैध उपासना
गुरुवार का व्रत सनातन धर्म में ज्ञान, सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति के लिए अमोघ माना गया है । यह दिन मुख्य रूप से देवगुरु बृहस्पति और जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है, किंतु शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार विष्णु और लक्ष्मी एक-दूसरे के पूरक हैं, इसलिए इस दिन लक्ष्मी-नारायण की संयुक्त पूजा का भी विशेष फल है । ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को भाग्य, धर्म, और वैवाहिक सुख का कारक माना जाता है ।
गुरुवार का व्रत न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह आत्मिक अनुशासन का मार्ग है। यदि श्रद्धा और नियमों (जैसे नमक त्याग और पीला भोजन) के साथ इसे संपन्न किया जाए, तो यह जीवन को दरिद्रता से मुक्त कर ईश्वर की अनंत कृपा का पात्र बनाता है।
इस रिपोर्ट में गुरुवार के तीन प्रमुख व्रतों की विस्तृत प्रक्रिया, उनकी अवधि और दिनचर्या का क्रमवार विवरण प्रस्तुत है।
गुरुवार व्रत के सामान्य नियम और अवधि
तीनों प्रकार के व्रतों के लिए कुछ आधारभूत नियम और समयावधि समान होती है:
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व्रत की संख्या: सामान्यतः मनोकामना पूर्ति के लिए 16 गुरुवार के व्रत रखना सबसे शुभ माना जाता है, जिसके बाद 17वें गुरुवार को उद्यापन किया जाता है । साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार 1, 3, 5, 7, 9 वर्ष या आजीवन व्रत का संकल्प भी ले सकते हैं ।
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प्रारंभ काल: किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से व्रत प्रारंभ करना चाहिए । यदि उस दिन ‘अनुराधा नक्षत्र’ हो, तो यह अत्यंत फलदायी होता है ।
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वर्जित समय: ‘पौष मास’ (दिसंबर-जनवरी) में नया व्रत प्रारंभ करना या उद्यापन करना वर्जित है ।
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निषेध: इस दिन बाल धोना, दाढ़ी बनवाना, नाखून काटना, घर में पोछा लगाना और कपड़े धोना (साबुन का प्रयोग) पूरी तरह वर्जित है ।
1. देवगुरु बृहस्पति व्रत प्रक्रिया (ज्ञान, बुद्धि और विवाह हेतु)
यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो शिक्षा में सफलता, बुद्धि का विकास या विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करना चाहते हैं ।
सुबह से शाम की दिनचर्या
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प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त): सूर्योदय से पूर्व जागें। स्नान के जल में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करें । साफ़ पीले वस्त्र धारण करें ।
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पूजन विधि: उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में मुख करके बैठें । एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर बृहस्पति देव का चित्र या यंत्र स्थापित करें ।
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विशेष केले की पूजा: गुरुवार व्रत में केले के वृक्ष की पूजा अनिवार्य है । केले की जड़ में हल्दी युक्त जल चढ़ाएं 。 वहां घी का दीपक जलाएं और मुनक्का, चने की दाल व गुड़ अर्पित करें ।
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कथा और मंत्र: बृहस्पति व्रत की कथा पढ़ें या सुनें । इसके पश्चात “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र की कम से कम एक माला जाप करें ।
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सायंकाल: सूर्यास्त के बाद पुनः पूजा स्थल पर दीपक जलाएं और आरती करें ।
आहार नियम
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दिन में एक बार, शाम की पूजा के बाद बिना नमक का पीला भोजन करें ।
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भोजन में बेसन का हलवा, बेसन के लड्डू या चने की दाल से बनी सात्विक वस्तुएं लें ।
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विशेष वर्जना: इस दिन केले का दान करें, परंतु स्वयं केला कभी न खाएं ।
2. भगवान विष्णु व्रत प्रक्रिया (संकट निवारण और पितृ शांति हेतु)
भगवान विष्णु की आराधना जीवन के समस्त पापों का नाश कर वैकुंठ की प्राप्ति कराती है। यह व्रत मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ है ।
सुबह से शाम की दिनचर्या
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प्रातःकाल: स्नान के बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें । विष्णु जी की प्रतिमा को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं ।
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पूजन विधि: भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल और पीले चंदन का तिलक लगाएं । तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनके भोग में तुलसी अवश्य रखें ।
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पाठ और जप: इस दिन ‘विष्णु सहस्रनाम’ या ‘गीता के 11वें अध्याय’ का पाठ करना अत्यंत प्रभावशाली होता है । मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का मानसिक जाप करते रहें ।
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दोपहर: दिन भर मौन रहने या सात्विक चिंतन करने का प्रयास करें ।
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सायंकाल: विष्णु जी की आरती (ओम जय जगदीश हरे) गाएं ।
आहार नियम
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विष्णु व्रत में फलाहार को प्राथमिकता दी जाती है ।
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यदि एक समय भोजन कर रहे हैं, तो वह पूर्णतः सात्विक और तामसिक वस्तुओं (लहसुन, प्याज) से रहित होना चाहिए ।
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दूध और केसर की खीर का भोग लगाकर उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें ।
3. गुरुवार लक्ष्मी-नारायण व्रत प्रक्रिया (धन, ऐश्वर्य और ऋण मुक्ति हेतु)
जहाँ नारायण की पूजा होती है, वहां लक्ष्मी स्वयं निवास करती हैं । यह व्रत आर्थिक तंगी दूर करने और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए गृहस्थों द्वारा किया जाता है ।
सुबह से शाम की दिनचर्या
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प्रातःकाल: सामान्य गुरुवार व्रत की भांति स्नान और संकल्प करें। लक्ष्मी-नारायण की संयुक्त मूर्ति की पूजा करें।
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विशेष शाम की पूजा (प्रदोष काल): लक्ष्मी-नारायण व्रत में शाम की पूजा का सर्वाधिक महत्व है । सूर्यास्त के बाद घर के मुख्य द्वार पर और पूजा स्थल पर शुद्ध घी का दीपक जलाएं ।
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कलश स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर कलश स्थापित करें । मां लक्ष्मी को लाल चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
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पाठ: सायंकाल में ‘श्रीसूक्त’ और ‘महालक्ष्मी हृदय स्तोत्र’ का पाठ करना अतुल्य धन प्रदायक माना गया है।
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मंत्र: “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र की कम से कम 108 बार जाप करें।
आहार नियम
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भोजन में मीठी वस्तुओं का समावेश करें, जैसे केसर युक्त खीर या बेसन के मीठे व्यंजन।
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नमक और खटाई (नींबू, दही) का पूर्णतः त्याग करें।
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भोजन सूर्यास्त के बाद पूजन संपन्न करके ही ग्रहण करें।
गुरुवार के विशेष उपाय और सावधानियां
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दान का महत्व: इस दिन चने की दाल, गुड़, पीले वस्त्र, हल्दी और सोने का दान अत्यंत शुभ है।
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गौ सेवा: गाय को चने की दाल और गुड़ से भरी आटे की लोई खिलाने से बृहस्पति के सभी दोष दूर होते हैं।
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तिलक: माथे पर केसर या हल्दी का तिलक अवश्य लगाएं।
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पीला धागा: दाहिने हाथ (पुरुष) या बाएं हाथ (महिला) की कलाई में रक्षा सूत्र के रूप में पीला धागा बांधना गुरु ग्रह को मजबूत करता है।
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