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यूजीसी विवाद: सवर्ण नाराजगी और भाजपा की डगमगाती केंद्र की राह

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नई दिल्ली, 1 फरवरी (विशेष संवाददाता)। यूजीसी को लेकर उपजी नाराजगी अब केवल एक शैक्षणिक या प्रशासनिक विवाद नहीं रह गई है, बल्कि यह भाजपा और विशेष तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सवर्ण समाज के टूटते विश्वास का बड़ा संकेत बन चुकी है। वर्षों से भाजपा की राजनीति का एक मजबूत आधार माने जाने वाले सवर्ण वर्ग में जिस स्तर का असंतोष देखने को मिल रहा है, उसने केंद्र की सत्ता की राह को पहले से कहीं अधिक कठिन बना दिया है। यह नाराजगी अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि यूजीसी के नए नियमों के साथ धीरे-धीरे सुलगती रही और अब खुलकर सामने आ गई है।

सवर्ण समाज का स्पष्ट मानना है कि यूजीसी के ये नियम किसी भूल, तकनीकी खामी या जल्दबाजी का परिणाम नहीं हैं। समाज के भीतर यह धारणा गहराई से जड़ जमा चुकी है कि यह नियम सोची-समझी राजनीतिक साजिश के तहत लाए गए, जिनका सीधा असर सवर्ण युवाओं के शैक्षणिक अवसरों और भविष्य पर पड़ता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर गुस्सा केवल छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और प्रबुद्ध वर्ग तक फैल चुका है। लोगों का कहना है कि अगर सरकार की मंशा साफ होती तो वह शुरुआत में ही इन नियमों पर व्यापक संवाद करती, न कि विरोध के बाद सफाई देने की कोशिश करती।

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इस पूरे विवाद में सबसे अधिक पीड़ा केंद्रीय मंत्रियों के उस रवैये से हुई है, जिसमें उन्होंने लगातार यूजीसी नियमों का बचाव किया। सवर्ण समाज इसे अपने जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा मान रहा है। जब एक बड़ा सामाजिक वर्ग यह कह रहा हो कि यह नियम उसके खिलाफ हैं, तब सत्ता में बैठे लोग उन्हें ऐतिहासिक सुधार बताकर पेश करें, तो यह संवेदनहीनता का परिचायक बन जाता है। यही वजह है कि सरकार के खिलाफ नाराजगी केवल नियमों तक सीमित न रहकर सीधे नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस पूरे मामले में एक अहम मोड़ साबित हुआ। अदालत द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाकर 2012 के नियमों को लागू रखने का आदेश सरकार के लिए स्पष्ट चेतावनी थी। यह फैसला इस बात का संकेत था कि नियम न केवल विवादित हैं, बल्कि संवैधानिक कसौटी पर भी सवालों के घेरे में हैं। इसके बावजूद सरकार द्वारा नियमों को औपचारिक रूप से समाप्त न कर केवल ठंडे बस्ते में डाल देना, सवर्ण समाज के संदेह को और मजबूत करता है। लोगों का कहना है कि सरकार टकराव से बचना चाहती है, लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

सवर्ण समाज में यह भावना अब तेजी से फैल रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह मानकर चल रहे हैं कि समय के साथ यह नाराजगी खत्म हो जाएगी और चुनाव आते-आते सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन समाज के भीतर इसे एक बड़ी राजनीतिक गलतफहमी के रूप में देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यह मामला केवल किसी एक नियम का नहीं, बल्कि सम्मान, हिस्सेदारी और विश्वास का है। जिस वर्ग ने लगातार भाजपा को वैचारिक और चुनावी समर्थन दिया, अगर वही खुद को उपेक्षित महसूस करे, तो उसका असर गहरा और दूरगामी होता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे सवर्ण युवाओं में इस मुद्दे को लेकर खासा आक्रोश है। उनका मानना है कि सरकार ने उनकी मेहनत और योग्यता को नजरअंदाज किया है। यह वर्ग खुलकर कह रहा है कि उन्होंने मोदी को इसलिए समर्थन दिया था क्योंकि वे योग्यता, पारदर्शिता और अवसर की बात करते थे। लेकिन यूजीसी नियमों ने यह भरोसा तोड़ दिया है। यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक, हर जगह इस मुद्दे पर तीखी चर्चाएं हो रही हैं।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद भाजपा के लिए इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि सवर्ण समाज केवल वोटर ही नहीं, बल्कि पार्टी की वैचारिक रीढ़ भी माना जाता रहा है। संगठन, मीडिया, अकादमिक जगत और सामाजिक विमर्श में इस वर्ग की भूमिका हमेशा प्रभावशाली रही है। यदि यही वर्ग भाजपा से दूरी बनाता है, तो इसका असर केवल कुछ सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित करेगा। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा तब खोखला लगने लगता है, जब एक बड़ा वर्ग खुद को उससे बाहर महसूस करे।

यूजीसी विवाद ने यह भी उजागर कर दिया है कि सरकार और समाज के बीच संवाद की कमी कितनी गहरी हो चुकी है। सवर्ण समाज यह सवाल कर रहा है कि जब अन्य वर्गों जुड़ी नीतियों पर सरकार तुरंत प्रतिक्रिया देती है, तो उनकी चिंताओं को लगातार नजरअंदाज क्यों किया जाता है। यही असमान व्यवहार की भावना इस नाराजगी को और तेज कर रही है।

कुल मिलाकर यूजीसी को लेकर सवर्ण समाज की नाराजगी भाजपा और मोदी सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक चेतावनी है। यह संकट केवल किसी एक नीति को लेकर नहीं, बल्कि उस विश्वास के टूटने का है, जिसे बनाने में वर्षों लगे थे। अगर सरकार इसे समय रहते नहीं समझी और नियमों को स्पष्ट रूप से समाप्त कर समाज से संवाद की पहल नहीं की, तो आने वाले चुनावों में इसका असर साफ दिखाई देगा। यह विवाद इतिहास में केवल एक नीति विवाद के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के बीच बढ़ती दूरी के उदाहरण के तौर पर दर्ज हो सकता है।

यूजीसी से टूटा भरोसा: मोदी का ‘सबका साथ’ सवालों के घेरे में

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