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यूजीसी: न्याय या राजनीति?

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संतुलन बिगड़ा तो सवाल उठेंगे,  न्याय का संतुलन या राजनीतिक दबाव?

नई दिल्ली, 17 फरवरी, सनातनजन विशेष संवाददाता।  भारत का लोकतंत्र सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांत पर आधारित है। लेकिन जब कानूनों और नियमावलियों के नाम पर किसी वर्ग विशेष को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, तो असंतोष जन्म लेता है। आज बहस का केंद्र केवल आरक्षण या अत्याचार निवारण कानून नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम भी बन गए हैं। सवाल सीधा है—क्या नीतियाँ निष्पक्ष हैं या राजनीतिक दबाव का परिणाम?

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 ऐतिहासिक अन्याय को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था। समाज के वंचित वर्गों को सुरक्षा मिलनी चाहिए, इसमें मतभेद नहीं। लेकिन वर्षों से इस कानून के दुरुपयोग के आरोप भी सामने आते रहे हैं। 2018 में जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ प्रावधानों में संतुलन लाने की कोशिश की, तो राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। अंततः संसद ने संशोधन कर पहले जैसी स्थिति बहाल कर दी। इससे यह प्रश्न और गहरा हुआ कि न्यायिक संतुलन और राजनीतिक इच्छा में कौन भारी पड़ता है।आरक्षण की व्यवस्था प्रारंभ में सीमित अवधि के लिए सोची गई थी। परंतु सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इसका विस्तार जारी है। चाहे सत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रही हो या भारतीय जनता पार्टी, किसी भी सरकार ने व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा की दिशा में ठोस पहल नहीं की। क्या यह सामाजिक न्याय की मजबूरी है या राजनीतिक गणित की रणनीति? यह प्रश्न समाज के एक बड़े वर्ग के मन में है।

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अब विवाद का नया केंद्र विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की प्रस्तावित नियमावली है। आरोप हैं कि कुछ प्रावधान प्राकृतिक न्याय की मूल भावना के अनुरूप नहीं थे। यदि किसी शिकायत में आरोपित को स्पष्ट सुनवाई का अवसर न मिले, तो यह चिंता का विषय बनता है। जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप कर पुनर्विचार का संकेत दिया, तो यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी—यह शासन की जवाबदेही पर गंभीर टिप्पणी भी थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “सबका साथ, सबका विकास” की बात करते हैं। यह नारा समावेशी भारत की परिकल्पना प्रस्तुत करता है। लेकिन यदि किसी वर्ग को यह महसूस हो कि उसकी सांस्कृतिक पहचान या परंपराओं को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, तो विश्वास डगमगाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक ब्राह्मण पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार की चर्चा ने इसी संवेदनशीलता को उजागर किया। यदि ऐसी घटनाएँ होती हैं, तो वे व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जातीं, बल्कि व्यापक सामाजिक असंतोष का प्रतीक बन जाती हैं। लोकतंत्र में न्याय केवल होना नहीं चाहिए, वह निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। यदि किसी वर्ग को यह आभास हो कि उसे पूर्वधारणा के आधार पर दोषी माना जा रहा है, तो यह स्थिति खतरनाक है। कानूनों की विश्वसनीयता उनकी निष्पक्षता से आती है, न कि उनकी कठोरता से।

सरकार की जिम्मेदारी केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वे संविधान की आत्मा के अनुरूप हों। यदि बार-बार न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह संकेत है कि नीति निर्माण में कहीं गंभीर चूक हो रही है। क्या मसौदा तैयार करते समय पर्याप्त विधिक परीक्षण हुआ? क्या सभी पक्षों से संवाद किया गया? या फिर राजनीतिक जल्दबाजी ने विवेक को पीछे छोड़ दिया?

सामाजिक न्याय की लड़ाई किसी एक वर्ग के विरुद्ध नहीं हो सकती। यह संतुलन, संवाद और पारदर्शिता से ही आगे बढ़ती है। यदि समाज का कोई भी वर्ग अपमानित या उपेक्षित महसूस करता है, तो लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर पड़ता है। समाधान टकराव में नहीं, बल्कि निष्पक्ष समीक्षा और खुले संवाद में है।

आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि उसकी नीतियाँ किसी वर्ग को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि सबके अधिकारों की रक्षा के लिए हैं। जब तक यह भरोसा मजबूत नहीं होगा, तब तक यूजीसी नियमों और सामाजिक न्याय की नीतियों पर घमासान थमता नहीं दिखेगा।

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