राम मंदिर की विजय पर उठता तीखा सवाल
नई दिल्ली, 21 फरवरी, सनातनजन विशेष संवाददाता। राम मंदिर आंदोलन की अंतिम परिणति 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के रूप में सामने आई। इसे एक ऐतिहासिक क्षण, सभ्यतागत पुनर्जागरण और दीर्घ वैचारिक संघर्ष की विजय बताया गया। लेकिन जैसे ही उत्सव का शोर धीमा होता है, एक असहज प्रश्न उभरता है—क्या संघर्ष और श्रेय के बीच संतुलन कायम रहा? क्या जिन संगठनों ने वर्षों तक सड़कों पर आंदोलन का ताप झेला, वही संगठनों का नाम आज उतनी ही मजबूती से लिया जा रहा है, जितना लिया जाना चाहिए?
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढांचे के गिरने के बाद दर्ज एफआईआर, राजनीतिक उथल-पुथल और लंबी न्यायिक प्रक्रिया ने अनेक नेताओं को कटघरे में खड़ा किया। जांच अंततः सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन को सौंपी गई। दशकों तक चले मुकदमों में जिन नामों की बार-बार चर्चा हुई, वे मुख्यतः विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े थे। अदालतों में पेशियाँ, राजनीतिक हमले, मीडिया की आलोचना—इन सबका प्रत्यक्ष भार इन्हीं चेहरों ने उठाया।
विहिप ने आंदोलन की धार्मिक चेतना को संगठित रूप दिया। धर्म संसदों का आयोजन, शिला पूजन अभियान और कारसेवा का आह्वान—ये सब खुले मंचों पर हुए। विहिप के नेता सार्वजनिक रूप से आंदोलन का चेहरा बने। जब विवाद बढ़ा, तो वही चेहरे आरोप-पत्रों में दर्ज हुए। यह तथ्य इतिहास के दस्तावेजों में सुरक्षित है। विहिप ने केवल वैचारिक सहमति नहीं दी, उसने प्रत्यक्ष मोर्चा संभाला।
बजरंग दल ने उस ऊर्जा को सड़कों पर उतारा। कारसेवकों की लामबंदी, नारे, भीड़ और प्रत्यक्ष उपस्थिति—आंदोलन का दृश्य आयाम उसी से जुड़ा दिखा। जब राजनीतिक तापमान चरम पर था, तब यह संगठन अग्रिम पंक्ति में दिखाई देता था। यदि आंदोलन केवल विचार होता, तो वह अकादमिक बहस बनकर रह जाता; उसे जनांदोलन बनाने का काम सड़कों पर उतरने वालों ने किया।
शिवसेना की भूमिका ने इस संघर्ष को क्षेत्रीय दायरे से बाहर निकाला। महाराष्ट्र से उठी आक्रामक प्रतिध्वनि ने यह संदेश दिया कि यह मुद्दा राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है। सार्वजनिक समर्थन और तीखे बयानबाजी ने आंदोलन को व्यापक राजनीतिक विमर्श में स्थापित किया। भाजपा ने इसे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाकर निर्णायक मोड़ दिया। रथयात्राएँ, जनसभाएँ और चुनावी विमर्श—इन सबने इसे केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि सत्ता-समीकरणों का केंद्रीय विषय बना दिया।
इन सबके बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका अक्सर “वैचारिक आधार” के रूप में रेखांकित की गई। संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताता रहा है। समर्थकों का तर्क है कि संघ दीर्घकालिक संगठनात्मक निर्माण करता है, प्रत्यक्ष आंदोलनकारी मंच उसके अनुषंगी संगठनों के होते हैं। यह दृष्टिकोण एक हद तक संगत प्रतीत हो सकता है। परंतु आलोचकों का प्रश्न यहीं से तीखा होता है—यदि वैचारिक आधार इतना निर्णायक था, तो कानूनी जवाबदेही के दस्तावेजों में शीर्ष संघ नेतृत्व की प्रत्यक्ष उपस्थिति क्यों नहीं दिखती?
आरोप-पत्रों और न्यायालयीन कार्यवाहियों में जिन नामों की चर्चा हुई, वे संघ के प्रत्यक्ष शीर्ष नेतृत्व से नहीं, बल्कि विहिप, बजरंग दल और भाजपा से जुड़े थे। तीन दशकों तक चले मुकदमों में अदालतों के चक्कर किसने लगाए? मीडिया की बहसों में कठघरे में कौन खड़ा रहा? राजनीतिक आलोचना का निशाना कौन बना? ये प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, तथ्यात्मक हैं।
यह भी उतना ही सत्य है कि 2020 में विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। परंतु बरी होने से यह तथ्य नहीं बदलता कि कानूनी जोखिम और सार्वजनिक विवाद का भार वर्षों तक किन कंधों पर रहा। जब संघर्ष का दौर था, तब अग्रिम पंक्ति में खड़े संगठन स्पष्ट दिखाई देते थे। आज जब विजय का शंखनाद होता है, तो कथा का केंद्र कुछ बदला हुआ प्रतीत होता है।
श्रेय की राजनीति सूक्ष्म होती है। वह सीधे टकराव से नहीं, नैरेटिव के निर्माण से चलती है। “संघ परिवार” की सामूहिक उपलब्धि का कथन एक व्यापक छतरी की तरह प्रस्तुत किया जाता है, जिसके नीचे सब समाहित हो जाते हैं। किंतु इस सामूहिकता में विशिष्ट संगठनों की विशिष्ट भूमिका कहीं धुंधली तो नहीं हो जाती? क्या संघर्ष का ताप साझा था, या उसका भार असमान रूप से बंटा हुआ था?
यह बहस किसी संगठन को कमतर या श्रेष्ठ सिद्ध करने की नहीं है। बल्कि यह प्रश्न है कि इतिहास में स्थान किसे और कैसे मिलता है। यदि विहिप और बजरंग दल ने प्रत्यक्ष मोर्चा संभाला, यदि शिवसेना ने आक्रामक समर्थन दिया, यदि भाजपा ने राजनीतिक जोखिम उठाया—तो क्या विजय के क्षण में उनका उल्लेख उतनी ही तीव्रता से होता है जितनी तीव्रता से संघर्ष के दिनों में होता था?
संघ की संरचना दीर्घकालिक है, उसकी रणनीति व्यापक है, और उसका वैचारिक प्रभाव निर्विवाद रूप से गहरा रहा है। परंतु वैचारिक प्रेरणा और प्रत्यक्ष कार्रवाई दो अलग स्तर हैं। प्रेरणा मंच के पीछे होती है, कार्रवाई मंच के सामने। इतिहास की दृष्टि में दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं, किंतु जब श्रेय का प्रश्न उठता है, तो अग्रिम पंक्ति की स्मृति स्वतः उभरती है।
राम मंदिर का निर्माण करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है, परंतु आंदोलन का इतिहास केवल भक्ति का आख्यान नहीं है। यह संगठनात्मक रणनीति, राजनीतिक साहस, कानूनी जोखिम और नैरेटिव नियंत्रण की कहानी भी है। संघर्ष की धूल जिसने झेली, उसकी भूमिका को कमतर आँकना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। उसी तरह वैचारिक पृष्ठभूमि को पूरी तरह नकार देना भी संतुलित दृष्टि नहीं कहलाएगा।
आज जब विजय का क्षण इतिहास में दर्ज हो चुका है, तो यह स्वाभाविक है कि श्रेय का प्रश्न उठे। विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक आंदोलन को जीवित रखा। शिवसेना ने उसे राष्ट्रीय स्वर दिया। भाजपा ने उसे राजनीतिक निर्णायकता दी। और संघ ने उसे वैचारिक आधार प्रदान किया। परंतु यदि सार्वजनिक विमर्श में यह संतुलन बिगड़ता हुआ दिखे, तो तीखे सवाल उठेंगे ही।
संघर्ष और सिंहासन के बीच की यह दूरी ही आज की बहस का मूल है। क्या संघर्ष का इतिहास निष्पक्ष रूप से लिखा जाएगा, या विजय का आख्यान उसे अपने अनुरूप ढाल लेगा? यही वह प्रश्न है जो राम मंदिर की भव्यता के बीच भी अनुगूंज की तरह सुनाई देता है—विहिप और बजरंग दल ने झेला संघर्ष, पर क्या श्रेय का केंद्र कहीं और खिसक गया? इतिहास की अंतिम पंक्ति अभी लिखी जानी बाकी है।
विहिप की अग्निपरीक्षा
यदि राम जन्म भूमि आंदोलन की धार्मिक और जनभावनात्मक धारा को देखें तो विश्व हिन्दू परिषद सबसे प्रखर स्वर में सामने आई। धर्म संसदों का आयोजन, शिला पूजन अभियान, देशव्यापी यात्राएँ और कारसेवकों की जुटान—इन सबमें विहिप की भूमिका निर्णायक रही। अशोक सिंघल आंदोलन का चेहरा बन गए थे। विष्णु हरि डालमिया और गिरिराज किशोर जैसे नेता लगातार सार्वजनिक बहस के केंद्र में रहे। आज भी चंपत राय का नाम मंदिर निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं में प्रमुखता से आता है।
आरोप-पत्रों में जिन नामों को प्रमुखता से दर्ज किया गया, उनमें विहिप से जुड़े नेता शामिल थे। इसका अर्थ यह है कि कानूनी जोखिम और प्रत्यक्ष जवाबदेही का भार विहिप नेतृत्व ने उठाया। आंदोलन के उग्र चरण में जो आक्रामकता दिखाई दी, उसकी जिम्मेदारी भी इन्हीं चेहरों पर आई।
बजरंग दल की सड़क शक्ति
आंदोलन की जमीनी ऊर्जा को समझना हो तो बजरंग दल की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। युवाओं की लामबंदी, नारों की तीव्रता और कारसेवा के दौरान सक्रिय उपस्थिति—इन सबमें बजरंग दल की भूमिका केंद्रीय रही। विनय कटियार का नाम इस संदर्भ में अक्सर सामने आता है।
जब भीड़ सड़कों पर थी और राजनीतिक तापमान चरम पर था, तब यह संगठन केवल वैचारिक मंच नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष कार्रवाई का माध्यम बना। यही वह चरण था जहाँ आंदोलन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि टकरावपूर्ण रूप में दिखाई दिया।
शिवसेना का आक्रामक स्वर
महाराष्ट्र से उठी आक्रामक आवाज़ों ने आंदोलन को और तीखा बनाया। शिवसेना और उसके संस्थापक बाल ठाकरे का नाम बहसों में प्रमुखता से आया। भले ही कानूनी प्रक्रियाओं में अलग-अलग स्तर पर स्थितियाँ बदली हों, लेकिन सार्वजनिक बयानबाजी और समर्थन में शिवसेना की भूमिका स्पष्ट रूप से दर्ज है।
शिवसेना का हस्तक्षेप आंदोलन को केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इसे राष्ट्रीय बहस में बदल देता है।
भाजपा की राजनीतिक धुरी
राजनीतिक मोर्चे पर आंदोलन को राष्ट्रीय मंच देने का श्रेय भाजपा नेतृत्व को जाता है। लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने पूरे देश में अभूतपूर्व राजनीतिक हलचल पैदा की। मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और साध्वी ऋतंभरा जैसे नेताओं के नाम कानूनी दस्तावेजों में आए।
यह तथ्य उल्लेखनीय है कि राजनीतिक जोखिम उठाने वाले और प्रत्यक्ष आरोपों का सामना करने वाले चेहरे भाजपा से जुड़े थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि आंदोलन की राजनीतिक जिम्मेदारी से पार्टी नेतृत्व पूरी तरह अलग नहीं था।
संघ की दूरी
अब सबसे विवादास्पद प्रश्न—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या थी? संघ के शीर्ष पदाधिकारियों के नाम प्रत्यक्ष आपराधिक आरोप-पत्रों में प्रमुख आरोपी के रूप में दर्ज नहीं हुए। यह एक तथ्य है।
संघ के समर्थक इसे संगठनात्मक संरचना का स्वाभाविक परिणाम बताते हैं। उनका कहना है कि संघ वैचारिक और दीर्घकालिक सामाजिक कार्य करता है, जबकि प्रत्यक्ष राजनीतिक या आंदोलनकारी भूमिका उसके सहयोगी संगठन निभाते हैं। आलोचक इसे रणनीतिक दूरी बताते हैं—जोखिम के समय परोक्षता और उपलब्धि के समय प्रमुखता।
श्रेय का सवाल
मंदिर निर्माण का मार्ग जब न्यायिक निर्णयों और राजनीतिक परिस्थितियों से प्रशस्त हुआ, तब सार्वजनिक विमर्श में संघ की भूमिका को अधिक केंद्रीय रूप से प्रस्तुत किया जाने लगा। यही वह मोड़ है जहाँ विहिप और बजरंग दल के समर्थकों को लगता है कि जिन संगठनों ने आक्रामकता और कानूनी चुनौतियाँ झेली, उन्हें हाशिए पर कर दिया गया।
श्रेय का यह प्रश्न केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। जो लोग वर्षों तक आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहे, वे स्वाभाविक रूप से अपेक्षा करते हैं कि इतिहास में उनका नाम उसी प्रमुखता से लिया जाए।
राम जन्मभूमि आंदोलन: सक्रियता किसकी, श्रेय किसका?
अयोध्या आंदोलन केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि 1980–1992 के बीच यह भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल में बदल गया। इस दौरान कई संगठनों की भूमिकाएँ अलग-अलग स्तर पर सामने आईं—सार्वजनिक मंच, रथयात्राएँ, कारसेवा, राजनीतिक समर्थन, और वैचारिक पृष्ठभूमि।
विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी)
आंदोलन का सार्वजनिक चेहरा लंबे समय तक वीएचपी ही रही।
प्रमुख चेहरे: अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, गिरिराज किशोर, चंपत राय।
धर्मसभाएँ, शिलान्यास अभियान, कारसेवकों की जुटान—इन सबमें वीएचपी अग्रिम पंक्ति में दिखी।
चार्जशीट में भी वीएचपी से जुड़े नाम प्रमुख रूप से सामने आए।
बजरंग दल
प्रमुख चेहरा: विनय कटियार।
जमीनी स्तर पर लामबंदी और कारसेवकों की सक्रिय भागीदारी में इसकी भूमिका व्यापक मानी जाती है।
शिवसेना
प्रमुख नाम: बाल ठाकरे (अलग प्रकरणों में नाम आया, बाद में बंद)।
महाराष्ट्र से कारसेवकों की लामबंदी और आक्रामक बयानबाजी ने आंदोलन को राष्ट्रीय बहस में और तीखा किया।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
प्रमुख चेहरे: लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, साध्वी ऋतंभरा।
लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
कई शीर्ष नेता चार्जशीट में शामिल हुए।










