कहते हैं कि विश्वास और अविश्वास के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है। इतनी पतली कि कभी-कभी दिखती भी नहीं, बस महसूस होती है। लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद सोचा कि जब रेखा इतनी पतली है तो क्यों न उस पर यूजीसी का एक मोटा-ताजा पुल बना दिया जाए—ताकि सीधा पार ही कर लिया जाए।
अब जनता हैरान है कि यह पुल विश्वास की तरफ ले जाएगा या सीधे अविश्वास की घाटी में उतार देगा। सरकार को लगता है कि यह एक छोटा-सा प्रशासनिक निर्णय है, मगर राजनीति में छोटे फैसले भी कभी-कभी बड़े भूकंप का कारण बन जाते हैं।
मोदी जी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनकी छवि रही है—एक ऐसे नेता की छवि, जो जनता की नब्ज़ पहचान लेते हैं। लेकिन इस बार लगता है नब्ज़ पकड़ने की जगह नाड़ी परीक्षण ही बंद कर दिया गया है। परिणाम यह हुआ कि जिस वर्ग को वर्षों से भाजपा का स्वाभाविक समर्थक माना जाता रहा है, वही अब नाराज़गी की मुद्रा में दिखाई देने लगा है।
दिलचस्प बात यह है कि सरकार को भरोसा है कि समय सब ठीक कर देगा। जैसे चाय ठंडी होती है, वैसे ही गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा। लेकिन राजनीति का चूल्हा थोड़ा अलग होता है—यहाँ कभी-कभी चाय ठंडी नहीं होती, बल्कि केतली ही उबलने लगती है।
सरकार के रणनीतिकार शायद सोच रहे हैं कि जब तक जनता को दुनिया भर की नई-नई बातें सुनाई जाती रहेंगी—कभी वैश्विक मंच, कभी अर्थव्यवस्था, कभी तकनीक—तब तक यह मुद्दा धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि जब किसी वर्ग के मन में असंतोष बैठ जाता है, तो उसे भाषणों के वाई-फाई से नहीं हटाया जा सकता।
राजनीति में खामोशी भी एक भाषा होती है। कई बार शब्दों से ज्यादा असर खामोशी का होता है। इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी भी कुछ वैसा ही काम कर रही है—जैसे किसी कमरे में पंखा बंद हो जाए और लोग पूछते रहें कि गर्मी क्यों बढ़ रही है।
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व शायद यह मानकर चल रहा है कि जनता की स्मृति बहुत छोटी होती है। आज गुस्सा है, कल भूल जाएगी। लेकिन इतिहास बताता है कि कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो ठंडे नहीं पड़ते, बल्कि धीरे-धीरे राजनीतिक तापमान को ही बदल देते हैं।
व्यंग्य यही है कि सरकार जिस फैसले को मामूली समझ रही है, वही उसके समर्थकों के लिए असाधारण बन गया है। और राजनीति का सबसे बड़ा नियम यही है कि जब समर्थक ही सवाल पूछने लगें, तो विपक्ष को मेहनत करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
इसलिए मोदी जी के सामने अब असली चुनौती यह नहीं है कि विपक्ष क्या कह रहा है, बल्कि यह है कि उनके अपने समर्थक क्या महसूस कर रहे हैं। विश्वास की वह पतली रेखा अभी पूरी तरह टूटी नहीं है, लेकिन उस पर यूजीसी का पुल बनाकर खड़ा रहना भी ज्यादा सुरक्षित नहीं है।
क्योंकि राजनीति में पुल तभी टिकते हैं, जब दोनों किनारे संतुष्ट हों। वरना पुल नहीं, विवाद ही स्थायी हो जाता है।
परिचय-भृगु नागर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दो दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव है। फ्रंट पेज संपादन, राजनीतिक विश्लेषण, राज्य स्तरीय रिपोर्टिंग और न्यूज़रूम प्रबंधन उनकी विशेष पहचान है। उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और चुनावी परिदृश्य पर उनकी पकड़ गहरी और तथ्यपरक मानी जाती है। विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में राज्य संवाददाता, पेज वन एडिटर और डेस्क इंचार्ज के रूप में उन्होंने प्रभावशाली भूमिका निभाई है। डिजिटल न्यूज़ ऑपरेशन और ऑनलाइन एडिशन संचालन में भी उनका अनुभव मजबूत है। तेज, सटीक और प्रभावी हेडलाइन निर्माण उनकी विशिष्ट क्षमता है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में दक्षता के साथ वे अनुवाद और विश्लेषण में भी निपुण हैं। जमीनी रिपोर्टिंग से लेकर संपादकीय नेतृत्व तक उनका सफर प्रतिबद्ध पत्रकारिता का उदाहरण है। निष्पक्षता, साहस और जनहित उनके लेखन की मूल भावना है। वर्तमान में वे लखनऊ से सक्रिय पत्रकारिता और वैचारिक लेखन में संलग्न हैं।










