हिंदू मंदिरों में साई की प्रतिमा स्थापना: शास्त्रीय उल्लंघन, संप्रदायगत शुद्धता और सुनियोजित षड्यंत्र का विश्लेषणात्मक शोध प्रतिवेदन
सनातन धर्म की अटूट परंपरा और उसके आगम सम्मत सिद्धांतों के संरक्षण की दिशा में वर्तमान समय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विमर्श का उदय हुआ है। यह विमर्श मुख्य रूप से हिंदू मंदिरों के भीतर शिर्डी के साईं बाबा की प्रतिमाओं की स्थापना और उनके ईश्वरीयकरण के विरुद्ध है। इस विवाद की जड़ें केवल धार्मिक भावनाओं में नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक सिद्धांतों, शास्त्रीय विधियों और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के संकल्प में निहित हैं। वाराणसी (काशी) से प्रारंभ होकर यह अभियान अब संपूर्ण भारत में फैल चुका है, जिसमें ज्योतिष्पीठ और द्वारका पीठ के शंकराचार्यों ने न केवल धार्मिक बल्कि कानूनी और सामाजिक स्तर पर भी इस स्थापना को एक ‘षड्यंत्र’ और ‘शास्त्रीय उल्लंघन’ घोषित किया है 1। इस शोध प्रतिवेदन का उद्देश्य इस संपूर्ण विषय का व्यापक विश्लेषण करना है, जिसमें जीवात्मा और परमात्मा के मध्य तात्विक विभेद, शंकराचार्यों के तार्किक विरोध, आगम शास्त्र के नियमों की अवहेलना और हाल के वर्षों में विभिन्न मंदिरों से साईं की प्रतिमाओं को हटाए जाने के प्रसंगों का सविस्तार समावेश है।
जीवात्मा बनाम परमात्मा: दार्शनिक एवं शास्त्रीय विभेद
सनातन धर्म के दर्शन शास्त्र में उपासना के पात्र और मंदिर में प्रतिष्ठित होने वाले विग्रह की पात्रता को लेकर अत्यंत स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इस विवाद के मूल में ‘जीवात्मा’ (एक व्यक्तिगत आत्मा जो जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधी है) और ‘परमात्मा’ (परमेश्वर, जो अजन्मा और माया का स्वामी है) के बीच का अंतर है।
तात्विक विश्लेषण और उपनिषदीय साक्ष्य
भारतीय दर्शन के अनुसार, जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों में मूलभूत अंतर होता है। जीवात्मा वह सत्ता है जो अज्ञान, कर्म और वासनाओं के कारण शरीर धारण करती है और संसार के द्वंद्वों (सुख-दुःख) का भोग करती है। इसके विपरीत, परमात्मा वह ‘पुरुष विशेष’ है जो इन समस्त बंधनों से मुक्त है। न्याय दर्शन के अनुसार जीवात्मा के लक्षण इस प्रकार हैं:
इसका अर्थ है कि जिसमें इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान (सीमित) जैसे गुण हों, वह जीवात्मा है 4। जबकि ईश्वर या परमात्मा को योगसूत्रों में ‘क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:’ कहा गया है, अर्थात जो क्लेश, कर्म, फल और वासनाओं से सर्वथा अमुक्त है।
मुण्डकोपनिषद् में एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक (3.1.1) जीवात्मा और परमात्मा के अंतर को स्पष्ट करता है:
अर्थात, एक ही शरीर रूपी वृक्ष पर दो सुंदर पंखों वाले पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) मित्र भाव से रहते हैं। उनमें से एक (जीवात्मा) वृक्ष के कर्म रूपी फलों को चखता है, जबकि दूसरा (परमात्मा) केवल साक्षी भाव से देखता है 5।
शंकराचार्यों और विद्वानों का तर्क है कि साईं बाबा एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे जिन्होंने 1918 में देह त्याग दी 6। वे एक ‘सिद्ध पुरुष’ या ‘फकीर’ हो सकते हैं, किंतु वे ‘ईश्वर’ या ‘परमात्मा’ नहीं हैं, क्योंकि परमात्मा जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त है 4। किसी मृत व्यक्ति या ‘प्रेत’ (शास्त्रीय अर्थ में देह त्यागने के बाद की स्थिति) की प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित करना, जहाँ साक्षात दिव्य ऊर्जा की उपासना होती है, शास्त्रों के विरुद्ध माना जाता है 8।
तुलनात्मक विवरण: जीवात्मा एवं परमात्मा
| विशेष गुण | जीवात्मा (Jivatma) | परमात्मा (Paramatma) |
| अवस्था |
माया के अधीन (मायाधीन) 11 |
माया का स्वामी (मायाधीश) 11 |
| जन्म/मृत्यु |
प्रारब्ध के अनुसार शरीर धारण करना 4 |
अजन्मा, नित्य और शाश्वत 12 |
| अनुभव |
सुख-दुःख और कर्मफल का भोग 4 |
निर्लिप्त, केवल आनंद और प्रकाश स्वरूप 14 |
| व्यापकता |
शरीर तक सीमित चेतना 4 |
सर्वव्यापी, कण-कण में विद्यमान 4 |
| शास्त्रीय पात्रता |
गुरु या संत के रूप में सम्मान योग्य 16 |
मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हेतु एकमात्र पात्र 17 |
शंकराचार्यों का विरोध: शास्त्रीय मर्यादा और धर्म निर्णय
सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरुओं, विशेषकर शंकराचार्यों ने साईं बाबा को ‘भगवान’ के रूप में स्वीकार करने और उनकी मूर्तियों को मंदिरों में स्थापित करने का कड़ा विरोध किया है। इस विरोध का नेतृत्व ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने किया, जिसे अब वर्तमान ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती आगे बढ़ा रहे हैं 1।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का तर्क और ‘धर्म निर्णय’
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि साईं बाबा न तो भगवान हैं और न ही गुरु की शास्त्रीय परिभाषा में फिट बैठते हैं 20। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
-
मांसाहार और चिलम सेवन: साईं बाबा के बारे में यह तथ्य प्रचारित है कि वे चिलम पीते थे और मांसाहार का वितरण करते थे 8। सनातन धर्म में एक भी ऐसा अवतार या देवता नहीं है जो व्यसनों या मांसाहार में लिप्त हो।
-
धार्मिक पहचान का अभाव: वे एक मस्जिद (द्वारकामाई) में रहते थे और सदैव ‘अल्लाह मालिक’ कहते थे 8। अतः उन्हें हिंदू मंदिरों में ‘भगवान’ के रूप में प्रतिष्ठित करना देवताओं का अपमान है 19।
-
हिंदू समाज का विभाजन: शंकराचार्य ने इसे हिंदुओं को उनके मूल देवताओं (राम, कृष्ण, शिव) से भटकाने और समाज को विभाजित करने का एक ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ बताया 19।
-
अमंगलकारिता का सिद्धांत: स्वामी स्वरूपानंद का मानना था कि जहाँ अयोग्य की पूजा होती है, वहाँ आपदाएँ (सूखा, बाढ़, अकाल मृत्यु) आती हैं 8। उन्होंने महाराष्ट्र के सूखे को साईं पूजा के अत्यधिक प्रसार से जोड़ा था 25।
शंकराचार्य ने वर्ष 2014 में ‘धर्म निर्णय’ जारी करते हुए कहा था कि सनातनी हिंदुओं को साईं भक्तों से दूरी बनानी चाहिए और उन्हें गंगा स्नान या हिंदू तीर्थों में आने से पहले अपनी आस्था स्पष्ट करनी चाहिए 19।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का वर्तमान रुख
वर्तमान ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य ने वाराणसी के मंदिरों से साईं की मूर्तियों को हटाने को ‘शास्त्रसम्मत’ और ‘सराहनीय’ कार्य बताया है 1। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार चलता है, और जिसमें शास्त्र का प्रमाण नहीं, वह ‘अपूज्य’ है। अपूज्य की पूजा मंदिरों में कदापि नहीं हो सकती 1।
आगम शास्त्र और मंदिर मूर्ति स्थापना के नियम
सनातन धर्म में मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना कोई स्वैच्छिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह ‘आगम शास्त्रों’ (Saiva, Vaishnava, Shakta Agamas) द्वारा शासित है 27। किसी भी मंदिर में केवल उन्हीं देवताओं की मूर्ति स्थापित की जा सकती है जिनका वर्णन वेदों, पुराणों और उपनिषदों में है 2।
प्राण-प्रतिष्ठा की शास्त्रीय विधि
आगम शास्त्रों के अनुसार, मंदिर में मूर्ति की स्थापना ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ के माध्यम से की जाती है। यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें मंत्रों के द्वारा ईश्वरीय शक्ति को उस विग्रह में समाहित किया जाता है 17। इसके नियम निम्नलिखित हैं:
-
पात्रता: केवल पंचदेवों (गणेश, शिव, विष्णु, सूर्य, और शक्ति) या उनके अधिकृत अवतारों की ही मुख्य विग्रह के रूप में स्थापना हो सकती है 2।
-
निषिद्ध स्थापना: किसी भी मृत व्यक्ति, फकीर, या मनुष्य की मूर्ति को मंदिर के गर्भगृह में देवताओं के साथ स्थापित करना ‘दोष’ उत्पन्न करता है, जिससे मंदिर की दिव्यता समाप्त हो जाती है और वहाँ ‘राक्षसी’ शक्तियों का वास होने लगता है 18।
-
यम-नियम: स्थापना करने वाले मुख्य यजमान को अत्यंत कठोर यम-नियमों (उपवास, भूमि शयन) का पालन करना पड़ता है 32।
वाराणसी में ‘सनातन रक्षा दल’ के अध्यक्ष अजय शर्मा और अन्य विद्वानों का तर्क है कि साईं बाबा का कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है, अतः वे इन नियमों के अंतर्गत मंदिर में प्रतिष्ठित होने के पात्र नहीं हैं 33।
वाराणसी और देश भर में मूर्ति निष्कासन अभियान
अक्टूबर 2024 में वाराणसी में एक संगठित अभियान के तहत कई मंदिरों से साईं की मूर्तियों को हटाया गया। यह अभियान ‘सनातन रक्षा दल’ और ‘केंद्रीय ब्राह्मण महासभा’ द्वारा चलाया गया था 2।
वाराणसी के प्रमुख प्रसंग
| मंदिर का नाम | घटना का विवरण | मंदिर प्रबंधन की प्रतिक्रिया |
| बड़ा गणेश मंदिर (लोहटिया) |
5 फीट ऊँची साईं प्रतिमा को ससम्मान हटाकर गंगा में विसर्जित किया गया 33। |
महंत रम्मू गुरु ने कहा कि जानकारी के अभाव में पूजा हो रही थी, जो शास्त्र विरुद्ध है 33। |
| पुरुषोत्तम मंदिर |
यहाँ से भी प्रतिमा को हटाया गया 33। |
प्रबंधन ने स्वेच्छा से सहमति दी 33। |
| अन्नपूर्णा मंदिर |
महंत ने साईं पूजा को शास्त्रों में वर्णित न होने के कारण अनुचित बताया 33। |
मूर्तियों को हटाने के अभियान का सैद्धांतिक समर्थन किया 33। |
| अगस्तेश्वर महादेव |
प्रतिमा हटाने की सूची में शामिल 2। |
शुद्धिकरण अभियान का हिस्सा 2। |
| भूतेश्वर मंदिर |
आगामी विस्थापन हेतु चिन्हित 2। |
स्थानीय हिंदू संगठनों का दबाव 2। |
वाराणसी पुलिस ने इस अभियान के मुख्य कर्ताधर्ता अजय शर्मा को धारा 295, 153, 452 और 505 के तहत गिरफ्तार किया, जिससे सनातन धर्मावलंबियों में रोष उत्पन्न हुआ 1。 शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अजय शर्मा की गिरफ्तारी को अनुचित बताते हुए उनकी कानूनी सहायता करने का संकल्प लिया है 1。
देश के अन्य हिस्सों में विरोध
वाराणसी के अतिरिक्त अन्य शहरों में भी साईं मूर्तियों को हटाने के प्रसंग सामने आए हैं:
-
उत्तर प्रदेश (संभल): एक शिव मंदिर से साईं की मूर्ति हटाकर गंगा में विसर्जित की गई, क्योंकि शास्त्रों में उनका कोई स्थान नहीं था 29।
-
दिल्ली और लखनऊ: कई स्थानीय हिंदू संगठनों ने मंदिरों से साईं की तस्वीरें और मूर्तियाँ हटाने के लिए अभियान छेड़ा है 29।
-
तमिलनाडु: मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है ताकि राज्य के सरकारी नियंत्रण वाले (HR&CE) मंदिरों से साईं मूर्तियों को हटाया जा सके, क्योंकि यह आगम शास्त्रों के विरुद्ध है 34।
‘षड्यंत्र’ का सिद्धांत: वित्तीय और सांस्कृतिक आयाम
विभिन्न सनातनी संगठनों का आरोप है कि हिंदू मंदिरों में साईं बाबा की पैठ एक ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ (Planned Conspiracy) का हिस्सा है। इस षड्यंत्र के पीछे कई प्रभावशाली कारण बताए गए हैं:
-
वित्तीय लाभ और 50:50 का फार्मूला: कुछ संगठनों का आरोप है कि शिर्डी साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट एक गुप्त तंत्र चलाता है, जिसके तहत स्वतंत्र मंदिरों को साईं की मूर्तियाँ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बदले में चढ़ावे का 50% स्थानीय स्तर पर रखा जाता है और शेष 50% शिर्डी ट्रस्ट को भेजा जाता है 34। यह मंदिरों को एक ‘लाभकारी एजेंसी’ में बदलने जैसा है।
-
हिंदू देवी-देवताओं का प्रतिस्थापन: यह देखा गया है कि धीरे-धीरे मुख्य देवताओं की तुलना में साईं की मूर्तियों को अधिक प्रमुखता दी जाने लगी। यहाँ तक कि ‘साईं गायत्री’ और ‘साईं चालीसा’ बनाकर मूल वैदिक मंत्रों और स्तोत्रों की महत्ता को कम करने का प्रयास किया गया 22।
-
बॉलीवुड और मीडिया की भूमिका: 1970 के दशक के बाद फिल्मों (जैसे ‘अमर अकबर एंथोनी’) ने साईं को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ के मसीहा के रूप में चित्रित किया, जिससे जनता के मन में उनकी छवि एक ‘देवता’ के रूप में गढ़ी गई 22।
-
पहचान का भ्रम: साईं बाबा का असली नाम ‘चांद मोहम्मद’ बताया जाता है और उनके पिता के ब्रिटिश जासूस होने के दावे भी किए गए हैं 34। आलोचकों का तर्क है कि एक मुस्लिम फकीर को ‘दत्तात्रेय का अवतार’ बताकर हिंदू समाज को धोखा दिया जा रहा है 21।
साईं सत्चरित्र: विवादास्पद अंशों का विश्लेषण
साईं बाबा के जीवन पर आधारित मुख्य ग्रंथ ‘साईं सत्चरित्र’ में ऐसे कई प्रसंग हैं जो सनातन धर्म की मान्यताओं से मेल नहीं खाते और जिनका उपयोग शंकराचार्य उनके विरोध में करते हैं।
अध्याय 4, 5 और 7 के महत्वपूर्ण बिंदु
24
-
मांसाहार का प्रसंग: सत्चरित्र में उल्लेख है कि साईं बाबा फकीरों के साथ मांस और मछली का सेवन कर लेते थे और कभी-कभी ब्राह्मणों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे 8।
-
मस्जिद में वास: वे सदैव द्वारकामाई मस्जिद में रहते थे और कुरान की आयतों का पाठ करते थे 6।
-
योग और ध्यान का विरोध: सत्चरित्र के अनुसार, उन्होंने प्राणायाम और योग जैसे हिंदू आध्यात्मिक अभ्यासों की आवश्यकता को नकारा था 23।
-
गंगा जल का अनादर: एक प्रसंग के अनुसार, उन्होंने गंगा जल की पवित्रता को चुनौती देते हुए उसे अपने चरणों से प्रवाहित होने का दावा किया था, जिसे हिंदू परंपरा में अहंकारपूर्ण माना जाता है 47।
न्यायिक परिप्रेक्ष्य: मद्रास उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय
साईं पूजा के मुद्दे ने कानूनी स्वरूप भी धारण किया है। 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के बयानों पर रोक लगाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह एक धार्मिक विवाद है जिसे नागरिक अदालतों के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए 3。
मद्रास उच्च न्यायालय (2024)
43
तमिलनाडु में एक याचिका दायर की गई है जिसमें मांग की गई है कि:
-
मंदिरों से ‘गोडमेन’ (महिमामंडित व्यक्ति) की मूर्तियों को हटाया जाए।
-
मंदिर केवल ‘देवताओं’ के लिए होते हैं, व्यक्तियों के लिए नहीं 44।
-
साईं बाबा की मुस्लिम पहचान और आगम शास्त्रों के उल्लंघन को आधार बनाया गया है 43।
न्यायालय ने इस पर हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग से जवाब मांगा है, जिससे यह मुद्दा एक राष्ट्रीय कानूनी बहस बन गया है 43।
भविष्य का दृष्टिकोण
हिंदू मंदिरों में साईं की प्रतिमा स्थापना के विरुद्ध जो लहर उठी है, वह सनातन धर्म के भीतर एक ‘आत्म-शुद्धिकरण’ (Self-Purification) की प्रक्रिया के रूप में देखी जा रही है। शंकराचार्यों का विरोध केवल घृणा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह संप्रदाय की ‘शास्त्रीय पवित्रता’ को बनाए रखने का प्रयास है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच का तात्विक अंतर यह सुनिश्चित करता है कि मंदिर केवल दिव्य शक्तियों के वास स्थान रहें, न कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के स्मारक।
वाराणसी में मूर्तियों का निष्कासन इस बात का प्रतीक है कि हिंदू समाज अब अपनी धार्मिक विरासत के प्रति अधिक सचेत हो रहा है। यद्यपि साईं के अनुयायी इसे उनकी समावेशी शिक्षाओं के विरुद्ध मानते हैं, किंतु सनातन परंपरा के रक्षकों के लिए ‘शास्त्र की मर्यादा’ सर्वोच्च है। भविष्य में यह विवाद संभवतः और अधिक गहन होगा, जहाँ एक ओर व्यक्तिगत आस्था होगी और दूसरी ओर सदियों पुरानी शास्त्रीय परंपराएँ।
अंतिम विश्लेषण में, यह स्पष्ट होता है कि हिंदू मंदिरों में साईं की स्थापना को लेकर जो विमर्श खड़ा हुआ है, वह सनातन धर्म की मौलिकता को पुनर्स्थापित करने का एक गंभीर प्रयास है, जिसे दबाना अब कठिन प्रतीत होता है।










