आदि शक्ति दुर्गा के नौ स्वरूपों में से श्री दुर्गा अवतार की रहस्य गाथा और उनकी प्रसन्नता के मंत्र

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गवती आदि शक्ति दुर्गा के वैसे तो अनन्त रूप है, अनन्त नाम है, अनन्त लीलाएं हैं। जिनका वर्णन कहने-सुनने की सामर्थ्य मानवमात्र की नहीं है, लेकिन देवी के प्रमुख नौ अवतार है। जिनमें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, योगमाया, शाकुम्भरी , श्री दुर्गा, भ्रामरी व चंडिका या चामुंडा है। इन नौ रूपों में से आइये जानते हैं हम श्री दुर्गा अवतार के बारे में-

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श्री दुर्गा

जब जब पृथ्वी पर दैत्यो का अत्याचार एवं पाप कर्म की अधिकता हुई तब तब भगवती ने अलग-अलग रूपों में प्रकट होकर अत्याचारी दैत्यो का विनाश किया। (प्रकट होने से तात्पर्य अवतारों से है) जिस तरह देते हो का स्वभाव अत्याचार करना है इसी प्रकार देवी भगवती का स्वभाव दुष्टों का सर्वनाश करना है।

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पूर्व काल में धनु के दो पुत्र हुए रंभ और करम्भ दोनों दोनों अत्यधिक शक्तिशाली थे। दानवो में श्रेष्ठ माने माने जाते थे किंतु दुर्भाग्यवश वह संतानहीन थे अतः पुत्र प्राप्ति के लिए रम्भ एवं करम्भ ने तप करने का निश्चय किया तत्पश्चात घर द्वार का त्याग कर तपस्या हेतु रम्भ और करम्भ वन में चले गए। वहां उन दोनों ने कई वर्षों तक कठिन तपस्या की उसके बाद पंचनद के पवित्र जल में डूबकर करम्भ तप करने लगा और रम्भ भीपंचाग्नि की व्यवस्था करके तप करने लगा।

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उधर देवराज इंद्र को तब ज्ञात हुआ कि रम्भ और करम्भ कठिन तपस्या कर रहे हैं तो उन्हें बड़ी चिंता हुई। दैत्यों की स्थिति का पता लगाने के लिए उसी समय पंचनद पहुंचे जहां जल में डूब कर करम्भ तप कर रहा था।देवराज इंद्र ने तत्क्षण (उसी समय) ग्राह का वेश धारण कर जल में प्रवेश किया और करम्भ का पैर पकड़कर गहरे जल में खींच ले गए। इस तरह उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई। भाई की मृत्यु का समाचार जब रम्भ को प्राप्त हुआ तो उसके क्रोध की सीमा ना रही। उसके मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं अपना मस्तक अग्नि को भेंट कर दूं। ऐसा विचार कर उसने अपने दाहिने हाथ में तलवार उठा लिया। निकट था कि वह अपने सिर कोअपने ही हाथों से काटकर अग्नि को भेंट करता उसी समय (अग्नि देव) प्रकट हुए और रम्भ को रोकते हुए बोले- हे दैत्य राज! मृत्यु की इच्छा करना मूर्खता है। आत्महत्या करने से तुम्हें किस फल की प्राप्ति होगी। अपने क्रोध को शांत करो। तुम्हारी तपस्या से मैं अति प्रसन्न हूं अतः आप निश्चित वर मांगो।
अग्निदेव के वचनों को सुनकर रंभ ने हाथ जोड़ कर विनम्र पूर्वक कहा- हे देवेश! मैं तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाले पुत्र की इच्छा करता हूं। देवता, दानव, मानव आदि उसे परास्त न कर सकें। उसमें असीम शक्ति होतब अग्निदेव ने रम्भ को अभीस्ट वर देते हुए कहा- हे दैत्य राज तुम्हारा कल्याण हो! जिस सुंदरी भार्या पर तुम्हारा मन डीग जाएगा उसी के गर्भ से महान पराक्रमी पुत्र की उत्पत्ति होगी जो समस्त लोकों में अति पराक्रमी होगा।
वर प्रदान कर अग्निदेव अंतर्ध्यान हो गए। तब वह प्रसन्न मन से अपने निवास की ओर चल पड़ा। दानवी राक्षस स्वभाव का होने के कारण उसमें पशु भाव निहित था। काम भाव से एक महसी (भैस) पर उसकी दृष्टि पड़ी। वह महिषी उस समय पूर्ण युवा थी। मद में चूर महिषी उसके वीर से गर्भवती हो गई। होनी प्रबल होती है- एक समय की बात है एक दूसरा भैंसा उस महसी पर टूट पड़ा तब महसी की रक्षा के लिए रम्भ उस भैंसे के सामने स्वयं आया महिषी को देखकर वह भैंसा कामंध हो रहा था और उसने अपने नुकीले सींगों से रम्भ के हृदय में भयानक प्रहार किया जिससे रम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका उधर (पेट) फट गया और थोड़ी देर में उसका प्राणांत हो गया तब वह महिषी भयातुर हो वहां से भाग चली। भैंसा भी उसके पीछे पीछे दौड़ने लगा। तब भय से व्याकुल वह महिषी भागकर यच्छो के बीच जा पहुंची। उसके नेत्रों से आंसू गिर रहे थे। उन यच्छो ने महिषी की दुर्दशा देखकर उसके पीछे आ रहे भैंसे को अपने तीक्ष्ण बाणों से मार डाला। यच्छो की रम्भ से मित्रता थी अतः रम्भ का दाह संस्कार करने के लिए उन सभी ने चिता तैयार की। उस समय महिषी ने अपने मन में विचार किया कि जब पति ही नहीं रहे तो जीवित रहना धिक्कार है। यह सोचकर वह भी चिता में जलकर मर गई।


धु धु करके जल रही चिता के मध्य भाग से अचानक एक आकृति उत्पन्न हुई जो महाबली महिषासुर हुआ अपने पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं रम्भ भी रक्तबीज के रूप में शरीर धारण कर चिता से निकला। इस तरह महिषासुर और रक्तबीज की उत्पत्ति हुई।
स्वयं महिषासुर ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की और उनसे वरदान प्राप्त किया कि मेरी मृत्यु ना देवता के हाथ हो न दानव के हाथ और ना ही मानव के हाथ मारा जाऊं। मेरी मृत्यु किसी सुकुमारी कन्या के
हाथ से हो तथा मैं इच्छा अनुसार अपने शरीर को छोटा बड़ा करने करने किसी पशु पक्षी या मनुष्य का रूप धारण करने में समर्थ होऊ। उसी महिषासुर का वध करने के लिए भगवती जगदंबा ने दुर्गा अवतार धारण किया और महामाया भी असीम शक्ति संपन्न महिषासुर का वध करके ऋषि-मुनियों एवं देवताओं का कल्याण किया।
महिषासुर का वध करने से महिषासुर मर्दिनी के नाम से जगत में विख्यात हुई भगवती अधा शक्ति स्वयं परमब्रह्म और अजर-अमर हैं। माता भगवती के ही तेज से समस्त देवताओं तथा ब्रह्मांड के सभी जीवो की उत्पत्ति हुई है। जगत सृष्टा माता की विधि पूर्वक उपासना करने से प्राणी के मनोरथों की पूर्ति होती है तथा जगत में यश प्राप्ति होता है योगी ध्यानी तपस्वी आदि माता के अष्टभुजी स्वरूप का चिंतन मनन करके भवसागर से पार हो जाते हैं। अर्थात परमपद के अधिकारी होते हैं। अतः सर्व फल प्रदायिनी माता दुर्गा की आराधना मानव जीवन के लिए आवश्यक ही नहीं बल्कि परम आवश्यक है।


माता भगवती की अष्टधातु से निर्मित मूर्ति की स्थापना करके पूजा हेतु आवश्यक सामग्री इकट्ठा करें और विधि पूर्वक पूजन करें

सिद्धकुंजिका स्तोत्रं
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।”

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