भगवती दुर्गा के 51 शक्तिपीठ, जो देते हैं भक्ति-मुक्ति, ऐसे पहुचें दर्शन को

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नंत नाम, अनंत स्वरूप और सम्पूर्ण सृष्टि में वास करने वाली जगत जननी यूँ तो सर्व व्यापी हैं, कोई स्थान नहीं, जहां उनका वास नहीं है, सच्चे मन-भाव से उनका पूजन-अर्चन किया जाए तो निश्चित तौर पर फलीभूत होता है, इस पर संशय के लिए कोई स्थान नहीं है। वर्तमान में कलिकाल चल रहा है, मनुष्य के मन-भाव में संकल्प व भक्ति का अभाव दृष्टिगोचर हो रहा है। सर्वविदित है कि पावन भाव और भक्ति से दूर मनुष्य सुख की तलाश में इस कलिकाल में भटक रहा है, वह भटकता रहता है, पर उसे शांति कहीं नहीं मिलती है। घोर निराशा उसे घ्ोरे रहती है। आज के मानव की निराशा और झटपटाहट को दूर किया जा सकता है श्रद्धा व भक्ति के भाव से। श्रद्धा व भक्ति भाव इस कलिकाल में देव स्थलों में पूजन-अर्चन से जागृत किया जा सकता है। मति-गति को शुद्ध किया जा सकता है, क्योंकि मति-गति शुद्ध होगी तो आचरण भी शुद्ध होगा। हम आपको बताने जा रहे है महामाया दुर्गा के उन पावन स्थलों के बारे में, जहां के दर्शन-पूजन से जन्म-जन्मान्तर के पाप धुल जाते हंै और जीव को दैवीय कृपा प्राप्त होती है। वह पावन स्थल हैं देवी के पावन शक्ति पीठ, शक्ति पीठ यानी वह स्थान, जहां देवी के अंग व आभूषण उस वक्त गिरे थ्ो, जब भगवान शंकर उन्हें अपने कंध्ो पर लेकर सृष्टि में घूम रहे थ्ो। इस स्थिति में सृष्टि में संकट के बादल छा रहे थ्ो। सृष्टि का विनाश होने लगा था। इस कथा को हम संक्ष्ोप में आपको बताने का प्रयास कर रहे है, क्योंकि इसके बारे में हमारी वेबसाइट के अन्य लेखों में विस्तार से कहा जा चुका है। कथा कुछ इस प्रकार हैं, एक समय की बात है, दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया, उसमें सभी को बुलाया, लेकिन भगवान शंकर को नहीं बुलाया। उनकी अवहेलना की। इससे दक्ष की पुत्री और भगवान शंकर की पत्नी माता सती बेहद आहत हुईं। उन्होंने यज्ञ में शामिल होने का भगवान शिव से निवेदन किया, तब उन्होंने माता सती को यज्ञ में जाने की अनुमति प्रदान कर दी, लेकिन चेतावनी भी दी कि बिना बुलाए किसी के यहां जाने से निरादर ही होता है। माता सती ने भगवान शिव की बात नहीं मानी और वे यज्ञ में शामिल होने के लिए चली गई। वहां दक्ष प्रजापति ने जब भगवान शंकर का निरादर किया तो माता सती यह सहन नहीं कर पाईं और वहीं यज्ञशाला में अपनी योगाग्नि से भस्म हो गईं। इससे भगवान शंकर कुपित हो गए और उन्होंने दक्ष की यज्ञ शाला को नष्ट कर दिया और माता सती के शरीर को अपने कंध्ो पर उठाकर सृष्टि में भटकने लगे। इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। चारों ओर हाहाकार मच गया, भगवान विष्णु ने माता सती के अंगों को अपने सुदर्शन चक्र से काटना शुरू किया। धीरे-धीरे माता सती के अंग धरती पर गिरते गए और वहां-वहां देवी भगवती के शक्तिपीठ बनते गए। हम आपको देवी के ऐसे 51 शक्तिपीठों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां देवी के आभूषण या अंग गिरे थ्ो। वह स्थान परम पावन हो गए और वहां शक्तिपीठों की स्थापना हो गई। हालांकि शक्तिपीठों को लेकर तमाम मतान्तर है, एकरूपता नहीं है, फिर भी हम आपके सम्मुख विभिन्न धर्म ग्रंथों, श्रुतियों और धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन के आधार पर इन्हें प्रस्तुत कर रहे है।

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1- कालिका देवी शक्तिपीठ
यह पावन शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल स्थित कोलकाता में स्थित है। कोलकाता भारत के राज्य पश्चिम बंगाल की राजधानी है। यहां पावन गंगा नदी बहती हैं। जिन्हें यहां स्थानीय लोग हुगली नदी के नाम से पुकारते हैं। इसके पावन तट पर भगवती के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। यहां पर कालीघाट पर काली मंदिर की प्रसिद्धि शक्तिपीठ के रूप में है। मान्यता है कि यहां पर भगवती सती के दाहिने पैर की चार अंगुलियां अंगूठा छोड़कर गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका के रूप में जानी जाती है और भ्ौरव नकुलीश हैं। इस पीठ में महाकाली की भव्य मूर्ति विराज रही है। जिनकी लम्बी लाल जिह्वा मुख से बाहर निकली है। मनमोहन मूर्ति के दर्शन से भक्त दिव्य उर्जा की अनुभूति सहज ही करने लगता है। मंदिर के पास ही नकुलेश शिव मंदिर है। मान्यता यह भी है कि यदि श्रद्धा व विश्वास के साथ भगवती की शरण प्राप्त कर जो जीव यहां माता का पूजन-अर्चन व दर्शन करता है। उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं। भगवती की असीम कृपा उसे प्राप्त होती है।

कुछ लोग कोलकाता में टालीगंज बस अड्डे से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित आदि काली के प्राचीन मंदिर को भी शक्तिपीठ रूप में मान्यता देते हैं। प्राचीन मंदिर भगÝप्राय होने से उसका आंशिक जीर्णोंद्धार भी हुआ है। यहां एकादश रुद्र के ग्यारह शिवलिंग भी स्थापित हैं। गंगा के तट पर ही दक्षिण्ोश्वर काली का एक प्रसिद्ध भव्य मंदिर है। इस मंदिर में परमहंस श्रीराम कृष्ण देव ने जगतजननी की अराधना की थी।

2- युगाद्या शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल के इस शक्तिपीठ की महिमा अपार है। जीव को यहां दर्शन-पूजन से अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। पश्चिम बंगला में पूर्वी रेलवे के वर्धमान यानी बर्दवान जक्शन से करीब 34 किलोमीटर उत्तर की ओर क्षीरग्राम में यह पावन शक्तिपीठ स्थित है। यहां भगवती के शरीर के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। पावन शक्तिपीठ की शक्ति भूतधात्री है। यहां के भ्ौरव क्षीरकंटक हैं। इस पावन शक्ति धाम में दर्शन-पूजन से जीव का कल्याण होता है। भगवती की कृपा प्राप्त होती है। सद्भावना जागृत होती है।

3- त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ
पश्चिम बंगला के पूर्वोत्तर रेलवे में सिलीगुड़ी- हल्दीवाड़ी रेलवे लाइन पर जलपाइगुड़ी से करीब चालीस किलोमीटर स्टेशन है। यह यहां का जिला मुख्यालय भी है। इस जिले के बोदा इलाके में शालवाड़ी ग्राम है। यहां तीस्ता नदी के तट पर देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि यहां देवी सती के देह का वाम चरण गिरा था। इस शक्तिपीठ की शक्ति भ्रामरी है और भ्ौरव ईश्वर हैं। इस पावन धाम में नवरात्रि के दिनों में विश्ोष रूप से दर्शन पूजन का महत्व है।

4- बहुला शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल में यह शक्तिपीठ हावड़ा से 144 किलोमीटर और नवद्बीप धाम से 39 किलोमीटर दूर कटवा जंक्शन से पश्चिम केतुब्रह्म ग्राम या केतु ग्राम में है। यहां देवी सती के शरीर का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला है और भ्ौरव भीरुक हैं।

5- वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल के पूर्वी रेलवे की मुख्य लाइन में ओंडाल जंक्शन स्थित है। यहां से एक लाइन सैन्थिया जाती है। इस लाइन पर ओंडाल से करीब 36 किलोमीटर की दूरी पर दुब्राजपुर स्टेशन है। इस स्टेशन से करीब 11 किलोमीटर उत्तर तप्त जल के कई झरने हैं। तप्त जल के इन झरनों के समीप कई शिव मंदिर भी हैं। बाकेश्वर नाले के तट पर होने से यह स्थान बाकेश्वर या वक्त्रेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। यह शक्तिपीठ सैन्थिया जंक्शन से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर श्मशान की भूमि में स्थित है। यहां का मुख्य मंदिर बाकेश्वर या वक्त्रेश्वर शिव मंदिर है। यहां पापहरण कुंड है। मान्यता है कि यहां अष्टावक्र ऋषि का आश्रम भी था। देवी के देह का मन यहां गिरा था। यहां की शक्ति महिषमर्दिनी हैं। भ्ौरव वक्त्रनाथ हैं। यह पावन धाम पुण्य प्रदान करने वाला है।

6- नलहटी शक्तिपीठ
कालिका देवी के इस पावन धाम में जो भक्त श्रद्धाभाव से नतमस्तक होकर पूजन-अर्चन व दर्शन करते है, उन्हें अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है, इसमें लेशमात्र का भी संशय करना स्वयं को भ्रमित करना होगा। पश्चिम बंगाल में यह शक्तिपीठ बोलपुर शांतिनिकेतन से करीब 8० किलोमीटर की दूरी पर और सैन्थिया जंक्शन से केवल करीब चालीस किलोमीटर की दूरी पर नैर्ऋत्यकोण में एक ऊॅँचे टीले पर स्थित है। यहां भगवती सती के शरीर की उदर नली गिरी थी। कुछ लोग मानते है कि यहां सती की शिरोनली गिरी थी। यहांकी शक्ति कालिका हैं और भ्ौरव योगीश हैं।

7- नन्दीपुर शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल में पूर्वी रेलवे की हावड़ा-क्यूल लाइन में सैन्थिया स्टेशन से अग्निकोण में कुछ ही दूरी पर नंदीपुर नाम के स्थान में एक बड़े वटवृक्ष के नीचे देवी मंदिर है। मान्यता है कि यहां पर भगवती सती के शरीर का कंठहार गिरा था। यहां की शक्ति नंदिनी हैं और यहां के भ्ौरव नंन्दिकेश्वर हैं।

8- अट्टहास शक्तिपीठ
अट्टहास शक्ति पीठ जीव के सभी मनोरथ पूर्ण करने वाली है, बशर्ते सच्चे मन से और श्रद्धाभाव से भगवती का पूजन-अर्चन कर उनकी भक्ति में लीन हो। मन के कुविचारों को त्यागकर भगवती का पूजन अर्चन करें। बंगाल में यह शक्तिपीठ वर्धमान यानी बर्दवान से करीब नब्बे किलोमीटर दूर कटवा- अहमदपुर लाइन पर लाबपुर स्टेशन के निकट है। यहां देवी सती के शरीर का अधरोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति फल्लरा और भ्ौरव विश्वेश हैं।

9- किरीट शक्तिपीठ
समस्त संकटों को दूर करने वाली है किरीट शक्ति पीठ, इनकी महिमा का गान जिनता किया जाए, वह कम ही होगा। बंगाल में यह शक्तिपीठ हावड़ा-बरहरवा रेलवे लाइन पर हावड़ा से ढ़ाई किलोमीटर दूर लालबाग कोट स्टेशन से करीब पांच किलोमीटर पर बड़नगर के पास गंगा तट पर स्थित है। यहां पर भगवती सती के शरीर से किरीट नाम का शिरोभूषण गिरा था। यहां की शक्ति विमला व भुवनेशी और भ्ौरव संवर्त हैं। यह पावन धाम श्रद्धा व भक्ति से सराबोर रहता है।

1०- यशोर शक्तिपीठ बंगला देश में है
यह पावन शक्ति दैहिक, दैविक व भौतिक तापों को हरने वाली है। यहां देवी की वाम हथ्ोली गिरी थी। यह शक्तिपीठ बृहत्तर भारत के बंग प्रदेश में और वर्तमान में बंगलादेश में स्थित है। यह खुलना जिले के जैशोर शहर में है। यहां देवी सती के शरीर की वाम हथ्ोली गिरी थी। यहां की शक्ति यशोरेश्वरी और भ्ौरव चंद्र हैं।

11- सुगन्धा शक्तिपीठ बंगला देश में है

सुगन्धा शक्तिपीठ की महिमा अपरम्पार है। यह शक्तिपीठ वर्तमान में बंगलादेश में है,जो कि पूर्व समय में भारत का अभिन्न अंग था। यहां पहुंचने के लिए खुलना से बारीसाल तक स्टीमर से जाया जाता है। बारीसाल से 21 किलोमीटर उत्तर में शिकारपुर ग्राम में सुगन्धा यानी सुनंदा नदी के तट पर उग्रतारा देवी का मंदिर है। मान्यता है कि यहां देवी सती के शरीर की नासिका गिरी थी। यहां की शक्ति सुनन्दा और भ्ौरव त्रयम्बक हैं।
इस पावन धाम की महिमा का बखान धर्म शास्त्रों में मिलता है। श्रुतियों में भी इसका उल्लेख है।

12- चट्टल  शक्तिपीठ बंगला देश में है
मान्यता है कि यहां भगवती सती के शरीर का दक्षिण बाहु गिरा था। यह शक्तिपीठ भी बंगलादेश में स्थित है। यह चटगाँव से करीब चालीस किलोमीटर दूर सीताकुंड स्टेशन के पास चंद्रश्ोखर पर्वत पर भगवानी मंदिर के रूप में स्थित हैं। चंद्रश्ोखर शिव का भी यहां मंदिर है। यह समुद्र की सतह से करीब साढ़े तीन सौ मीटर की ऊॅँचाई पर स्थित है, यहां से पास ही सीताकुंड, व्यास कुंड, सूर्य कुंड, ब्रह्म कुंड, जनकोटि शिव, सहस्त्रधारा, बाडवकुंड और लवणाक्षतीर्थ हैं। बाडवकुंड में से निरन्तर आग निकला करती है। शिवरात्रि में यहां भव्य मेला लगता है। यहां भगवती सती के शरीर की दक्षिण बाहु गिरी थी। यहां की शक्ति भवानी है, जबकि भ्ौरव चंद्रश्ोखर हैं।

13- करतोयातट शक्तिपीठ बंगला देश में स्थित है
यह शक्तिपीठ भी बंगला देश में ही स्थित है। मान्यता है कि यहां माता सती के शरीर का बाया तल्प गिरा था। यह शक्तिपीठ लालमनीरहाट- संतहाट रेलवे लाइन पर बोंगड़ा स्टेशन सेदक्षिण पश्चिम में करीब तीस किलोमीटर दूर भवानीपुर ग्राम में स्थित है। यहां माता सती के शरीर का बाया तल्प गिरा था। यहां की शक्ति अपर्णा और भ्ौरव वामन हैं।

14- विभाष शक्तिपीठ
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल में मिदनापुर जिले में ताम्रलुक में स्थित है। वहां रूपनारायण नदी के तट पर वर्ग भीमा का विशाल मंदिर है। यह विशाल मंदिर ही शक्तिपीठ है। मंदिर अत्यन्त प्राचीन है। दक्षिण-पूर्व रेलवे के पास कुड़ा स्टेशन से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर यह पावन स्थल है। यहां माता सती का बाया टखना यानी एड़ी के ऊपर की हड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति कपालिनी व भीमरूपा और भ्ौरव सर्वानंद हैं।

15- गण्डकी शक्तिपीठ नेपाल में है
यह पावन शक्तिपीठ नेपाल में स्थित है। शक्तिपीठ नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित है। यहां भगवती सती के शरीर के दक्षिण गण्ड यानी दानिा कपोल गिरा था। यहां की शक्ति गण्डकी और भ्ौरव चक्रपाणि हैं।

16- गुह्येश्वरी शक्तिपीठ नेपाल में है
नेपाल में पशुपति मंदिर से थोड़ी दूरी पर बगमती नदी प्रवाहित होती हैं। नदी के उस पास भगवती गुह्येश्वरी का सिद्ध शक्तिपीठ है। ये नेपाल की अधिष्ठात्री देवी हैं। सारा नेपाल इन गुह्यकालिका देवी की अनन्य भक्तिभाव से पूजा करता है। यहां भगवती का विशाल मंदिर है, जहां एक छिद्र है। जिसमें से लगातार जल प्रवाहित होता रहता है। यह मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहां देवी के शरीर के दोनों जानु अर्थात घुटने गिरे थ्ो। यहां की शक्ति महामाया है। भ्ौरव कपाल हैं।

17- हिंगुला शक्तिपीठ पाकिस्तान में है
देवी भागवत महापुराण में हिंगुला शक्तिपीठ का वर्णन है। यह पावन धाम है। हिमालय के पूछने पर देवी ने अपने इस प्रिय स्थान के बारे में बताया था। उसमें हिंगुला को महास्थान कहा गया है। इसी तरह से ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी कहा गया है कि अश्विनमास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हिंगुला में श्रीदुर्गा की प्रतिमा का दर्शन-पूजन और उपवास करने से जीव को पुनर्जन्म के चक्र के कष्ट से मुक्ति मिल जाती है। उसे मोक्ष गति प्राप्त हो जाती है।
यह पावन शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के हिंगलाज नाम के स्थान में अवस्थित है। हिंगलाज कराची से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में हिंगोस नदी के तट पर है। करांची से फारस की खाड़ी की ओर के मार्ग में मकरान तक जल मार्ग और आगे पैदल जाने पर सातवें मुकाम पर चंद्रकूप है। यह आग उगलता हुआ सरोवर है। इस यात्रा का अधिकांश भाग मरुस्थल से होकर पार करना पड़ता है, जोकि निश्चित तौर पर दुष्कर है। चंद्रकूप पर हर यात्री को अपने प्रच्छन्न पापों को जोर-जोर से कहकर उनके लिए क्षमा मांगनी पड़ती है। साथ ही भविष्य में पाप न करने की शपथ भी लेनी पड़ती है। आगे 13 मुकाम पर हिंगलाज है। यहीं एक गुफा के अंदर जाने पर हिंगलाज देवी का स्थान है। जहां शक्तिरूप ज्योति के दर्शन होते है। गुफा में हाथ-पैर के बल जाना होता है। यहां भगवती सती के शरीर का ब्रह्मरंघ्र गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भ्ौरव भीमलोचन हैं।

18- लंका शक्तिपीठ श्री लंका में अवस्थित है
यह पावन धाम जीव के संकटों को दूर करता है। यहां पूजन-अर्चन व दर्शन से मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व भौतिक तापों से रक्षा होती है।
इस शक्तिपीठ में देवी के शरीर का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इंद्राक्षी हैं और भ्ौरव राक्षसेश्वर हैं।

19- मानस शक्तिपीठ तिब्बत में है
यह शक्तिपीठ चीन अधिकृत तिब्बत में है। तिब्बत में मानसरोवर के तट पर स्थित है। यहां भगवती सती के शरीर की दायी हथ्ोली गिरी थी। यहां की शक्ति दाक्षायणी है और भ्ौरव अमर हैं।

2०- पंचसागर शक्तिपीठ
इस पीठ के स्थान के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। यहां देवी के शरीर से अधोदंत यानी नीचे के दांत गिरे थ्ो। यहां की शक्ति वाराही और भ्ौरव महारुद्र है।

21- भैरव पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर दो मत हैं। कुछ विद्बान गुजरात के गिरनार के निकट स्थित भ्ौरव पर्वत पर शक्तिपीठ मानते हैं तो कुछ मध्य प्रदेश में उज्ज्ौन के निकट शिप्रानदी के तट पर स्थित भ्ौरव पर्वत को शक्तिपीठ मानते हैं। दोनों ही स्थानों को देवी के पूजा स्थल मानकर भक्तिभाव के साथ दर्शन करना चाहिए। यहां देवी सती के शरीर का ऊध्र्व ओष्ठ गिरा था। यहां की शक्ति अवन्ती और भ्ौरव लम्बकर्ण है।

22- राम गिरी शक्तिपीठ
रामगिरी शक्ति पीठ को लेकर दो मत हैं। कुछ विद्बान चित्रकूट के शारदा मंदिर को और कुछ विद्बान मैहर के शारदा मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं। दोनों ही स्थानों पर पवित्र तीर्थ हैं और मध्य प्रदेश में ही स्थित हैं। दोनों स्थानों पर श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करना चाहिए। यहां भगवती सती माता के दाहिना स्तन गिरा था। यहां की शक्ति शिवानी हैं और भ्ौरव चंड हैं।

23- उज्जयिनी शक्तिपीठ
इस पावन शक्तिपीठ में भगवती देवी सती के शरीर की कुहनी गिरी थी। मध्य प्रदेश के उज्ज्ौन में रुद्र सागर या रुद्र सरोवर के निकट हरसिद्धि देवी का मंदिर है। इसे ही शक्तिपीठ माना जाता है। यहां की शक्ति मंगलचण्डिका और भ्ौरव मंगल्यकपिलाम्बर है। यह मंदिर चाहर दीवारी से घिरा हुआ है। मंदिर में मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान पर श्रीयंत्र विराज रहे हैं। इसके पीछे भगवती अन्नपूर्णा की प्रतिमा है। मंदिर में महाकालिका, महालक्ष्मी, महासरस्वती और महामाया की प्रतिमाएं भी है। मंदिर के पूर्व द्बार पर बावड़ी है। इसके बीच में एक स्तम्भ है और पास ही सप्तसागर सरोवर है। मंदिर के जगमोहन के सामने दो बड़े दीपस्तम्भ है। हर वर्ष अश्विनमास के पांच दिन तक तक इस पर दीप मालाएं प्रज्जवलित की जाती हैं। स्कन्द पुराण में उज्जयिनी का माहात्म्य बताया गया है। उज्जयिनी माहात्म्य में श्री हरसिद्धि देवीका वर्णन है। भगवान शंकर का वचन है कि जो मनुष्य परम भक्ति के साथ हरसिद्धि देवी का दर्शन करता है, वह अक्षय भोग प्राप्त कर मृत्यु के बाद शिवधाम को प्राप्त करता है। हरसिद्धि देवी का एक मंदिर द्बारका सौराष्ट्र में भी है। दोनों स्थानों पर देवी की प्रतिमाएं एक जैसी ही हैं। एक किंदन्ती के अनुसार महाराज विक्रमादित्य वहीं से देवी को अपनी आराधना से संतुष्ट कर लाए थ्ो। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था, राणोजी शिंदे के मंत्री रामचंद्र बाबा श्ोणवी ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। ये देवी वैष्णवी हैं।

24- शोण शक्तिपीठ
अमरकण्टक के नर्मदा मंदिर में यह शक्तिपीठ माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार बिहार प्रदेश के सासाराम स्थित ताराचण्डी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है। यहां देवी के शरीर का दक्षिण नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी हैं औ भ्ौरव भद्रसेन हैं। कुछ विद्बान डेहरी आन सोन स्टेशन से कुछ दूर स्थित देवी स्थान को यह शक्तिपीठ मानते हैं।

25- शुचि शक्तिपीठ
तमिलनाडु ंमें तीन महासागरों के संगम स्थल कन्याकुमारी से करीब 15 किलोमीटर दूर शुचीन्द्रम् में स्थाणु शिव मंदिर है। उसी मंदिर में यह शक्तिपीठ अवस्थित हैं। कन्याकुमारी एक अंतरीप है। यह भारत की अंतिम दक्षिण सीमा है। यहां देवी के शरीर का उध्र्व दंत और मतान्तर से पृष्ठभाग गिरे थ्ो। यहां की शक्ति नारायणी और भ्ौरव संहार या संकूर हैं।

26- रत्नावली शक्तिपीठ
यह पावन शक्तिपीठ मद्रास के पास है, लेकिन स्थान अज्ञात है। यहां देवी सती के शरीर का दक्षिण स्कन्ध गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी और भ्ौरव शिव है।

27- कन्यकाश्रम या कण्यकाचक्र
तमिलनाडु में तीन सागरों के संगम स्थल पर कन्याकुमारी का मंदिर है। उस मंदिर में भद्रकाली काभी मंदिर है। ये कुमारी देवी की सखी हैं। उनका मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहां देवी सती के शरीर का पृष्ठभाग गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणी और भ्ौरव निमिष हैं।

28- कांची शक्तिपीठ
तमिलनाडु में कांजीवरम् स्टेशन के पास शिवकांची नाम का एक बड़ा हिस्सा है। वहां भगवान एकाम्रेश्वर शिव का मंदिर है। यहां से स्टेशन की ओर करीब दो फर्लांग की दूरी पर कामाक्षी देवी का विशाल मंदिर है। मुख्य मंदिर में भगवती त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमूर्ति कमाक्षी देवी की प्रतिमा है। यहां अन्नपूर्णा, शारदामाता और आदि शंकराचार्य की भी मूर्तियां हैं। इस मंदिर को भारत के दक्षिण भूभाग का सर्वप्रधान शक्तिपीठ माना जाता है। यहां देवी के शरीर का कंकाल अर्थात अस्थिपंंजर गिरा था। यहां की शक्ति हैं देवगर्भा और भ्ौरव हैं रुरु।

29- मिथिला शक्तिपीठ
इस पावन शक्तिपीठ का निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। मिथिला में कई ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें लोग शक्तिपीठ बताते हैं। इनमें से एक जनकपुर नेपाल से 51 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में उच्चैठ नाम के स्थान पर वनदुर्गा का मंदिर है। दूसरा सहरसा स्टेशन के पास उग्रतारा का मंदिर है। तीसरा समस्तीपुर से करीब साठ किलोमीटर दूर सलौना रेलवे स्टेशनसे करीब दस किलोमीटर दूर जय मंगला देवी का मंदिर है। यह तीनों मंदिरही शक्तिपीठ माने जाते हैं। यहां भगवती सती माताका वाम स्कन्ध गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी और भ्ौरव महोदर हैं, लेकिन उग्रतारा मंदिर के विषय में मान्यता है कि यहां देवी भगवती का नेत्र गिरा था। यहां एक यंत्र पर तारा, जटा और नील सरस्वती की मूर्तियां स्थित हैं।

3०- वैद्यनाथ शक्तिपीठ
वैद्यनाथ धाम शिव और शक्ति के ऐक्यका प्रतीक हैं। यह बिजार राज्य में गिरिडीज यानी वर्तमान नाम बी देवघर जिले में स्थित है। यहां भगवान शिव के द्बादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ भी स्थित है। यह स्थान चिताभूमि में है। यहां देवी सती के शरीर का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जय दुर्गा और भ्ौरव वैद्यनाथ हैं।

31- मगध शक्तिपीठ
बिहार की राजधानी पटना में बड़ी पटनेश्वरी देवी के मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में मानते हैं। यह स्थना पटना सिटी चौक से करीब पांच किलोमीटर पश्चिम महराजगंज में है। यहां देवी सती के शरीर की दक्षिण जंघा गिरी थी। यहां की शक्ति सर्वानंदकरी और भ्ौरव व्योमकेश हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार मुंगेर में भगवती सती के शरीर से नेत्र गिरा था।

32- वृंदावन शक्तिपीठ
मथुरा-वृंदावन के बीच भूतेश्वर नाम के रेलवे स्टेशन के समीप भूतेश्वर मंदिर के प्रांगण में यह शक्तिपीठ अवस्थित है। यह स्थान चामुण्डा कहलाता है। तंत्रचूड़ामणि में इसे मौली शक्तिपीठ माना गया है। यह पावन स्थल महर्षि शाण्डिल्य की साधना स्थली भी रही है। यहां देवी भगवती सती के शरीर से केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति उमा और भ्ौरव भूतेश हैं।

33- वाराणसी शक्तिपीठ
यहां मीरघाट पर धर्मेश्वर के समीप विशालाक्षी गौरी का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां भगवान विश्वनाथ विश्राम करते हैं और जीवों को सांसारिक कष्टों से विश्रान्ति देते है। इस कथन का उल्लेख कुछ इस प्रकार शास्त्रों में किया गया है-
विशालाक्ष्या महासौध्ो मम विश्रामभूमिका।
तत्र संसृतिखिन्नानां विश्रामं श्राणयाम्यहम्।।
मान्यता है कि यहां भगवती सती के शरीरसे दाहिनी कर्णमणि गिरी थी। यहां की शक्ति विशालाक्षी और भ्ौरव काल भ्ौरव हैं।

34- प्रयाग शक्तिपीठ
अक्षयवट के पास ललिता देवी का मंदिर है। कुछ विद्बान इसे शक्तिपीठ मानते हैं। कुछ विद्बान अलोपी माता के मंदिर को शक्तिपीठ मानते है। यहां भी ललिता देवी का ही मंदिर है। साथ ही अन्य मान्यता भी है। जिसके अनुसार मीरापुर में ललितादेवी का शक्तिपीठ है। यहां देवी सती के शरीर की हस्तांगुलि गिरी थी। यहां की शक्ति ललिता और भ्ौरव भव हैं।

35- मणिवेदिक शक्तिपीठ
राजस्थान के पुष्करसरोवर के एक तरफ पर्वत की चोटी पर सावित्री देवी का मंदिर है। उसमें सावित्री देवी की तेजयुक्त प्रतिमा है। दूसरी तरफ दूसरी पहाड़ी की चोटी पर गायत्री मंदिर है। यह गायत्री मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहां देवी के शरीर मणिबंध अर्थात कलाइयां गिरी थी। यहां की शक्ति गायत्री माता और भ्ौरव शर्वानंद हैं।

36- विराट शक्तिपीठ
राजस्थान में ही जयपुर से 64 किलोमीटर उत्तर में महाभारत कालीन विराट नगर के पुराने खंडहर हैं। इनके पास में ही गुफा है। जिसे भीम का निवास स्थान कहा गया है। अन्य पांडवों की गुफाएं भी हैं। पांडवों ने वनवान का अंतिम वर्ष अज्ञातवास के रूप में यहीं बिताया था। जयपुर और अलवर दोनों स्थानों से यहां आवागमन के लिए मार्ग है। यहीं पर वैराट ग्राम में शक्तिपीठ है। यहां देवी सती के शरीर के दाये पैर की अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति अम्बिका और भ्ौरव अमृत हैं।

37- प्रभास शक्तिपीठ
गुजरात में गिरनार पर्वत के प्रथम शिखर पर देवी अम्बिका का विशाल मंदिर है। एक मान्यता के अनुसार स्वयं जगत जननी देवी पार्वती हिमालय से यहां आकर निवास करती हैं। इस प्रदेश के ब्राह्मण विवाह के बाद वर-वधु को यहां देवी का चरण स्पर्श कराने के लिए लाते हैं। अम्बिका देवी यानी अम्बा जी के इस मंदिर कको ही शक्तिपीठ माना जाता है। यहां देवी सती के शरीर का उदर भाग गिरा था। यहां क शक्ति चंद्रभागा हैं औ भ्ौरव वक्रतुण्ड हैं।
एक अन्य मान्यता के अनुसार गुजरात के अर्बुदारण्य क्ष्ोत्र में पर्वत शिखर पर माता सती के हृदय का एक भाग गिरा था। उसी अंग की पूजा यहां आरासुरी अम्बिका के नाम से होती है। यहां माता क »ृंगार प्रात: बाल रूप, मध्याह्न् युवती रूप और शाम को वृद्धा रूप में होता है। माता के विग्रह स्थान पर बीसा यंत्र मात्र है। यह भी प्रसिद्ध है कि यहां गिरनार के निकट भ्ौरव पर्वत पर माता सती का उध्र्व ओष्ठ गिरा था, जो भ्ौरव शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है।

38- गोदावरी तट शक्तिपीठ
आंध्र प्रदेश में गोदावरी स्टेशन के पास गोदावरी के पार कब्बूर में कोटितीर्थ है। यह शक्ति पीठ यहीं स्थित है। यहां देवी देह का वाम गण्ड यानी बाया कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेशी या रुक्मिणी और भ्ौरव दण्डपाणि हैं।

39- श्री श्ौल शक्तिपीठ
आंध्र प्रदेश में श्री श्ौल में भगवान शंकर का मल्लिकार्जुन नाम का ज्योतिर्लिंग स्थित है। वहां से करीब चार किलोमीटर पश्चिम में भगवती भ्रमराम्बा देवी का मंदिर है यह मंदिर ही शक्तिपीठ है। यह देवी के शरीर की ग्रीवा का पतन हुआ था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी और भ्ौरव संवरानंद या ईश्वरानंद हैं।

4०- करवीर शक्तिपीठ
यह पावन शक्तिपीठ महाराष्ट्र में अवस्थित है। वर्तमान में कोल्हापुर ही करवीर क्ष्ोत्र है। यहां पुराने राजमहल के पास खजानाघर है। इसके पीछे महालक्ष्मी का विशाल मंदिर है। इसे लोग अम्बा जी का मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर के घ्ोरे में महालक्ष्मी निज मंदिर है। मंदिर का प्रधान भाग नीले पत्थरों का बना है। इसके पास में ही पद्म सरोवर,काशी तीर्थ और मणिकर्णिका तीर्थ है। यहां काशी विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि देव मंदिर हैं। यहां का महालक्ष्मी मंदिर ही शक्तिपीठ माना जाता है। यहां भगवती सती के शरीर के तीनों नेत्र यहां गिरे थ्ो। यहां की शक्ति महिषमर्दिनी और भ्ौरव क्रोधीश हैं। यहां भगवती महालक्ष्मी का नित्य निवास माना जाता है। स्कन्द पुराण में भगवतीकी महिमा का उल्लेख है। वर्णन कुछ इस प्रकार है- अर्थात पुत्र, काराष्ट्र देश का विस्तार दस योजन है। यह देश दुर्गम है। उसकेबीच में काशी आदि से भी अधिक पवित्र श्री लक्ष्मी निर्मित पांच कोस का करवरी क्ष्ोत्र है। यह क्ष्ोत्र बड़ा ही पुण्यमय और दर्शन मात्रसे पापों का नाश करने वालाहै। इस क्ष्ोत्र में वेदपारगामी ब्राह्मण और ऋषिगण निवास करते हैं। उनके दर्शन मात्र से सारे पापों का क्षय हो जाता है।

41- जनस्थान शक्तिपीठ
नासिक के पास पंचवटी में स्थित भद्रकाली के मंदिर की शक्तिपीठ के रूप में मान्यता है। इस मंदिर में शिखर नहीं है। सिंहासन पर नवदुर्गाओं की मूर्तियां हैं। उनके मध्य में भद्रकाली की ऊॅँची मूर्ति है। यहां देवी सती के शरीर की ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी और भ्ौरव विकृताक्ष है। मध्य रेलवे की मुम्बई से दिल्ली जाने वाली मुख्य लाइन पर नासिक रोड प्रसिद्ध स्टेशन है। वहां से पंचवटी आठ किलोमीटर है।

42- श्री पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ के सम्बन्ध में भी दो मत हैं। कुछ विद्बान इसे लद्दाख कश्मीर में मानते हैं तो कुछ असम प्रान्त में सिलहट से चार किलोमीटर दूर नैर्ऋत्यकोण में जैनपुर नामक स्थान को शक्तिपीठ मानते हैं। यहां देवी सती के शरीर का दक्षिण तल्प गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुंदरी और भ्ौरव सुन्दरानंद हैं।

43- कश्मीर शक्तिपीठ
कश्मीर में अमरनाथकी गुफा में भगवान शिव के हिम ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं, वहीं हिमशक्तिपीठ भी बनता है। एक गण्ोश पीठ और एक पावर्ती पीठ भी हिम से बनता है।यह पार्वतीपीठ ही शक्तिपीठ है। श्रावण-पूर्णिमा को अमरनाथ के दर्शन के साथ-साथ यह शक्तिपीठ भी दिखाई देता है। यहां देवी सती के शरीर के कण्ठ का पतन हुआ था। यहां देवी के अंग और अंगाभूषण-कण्ठ प्रदेश की पूजा होती है। यहां की शक्ति महामाया और भ्ौरव त्रिसन्ध्येश्वर हैं।

44- जालंधर शक्तिपीठ
पंजाब में एक शक्तिपीठ है जालंधर शक्तिपीठ। उत्तर रेलवे की मुगलसराय-अमृतसर मुख्य लाइन पर पंजाब में जालन्धर रेलवे स्टेशन है। एक किंवदन्ती के अनुसार इसे जलन्धर नामक दैत्य की राजधानी माना जाता है, जिसका भगवान शंकर ने वध किया था। यहां विश्वमुखी देवी का मंदिर है, इस मंदिर में पीठ स्थान पर स्तन मूर्ति कपड़े से ढकी रहती है और धातु निर्मित मुख मंडल बाहर रहता है। इसे प्राचीन त्रिगर्त तीर्थ कहते हैं। यह मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहां माता सती के शरीर का वाम स्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुरमालिनी है और भ्ौरव भीषण हैं। मान्यता है कि इस पीठ में सम्पूर्ण देवी, देवता और तीथँ अंशरूप में निवास करते हैं। यहां पशु के भी मरने से उसे सदगति की प्राप्ति होती है। इसी कारण यहां व्यास, वसिष्ठ, मनु, जमदग्नि, परशुराम आदि ऋषि महर्षियों ने देवी की उपासना की थी।

45- उत्कल शक्तिपीठ
उड़ीसा की उत्कल शक्तिपीठ को लेकर दो मत है। पहला मत यह है कि पुरी में जगन्नाथजी के मंदिर के प्रांगण में ही स्थित विमला देवी का मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहां देवी सती के शरीर की नाभि गिरी थी। यहां की शक्ति विमला और भ्ौरव जगन्नाथ हैं। दूसरा मत है कि याजपुरमें ब्रह्मकुंड के समीप स्थित विरजा देवी का मंदिर शक्तिपीठ है। कुछ विद्बान इसी को नाभि पीठ मानते हैं। मंदिर में विरजा देवी और उनके वाहन सिंह की मूर्ति है, देवी द्बिभुजा है। देवी के प्राकटñ के विषय में एक किंवदन्ती है कि ब्रह्मा जी ने पहले यहां यज्ञ किा था, उसी यज्ञकुण्ड से विरजा देवी का प्राकटñ हुआ था। याजपुर-हावड़ा- वाल्टेयर लाइन पर वैतरणी रोड स्टेशन से लगभग 18 किलोमीटर दूर है , स्टेशन से याजपुर तक के लिए बस की सुविधा है। याजपुर नाभि गया क्ष्ोत्र माना जाता है। यहां श्राद्ध, तर्पण आदि का विश्ोष महत्व है। उड़ीसा के चार मुख्य स्थानों-पुरी, भुवनेश्वर,कोणार्क और याजपुर में से यह एक मुख्य स्थान है। इसे चक्र क्ष्ोत्र माना जाता है। यहां वैतरणी नदी है। वैतरणी नदी के घाट पर अनेक मंदिर हैं। जिनमें गण्ोश मंदिर और विष्णु मंदिर प्रसिद्ध है। वाराह भगवान का मंदिर यहां का सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इमें भगवान यज्ञवाराह की मूर्ति है। घाट से लगभग दो किलोमीटर की दूरी प्रचीन गरुण स्तम्भ है, इसी के पास विरजा देवी मंदिर स्थित है।

46- ज्वालामुखी शक्तिपीठ
पठानकोट-योगींद्र नग रेलमार्ग पर स्थित ज्वालामुखी रोड स्टेशन से लगभग 21 किलोमीटर दूर कॉगड़ा जिले में कालीधर पर्वत की सुरम्य तलहटी में ज्वालामुखी शक्तिपीठ है। इस पावन स्थल पर माता सती के शरीर की जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्तिपीठ सिद्धिकदा और भ्ौरव उन्मत्त हैं। मंदिर के अहाते में छोटी नदी के पुल के ऊपर से जाना होता है। मंदिर के भीतर पृथ्वी के भीतर से मशाल जैसी ज्योति निकलती है। शिवपुराण व देवी भागवत महापुराण में इसी देवी को ज्वाला रूप माना है।

यहां मंदिर के पीछे की दीवार के गोखले से चार, कोने में से एक, दाहिनी ओर की दीवार से एक और मध्य के कुड की भित्यिों से चार, इस तरह से दस प्रकाश निकलते है। इसके अतिरिक्त और कई प्रकाश मंदिर के भित्तिके पिछले भाग से निकलते है। इसमें से कई स्वत: बुझतेव प्रकाशित होते रहते है। ये ज्योतियां अनादि काल से प्रज्जवलित हैं। ज्योतियों को दूध पिलाया जाता है तो इसमें बत्ती तैरने लगती है। ज्योतियों की संख्या अधिक से अधिक तेरह व कम से कम तीन होती है। देवी मंदिर के पीछे छोटे मंदिर में कुआँ हैं, उसकी दीवार से दो प्रकाश पुंज निकलते है। पास के दूसरे कुएं में जल है। उसे लोग गोरखनाथ डिभी कहते है। आसपास काली देवी के और अन्य कई मंदिर है। मंदिर के सामने जलकुंड है, उससे जल बाहर निकाल कर स्नान किया जाता है।

भगवती ज्वाला जी मंदिर के निर्माण के विषय में एक दंतकथा है। उस दंत कथा के अनुसार सतयुग में सम्राट भूमि चंद्र ने अनुमान किया कि जिस समय सती के मृतक शरीर को लेकर श्री शिवजी तीनों लोकों में भ्रमण कर रहे थे, उस समय भगवान श्री हरि ने उन्हें माया के वशीभूत हुआ जानकर अपने सुदर्शन चक्र से सती की मृत्यु काया शरीर को खंड-खंड कर दिया और भगवती की जिह्वा कट कर हिमालय के धौलाधार पर्वत पर कहीं गिरी। राजा भूमि चंद्र ने उस स्थान को ढूंढने का बहुत प्रयत्न किया और सफलता  न मिली। तब उन्होंने भगवती का एक छोटा सा मंदिर सती के नाम से बनवाया और प्रतिदिन भक्ति भाव से पूजा करने लगे। कुछ समय व्यतीत होने के उपरांत एक दिन एक ग्वाले ने आकर सूचना दी कि एक पर्वत पर मैंने ज्वाला निकलती हुई देखी है जो दिव्य ज्योति के समान निरंतर जलती है। ग्वाले के मुख से यह सुनकर राजा भूमि चंद्र अत्यंत प्रसन्न हुए और ग्वाले के साथ उस स्थान पर गए और अपनी आंखों से दिव्य ज्वाला के दर्शन किए। तदोपरांत उस स्थान पर उन्होंने भव्य मंदिर का निर्माण कराया और देवी की सेवा तथा पूजा अर्चना हेतु साक द्वीप से भोजक जाति के दो ब्राह्मणों को पूजन आदि का अधिकार प्रदान किया। ब्राह्मणों के नाम पंडित श्रीधर तथा पंडित कमलापति थे। उन ब्राह्मणों के वंशज आज तक माता ज्वाला देवी के दरबार में पूजा करते आ रहे हैं।

47- कामाख्या शक्तिपीठ
यह पावन शक्तिपीठ असम में है। ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर गुवाहाटी के कामगिरी पर्वत पर भगवती आद्यशक्ति कामाख्या देवी की पावन पीठ है। यहां आने के लिए छोटी लाइन की पूर्वोत्तर रेलवे से अमीन गांव आना होता है। आगे ब्रह्मपुत्र नदी को स्टीमर से पार करके मोटर द्बारा लगभग पांच किलोमीटर चलकर कामाक्षी देवी आना होता है। चाहे तो आप पांडु से रेल द्बारा गुवाहाटी से आकर कामाक्षी देवी आ जाए। कामाक्षी देवी का मंदिर पहाड़ी पर हैं, जो लगभग डेढ से दो किलोमीटर ऊंची है। इस पहाड़ी को नील पर्वत कहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी सती के योनि भाग के यहां गिरने से इसे योनिपीठ भी कहा जाता है। यहां की शक्ति कामाख्या और भ्ौरव उमानंद यानी उमानाथ हैं।

योनिपीठं कामगिरौ कामाख्या यत्र देवता
यहां भगवती कामाख्या की पूजा व उपासना तंत्रोक्त आगम पद्धति से की जाती है। दूर-दूर से आने वाले यात्री आदि शक्ति की पूजा-अर्चना कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। कामाख्या यानी कामगिरी पर्व पर नीचे से लेकर ऊपर तक पत्थर का मार्ग है। जिसे नरकासुर पथ कहा जाता है। यह सीधा मार्ग है। वैसे अब वाहनों के लिए घुमावदार पथ बन गए हैं।
नरकासुर पथ के विषय में पुराणों में एक कथा है कि त्रेतायुग में वराह पुत्र नरक को भगवान नारायण द्बारा काम रूप राज्य में राजा का पद इस निर्देश के साथ प्रदान किया गया कि कामाख्या आदि शक्ति हैं, अत: इसके लिए प्रति सदैव भक्तिभाव बनाए रखों। नरक भ्ी श्री नारायण निर्देश का यथावत पालन कर सुखपूर्वक राज्य करने लगा। लेकिन बाद में वाणासुर के प्रभाव में आकर वह देव द्रोही असुर बन गया। अब असुर नरक ने कामाख्या देवी के रूप लावण्य पर मुग्ध होकर उनके समक्ष विवाह का अत्यन्त अनुचित आत्मघाती प्रस्ताव रखा। देवी ने तत्काल उत्तर दिया कि यदि रात्रि भर में तुम इस धाम का पथ, घाट और का भवन तैयार कर दो तो मैं सहमत हूं। नरक ने देव शिल्पी विश्वकर्मा को यह कार्य तत्काल पूर्ण करने का आदेश दिया। जैसे ही निर्माण पूरा होने को हुआ वैसे ही देवी के चमत्कार से रात्रि समाप्त होने के पूर्व ही मुर्गें ने प्रात:काल होने की सूचना बाँग देकर दी। अतएव विवाह की शर्त ज्यो की त्यों पूरी न होने से वैसा न हो सका। नरकासुर द्बारा निर्मित वह नरक पथ आज भी विद्यमान है। मुख्य मंदिर में जहां महाशक्ति महामुद्रा में शोभायमान हैं, उसे कामदेव मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। मंदिर के सम्बन्ध में नरकासुर का नाम सुनने में कहीं नहीं आता है। बताया जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से माता कामाख्या के दर्शन में बाधा पड़ने लगी तो महामुनि वसिष्ठ ने क्रुद्ध होकर श्राप दे दिया। फलस्वरूप यह यह कामाख्या पीठ लुप्त हो गई, लेकिन ईसा की 16 वीं शताब्दी में राजा विश्व सिंह ने भगवती का स्वर्ण मंदिर निर्मित कराया। कुछ दिनों बाद काला पहाड़ ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। फिर भी सौभाग्य की बात है कि राजा विश्व सिंह के पुत्र नरनारायण अर्थात भल्लदेव और उनके अनुज शुक्ल ध्वज ने वर्तमान मंदिर बनवा दिया, जैसा कि इस मंदिर में शिलालेखों से स्पष्ट हो जाता है। पर्वतीया गोसाई आजकल इस शक्तिपीठ की पूजा उपासना करते है। नीचे मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। महापीठ में प्रचलित पूजा व्यवस्था आहोम राजाओं की देन है। वैसे अब यहां आने-जाने वालों के लिए अलग से मार्ग बन गया है।

48- जयंती शक्तिपीठ
मेघालय भारत के पूर्व में स्थित एक पर्वतीय राज्य है। गारो, खासी और जयन्तिया यहां की मुख्य पहाडिèयां हैं। यहां की जयन्ती पहाड़ी को ही शक्तिपीठ कहा जाता है। यहां भगवती सती के शरीर के वाम जंघा गिरी थी। यह शक्तिपीठ शिलांग से करीब पचास किलोमीटर दूर जयन्तियां पर्वत पर वाउरभाग ग्राम में है। यहां की शक्ति जयंती और भ्ौरव क्रमदीश्वर हैं।

49- त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ
त्रिपुरा भी भारत के पूर्वी भाग का अंग है। यहां भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरसुंदरी का भव्य मंदिर है। उन्हींके नाम पर इस राज्य का नाम त्रिपुरा पड़ा। इस राज्य के राधाकिशोरपुर ग्राम से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर नैर्ऋत्यकोण में पर्वत पर यह शक्तिपीठ स्थित है। यहां देवी सती के शरीर का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुरसुंदरी और भ्ौरव त्रिपुरेश हैं।

5०- कुरुक्ष्ोत्र शक्तिपीठ
हरियाणा के कुरुक्ष्ोत्र नगर में द्बैपायन सरोवर के पास यह शक्तिपीठ है। यहां काली माता और स्थाणु शिव के मंदिर बने हुए हैं। किंवदन्ती है कि महाभारत युद्ध के पूर्व पांडवों ने विजय की कामना से यहां माता काली का पूजन व यज्ञ किया था। यहां की शक्ति सावित्री और भ्ौरव स्थाणु हैं।

51- कालमाधव शक्तिपीठ
यहां पर देवी सती के शरीर का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति को काली और भ्ौरव को असितांग कहा जाता है। इस शक्तिपीठ के विषय में विश्ोष रूप सेकुछ नहीं कहा जा सकता है कि यह कहा पर स्थित है। तंत्र चूडामणि में इस पीठ का इस भांति उल्लेख मिलता है।
…………………. नितम्ब: कालमाधवे।।
भ्ौरवश्चासितांगश्च देवी काली सुसिद्धिदा।

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