कलियुग का मानव चरित्र, क्या होगा घटित

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लियुग में धर्म का लोप होता है और अधर्म की वृद्धि होती है। यह तो सभी जानते हैं, मानते हैं और महसूस भी करते हैं। कलियुग के जैसे-जैसे धर्म का लोप हो रहा है। पाखंडियों का बोलबाला हो रहा है। ढोंगी बाबा बन कर आम जन को ठग रहे है। संतों का बुरा हाल हो रहा है। आश्रम व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी है। अर्थ संग्रहित करने में ही पूरा जीवन व्यतीत हो रहा है। जीवन काम प्रधान हो रहा है। अंर्तचेतना के स्थान पर वाह्य सुख को लेकर हर आम-खास में आसक्ति बढ़ रही है। ऐसे कलयुग के बारे में जो आज हो रहा है, वह धर्म शास्त्रों में लाखों वर्ष पहले ही वर्णित किया जा चुका है। आइये, जानते है, कलियुग के चरित्र के बारे में-

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कलियुग को काला युग भी कह सकते हैं। वास्तव में यह कलह-क्लेश का युग है । जिस युग में सभी के मन में असंतोष हो, सभी मानसिक रूप से दुखी हों, वही कलियुग है। इस युग में धर्म का सिर्फ एक चौथाई भाग ही रह जाता है। कलियुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व हुआ था। वर्तमान में 2०19 चल रहा है।

श्रीमद्भागवत पुराण और भविष्यपुराण में कलियुग के अंत का विस्तार से वर्णन मिलता है। कलियुग में भगवान विष्णु का कल्कि रूप में अवतार होगा, जो पापियों का संहार करके फिर से सतयुग की स्थापना करेंगे। कल्कि धर्म की रक्षा कर सबको धर्म पथ पर डालेगें । कलियुग के अंत में संसार में अन्न नहीं उगेगा। लोग मछली-मांस ही खाएंगे और भेड़ व बकरियों का दूध पिएंगे। गाय तो दिखना भी बंद हो जाएगी। होगी तो वह बकरी समान होगी। एक समय ऐसा आएगा, जब जमीन से अन्न उपजना बंद हो जाएगा। पेड़ों पर फल नहीं लगेंगे। धीरे-धीरे ये सारी चीजें विलुप्त हो जाएंगी। गाय दूध देना बंद कर देगी।

मनुष्य की औसत आयु 20 वर्ष ही रह जाएगी। पांच वर्ष की उम्र में स्त्री गर्भवती हो जाया करेगी। 16 वर्ष में लोग वृद्ध हो जाएंगे और 20 वर्ष में मृत्यु को प्रा‍प्त हो जाएंगे। इंसान का शरीर घटकर बोना हो जाएगा। ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि कलियुग में ऐसा समय भी आएगा जब इंसान की उम्र बहुत कम रह जाएगी, युवावस्था समाप्त हो जाएगी। कलि के प्रभाव से प्राणियों के शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेंगे।

श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध में कलयुग के धर्म के अंतर्गत श्रीशुकदेवजी परीक्षितजी से कहते हैं, ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्ति का लोप होता जाएगा। लोगों की आयु भी कम होती जाएगी। जब कलिकाल बढ़ता चला जाएगा। कलयुग के अंत में जिस समय कल्कि अवतार अव‍तरित होंगे उस समय मनुष्य की परम आयु केवल 20 या 30 वर्ष होगी। जिस समय कल्कि अवतार आएंगे। चारों वर्णों के लोग क्षुद्रों (बोने) के समान हो जाएंगे। गौएं भी बकरियों की तरह छोटी छोटी और कम दूध देने वाली हो जाएगी।

श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध में कलयुग के धर्म के अंतर्गत श्रीशुकदेवजी परीक्षितजी से कहते हैं, ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्ति का लोप होता जाएगा। लोगों की आयु भी कम होती जाएगी जब कलिकाल बढ़ता चला जाएगा।

स्त्रियां कठोर स्वभाव वाली व कड़वा बोलने वाली होंगी। वे पति की आज्ञा नहीं मानेंगी। जिसके पास धन होगा उसी के पास स्त्रियां रहेगी। मनुष्यों का स्वभाव गधों जैसा दुस्सह, केवल गृहस्थी का भार ढोने वाला रह जाएगा। लोग विषयी हो जाएंगे। धर्म-कर्म का लोप हो  जाएगा। मनुष्य जपरहित नास्तिक व चोर हो जाएंगे। सभी एक-दूसरे को लूटने में रहेंगे। कलियुग में समाज हिंसक हो जाएगा। जो लोग बलवान होंगे उनका ही राज चलेगा। मानवता नष्ट हो जाएगी। रिश्ते खत्म हो जाएंगे। एक भाई दूसरे भाई का ही शत्रु हो जाएगा। जुआ, शराब, परस्त्रिगमन और हिंसा ही धर्म होगा।

पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा।

निरुद्वेगो वृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते।।

म्लेच्छीभूतं जगत सर्व भविष्यति न संशयः।

हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते।।

पुत्र, पिता का और पिता पुत्र का वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे। अपनी प्रशंसा के लिए  लोग  बड़ी-बड़ी बातें  बनायेंगे, लेकिन  समाज  में  उनकी निन्दा नहीं होगी। उस समय सारा जगत्  म्लेच्छ हो जाएगा। इसमें संशयम नहीं। एक हाथ दूसरे हाथ को लूटेगा।

कलियुग में लोग शास्त्रों से विमुख हो जाएंगे। अनैतिक साहित्य ही लोगों की पसंद हो जाएगा। बुरी बातें और बुरे शब्दों का ही व्यवहार किया जाएगा। स्त्री और पुरुष, दोनों ही अधर्मी हो जाएंगी। स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करना बंद कर देगी और पुरुष भी ऐसा ही करेंगे। स्त्री और पुरुषों से संबंधित सभी वैदिक नियम विलुप्त हो जाएंगे।

श्रीमद्भागवद और तुलसी कृत रामायण के अनुसार ही रामचरित के उत्तर कांड में काकभुशुण्डि का अपनी पूर्व जन्म कथा और कलि महिमा का वर्णन करने का उल्लेख करते हैं।

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।

दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥

भावार्थ:-कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए॥

कई हजार वर्ष पूर्व भागवत में शुकदेवजी ने जिस बारीकी से और विस्तार के साथ कलयुग का वर्णन किया है वह हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। आज उसी वर्णन अनुसार ही घटनाएं घट रही है और आगे भी जो लिखा है वैसा ही घटेगा।

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