मोती कब व कैसे करें धारण, जाने- गुण, दोष व प्रभाव

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चंद्र देव की कृपा से सौंदर्य की प्राप्ति होती है। चंद्रमा सुंदरता प्रदान करने वाले देव है। मोती को चंद्रमा का रत्न कहा जाता है। इसके स्वामी चंद्रमा हैं। इसे धारण करने से चंद्र दोष समाप्त हो जाते हैं। अंग्रजी में इसे पर्ल कहते है, जबकि संस्कृत में इसे मुक्ता, शक्तिज, इंद्र रत्न इत्यादि नाम से जाना जाता है।

आइये जानते है मोती के आकार-प्रकार

वैदिक धर्म शास्त्रों में मोती के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, हम आपको संक्ष्ोप में बताने का प्रयास कर रहे हैं। आइये मोती के प्रकार के बारे में सबसे पहले जानते है-
1- गज मुक्ता मोती
यह सर्वश्रेष्ठ मोती माना जाता है। वास्तव में यह बेहद दुर्लभ रत्न है और बेहद कठिनता से प्राप्त होता है। माना जाता है कि जिन हाथियों का जन्म पुष्य या श्रवण नक्षत्र में रविवार या सोमवार को उत्तरायणगत सूर्यकाल में होता है, अक्सर उनके मस्तक में इस किस्म का मोती पाया जाता है। इसके अलावा हाथियों के दंत कोष या कुम्भ स्थलों में भी यह मोती मिलता है। यह सुडौल स्निग्ध और तेजमय होता है। इसे देखते ही आंखों में शीतलता का आभास होता है। यदि इसे शुभ मुहूर्त में धारण किया जाए तो समस्त कष्ट दूर हो जाते है। सारे घर में सुख-शांति और खुशी का वातावरण छा जाता है।
2- सर्प मुक्ता मोती
माना जाता है कि यह मोती श्रेष्ठ वासुकि जाति के सर्प के सिर में पाया जाता है। जैसे-जैसे सापों की उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे यह मोती बढ़ता जाता है। इस मोती को लेकर यह धारणा है। यह हल्के नीले रंग का तेजयुक्त और बेहद प्रभावकारी होता होता है। यह भी बेहद दुर्लभ श्रेणी के रत्नों में शामिल है। यह रत्न बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। इसे पहनने से हर तरह की बाधाएं और दुख दूर हो जाते हैं। विष का प्रभाव भी समाप्त हो जाता है।
3- मीन मुक्ता मोती
माना जाता है कि यह मोती मछली के पेट में मिलता है, इसका आकार चने की तरह, रंग पीला और चमकदार होता है। इससे पानी में प्रकाश सा उत्पन्न होता है। यदि इसे पहन कर नदी में डुबकी लगाई जाए तो इसके प्रकाश से पानी के अंदर की वस्तुएं स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। यह क्षय रोग में रामबाण की तरह काम करता है। यह बेहद प्रभावशाली मोती माना जाता है। हालांकि यह भी बेहद दुर्लभ मोती की श्रेणी में आता है।
4- बंश मुक्ता मोती
यह मोती बासों में पाया जाता है। स्वाति, पुष्य या श्रवण नक्षत्र से एक दिन पहले से बंश मुक्ता की ध्वनि उपरने लगती है। सम्बन्धित नक्षत्र के समाप्तिकाल तक यह वेद ध्वनि के समान गूंजता रहता है। ऐसे समय में जिस बांस में यह मोती होता है, उसे बीच से काटकर उसे गर्भ स्थल से निकाल लिया जाता है। इसका रंग हजरा और आकार गोल होता है। इसे बींधा नहीं जा सकता है। बंश मुक्ता प्राप्त करने वाले भाग्यशाली ही होते हैं। इसे धारण करने से भाग्य का उदय होता है और घर में भरपूर धन-सम्पत्ति का आगमन होता है। धारक आसानी से राजपक्ष व सामाजिक पक्ष में उच्च पद पर पहुंच जाता है।
5- आकाश मुक्ता मोती
माना जाता है कि पुष्य नक्षत्र में घटाटोप आकाश के मेघों से कभी-कभार ऐसे मोती की वर्षा होती है। इसे सम्पूर्ण वर्षा के दौरान सिफ एक या दो मोती नीचे गिरते हैं। यह विद्युत के समान तेजपूर्ण एवं गोलाकार होता है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति परम तेजस्वी व भाग्यशाली बनता है। जीवन में उसे कई बार खजाना या गड़ा-दबा धन प्राप्त होता है। यह बेहद दुर्लभ मोतियों की श्रेणियों में शामिल है।
6- शंख मुक्ता मोती
शंख मुक्ता आमतौर पर समुद्र में स्थित पांचजन्य नामक शंख में पाया जाता है। ज्वार व भाटे के समय में यह अक्सर प्राप्त होता है। ऐसा मोती शंख की नाभि में स्थित रहता है। इसका रंग हल्का नीला, सुडौल व सुंदर होता है। इस पर तीन लकीरें यज्ञोपवीत की तरह खिंची होती है। इसे भी नहीं बींधा जा सकता है। इसमें चमक नहीं होती है। यह रोगहारक और प्रत्येक अभाव को दूर करने वाला है।

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7- मेघ मुक्ता मोती
अगर रविवार को पुष्य या श्रवण नक्षत्र हो तो उस दिन की वर्षा में इस श्रेणी का मोती इक्का-दुक्का कहीं न कहीं गिरता है। इसका रंग मेघ के समान अक्षुण्य चमक युक्त होता है। इसे पहनने से जीवन में किसी तरह का अभाव नहीं रहता है।

8- शूकर मुक्ता मोती
वाराह श्रेणी में उत्पन्न शूकर के यौवनावस्था में यह मोती उसके मस्तिष्क से प्राप्त होता है। यह पीले रंग का गोल, सुंदर और चमकदार होता है। वाक् सिद्धि के लिए शूकर मोती बेहद उपयोगी होता है। यह स्मरण शक्ति को तीव्र बनाता है। गर्भिणी स्त्री को शूकर मोती पहनाने से पुत्र लाभ होता है।

9- सीप मुक्ता मोती
अधिकांश मोती सीपों से ही प्राप्त होते हैं। जापान में कृतिम मोती तैयार किए जाते हैं। धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि स्वाति नक्षत्र में गिरी जल की बूंदे जब सीप ग्रहण करते हैं तो मोती का जन्म होता है। इस पर चंद्रमा का पूर्ण प्रभाव होता है। आकृति में भिन्नताएं होती हैं। ये चपटे, गोल, बेडौल, लम्बे, सुडौल व तीख्ों होते हैं। यह दुनिया भर में समूद्र में मिलते हैं।

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श्याम व बसरे की खाड़ी में पाये जाना वाला मोती सर्वोत्तम माना जाता है। बसरे का मोती गोल होता होता है। इसका रंग हल्का पीला होता है। इसे पहनने से सुख, धन और आनंद की प्राप्ति होती है। स्वास्थ्य पर भी इसका अच्छा प्रभाव देखने में आया है।
1०- शुक्ति मुक्ता मोती
शुक्ति मुक्ता मोती भी सीप में से ही निकलता है।

कुछ अन्य मोती भी होते हैं- सुतार मोती- इस मोती में तारे के समान रश्मियां स्फुटित होती हैं। निर्मल मोती- यह मोती गोल व दाग रहित होता है। मुक्तक या सुधा मोती- काँच से देखने पर इस मोती की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। सुच्छ मुक्तक मोती- यह मोती सर्व प्रकार के दोषों से रहित होता है। सुवृत मोती- इसमें सभी प्रकार से पूर्ण गोलाई होती है। स्निग्ध मोती- यह माती हाथ में लेने पर चिकना प्रतीत होता है। अस्फुटिक मोती- यह रेखाओं से एकदम रहित होता है। धन मुक्तक मोती- यह मोती अन्य मोतियों की बराबरी में रहने पर भी अन्य से वजन में अधिक होता है।

जानिए, मोती की पृष्ठभूमि क्या है


ऋग्वेद व अथर्ववेद में मोती का वर्णन मिलता है। इसमें मोती को कृशन कहा गया है। पिपराव में खोदाई के दौरान मिले शाक्य मुनि के अवश्ोषों में मोती के दाने मिले है। आयुर्वेद और ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में मोती, मोक्तिहार और मुक्ताजल के विषय में विस्तार से बताया गया है। मोती फारस की खाड़ी, श्रीलंका, बंगाल की खाड़ी, अस्ट्रेलिया, बेनेजुएला और जापान आदि से प्राप्त होते हैं। यह प्रशांत महासागर में भी मिलते हैं। फारस की खाड़ी से प्राप्त होने वाला मोती जो मोहर नाम की सीप से निकलता है, उसे सर्वोत्तम माना जाता है।

कृतिम मोती का जन्म
कृत्रिम मोती का इतिहास काफी पुराना है। जापान में कृतिम मोती बनाए जाते है। जापान ने 1951 में ऐसे मोती बाजार में प्रस्तुत किए। नकली मोती का जिक्र शुक्र नीति व गरुण पुराण में भी मिलता है।

आइये जानते है मोती के गुण
श्रेष्ठ मोती तारे के समान दीप्तिमान होता है। ऐसे मोती मुतार है, जो गोल होता है। यह सुवृत्तम, स्वच्छ, अत्यन्त शुचित, ठोस व चिकना होता है। उसमें परछाई दिखती है। यह कभी भी चोट खाया हुआ नहीं होता है और न ही उस पर किसी प्रकार की रेखाएं होती हैं।

मोती की शुद्धता की जांच कैसे करें

1-मोती को धान की भूसी से खूब मलें। अगर मोती चूरा जो जाए तो उसे नकली समझें। असली मोती होने पर उसकी चमक और अधिक बढ़ जाएगी।
2- गाय का मूत्र किसी मिSी के बर्तन में लेकर उसमें मोती डाल दें। उसे रात भर रहने दें। अगर सुबहर मोती टूटा हुआ न मिले तो उसे शुद्ध एवं असली माना जाए।
3- किसी काँच के बर्तन या गिलास में मोती डाल दें। अगर उसमें से किरण्ों निकलती दिखाई दें तो उसे शुद्ध मोती मानना चाहिए।
4- मोती को घी में डाल दें। यदि घी पिघल जाए तो उसे शुद्ध समझें।

ऐसे मोती को धारण करना स्वयं को नुकसान पहुंचाना होता है

1- जो मोती तीन कोणों वाला हो, यह धारक को नपुंसक बनाता है और बुद्धि बल का नाश करता है।
2- जो मोती टूटा हुआ हो, उसे धारण नहीं करना चाहिए। यह हानि पहुंचाता है। इसे धारण करने से मनुष्य में अस्थिरता बढ़ती है।
3- जो मेंडा हो, यानी जिसके चारों ओर वृत्ताकार रेखा खिंची दिखाई दे, ऐसे मोती को धारण करने से स्वास्थ्य पर प्रतिकुल असर पड़ता है। स्वास्थ्य खराब होता है। सबसे ज्यादा प्रभाव हृदय पर पड़ता है।
4- मोती जो रेखित हो यानी उसमें लहरदार रेखा हो। इसे धारण करने से आर्थिक हानि होती है।
5- जो मोती चपटा और चौकोर होता है। उसे नहीं धारण करना चाहिए। इससे पत्नी का नाश होता है।
6- जिस मोती पर मोटा काला धब्बा हो यह संतान के लिए अत्यन्त हानिकारक होता है।
7- जो मोती चपटा हो, यह सुख और सौभाग्य को छीन लेता है और चिंताएं बढ़ाता है।
8- मोती जिसमें एक या कई रंग के धब्बे दिखाई देते हो, इसे बेहद अशुभ माना जाना चाहिए। यह स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। इसे पहनने से बल-बुद्धि वीर्य का नाश हो जाता है।
9- मोती, जिस पर कहीं भी एक छोटा धब्बा दिखाई दे तो तो इसे भी अशुभ ही माने। इसके धारण करने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
1०- जिस मोती में कोई चमक न हो, उसे अशुभ ही माने। इससे गरीबी और दरिद्रता बढ़ती है।
11- बेडौल व लम्बा मोती बुद्धि-बल का नाश करने वाला होता है।
12- जिस मोती के गर्भ में लम्बी लकीर दिखाई दे, उसे धारण करने से दुख ही बढ़ता है।
13- ऐसा मोती, जो तांबे के रंग का होता है, यह कुल का नाश करने वाला है।
14- लाल या रक्त के रंग जैसा मोती दुख व दरिद्रता बढ़ाता है।

मोती के उपरत्न भी होते है, जानिए कौन हैं उपरत्न

मोती थोड़ा कीमती रत्न है। यदि आपकी जेब इसे खरीदने की इजाजत नहीं दे रही है तो चंद्रमा के उपरत्न भी होते है। यह अपेक्षित रूप से सस्ते होते हैं। मोती का उपरत्न है मणि। इसे निमरू के नाम से भी जाना जाता है। यह रत्न चांदी के समान दूधिया सफेद होता है। एक सच यह भी है कि यह मोती की तरह प्रभावशाली नहीं होता है, लेकिन निश्चित तौर पर आपको थोड़ी राहत जरूर पहुंचा कर यह फायदेमंद जरूर रह सकता है। निमरू के अलावा एक और र‘ होता है। उसका नाम है चंद्रकांता मणि। जिसे धारण किया जा सकता है। देखा जाए तो यह सफेद रंग का पुखराज होता है। अगर इसे एक ही अंगूठी में मोती और चंद्रकांत मणि दोनों को जड़वा कर पहना जाए तो तत्काल वांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। मोती के धारक श्वेत संग, नील संग और गौरी संग भी पहन सकते हैं।
आइये, जानते हैं, मोती को कौन धारण करें
वास्तव में मोती चंद्रमा का रत्न है। जिसकी जन्म कुंडली में चंद्रमा क्षीण, कमजोर या दूषित होता है, उसे मोती आवश्य धारण करना चाहिए।
1- अगर जन्म कुंडली में चंद्रमा सूर्य के साथ हो या सूर्य से अगली पांच राशियों के पहले स्थित हो तो वह क्षीण्ण होता है। तब व्यक्ति को मोती धारण करना चाहिए।
2- केंद्र में पड़ा चंद्रमा हल्का होता है। ऐसी स्थिति में धारक को मोती पहनना चाहिए।
3- अगर चंद्रमा द्बितीय या धन भाव का स्वामी यानी मिथुन लग्न में होकर कुंडली के छठें स्थान में स्थित हो, तो मोती धारण करना अच्छा होता है।
4- अगर जन्म कुंडली में चंद्रमा पंचमेश होकर बारहवें भाव में, सप्तमेश होकर दूसरे भाव, नवमेश होकर चतुर्थ भाव में, दशमेश होकर पंचम भाव में और एकादश्ोश होकर षष्ठम भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति को यथा शीघ्र मोती धारण करना चाहिए।
5- अगर कुंडली में लग्नेश चंद्र सप्तम भाव में, चतुर्थ्ोंश चंद्र नवम भाव में, पंचमेश चंद्र दशम भाव में, सप्तमेश चंद्र द्बादश भाव में, नवमेश चंद्र द्बितीय भाव में, दशमेश चंद्र तृतीय भाव में और एकादश्ोश चंद्र चतुर्थ भाव में हो तो उस मनुष्य को तत्काल मोती धारण कर लेना चाहिए।
6- यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र वृश्चिक राशि में होकर कहीं भी स्थित हो तो उसे व्यक्ति को मोती आवश्य पहनना चाहिए।
7- जिस व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा राहु, केतु या शनि में से किसी भी ग्रह के साथ बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति को मोती धारण करना चाहिए।
8- जिसकी कुंडली में चंद्रमा षष्ठम, अष्ठम या द्बादश भाव में स्थित हो, उसे मोती आवश्य ही धारण करना चाहिए। यह उसके लिए लाभदायक होता है।
9- अगर चंद्रमा पर राहु, केतु, मंगल और शनि में से एक या अधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को मोती आवश्य की ही धारण करना चाहिए।
1०- अगर चंद्रमा अपनी राशि से छठे या आठवें भाव में पड़ा हो तो मोती धारण करने से जातक को निश्चित रूप से बहुत लाभ होता है।
11- अगर चंद्रमा नीच, वक्री या अस्तगत हो या राहु के साथ ग्रहण योग बना हो तो मोती पहनना निश्चित रूप से बेहद लाभप्रद रहता है।
12- यदि विंशोत्तरी पद्धति से चंद्रमा की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो तो ऐसे जातक को मोती निश्चित रूप से धारण करना चाहिए।

जानिए, राशि के मुताबिक मोती का व्यवहार

बारह राशियां होती हैं और मोती का इन पर भिन्न-भिन्न प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। आइये, इसे समझने का प्रयास करते हैं।
1- मेष लग्न की कुंडली में चंद्रमा चतुर्थ भाव का स्वामी है। चतुर्थ्ोश चंद्र लग्नेश मंगल का मित्र है, इसलिए इस लग्न के जातक मोती धारण करके मानसिक शांति, मातृ- सुख, गृह-भूमि और विद्यालाभ प्राप्त कर सकते हैं। चंद्रमा की यदि महादशा चल रही हो तो मोती विश्ोष रूप से लाभप्रद रहता है। यदि मोती लग्नेश मंगल के रत्न मूंगे के साथ धारण किया जाए तो इसका अधिक फायदा जातक को मिलता है।
2- वृष लग्न की कुंडली में चंद्रमा तृतीय भाव का स्वामी है। इस लग्न के जातक को मोती मोती कभी भी नहीं धारण करना चाहिए।
3- मिथुन लग्न में चंद्र द्बितीय स्थान यानी धन भाव का स्वामी है। चंद्र की महादशा में हर लग्न का जातक मोती धारण कर सकता है। परन्तु इसके लिए विश्ोष आग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि मिथुन लग्न के लिए चंद्रमा मारकेश भी है। फिर भी कुंडली में चंद्रमा द्बितीय भाव का स्वामी होकर नवम, दशम या एकादश भाव में स्थित हो या फिर द्बितीय स्थान पर कर्क राशि पर स्वराशिस्थ हो तो चंद्र की महादशा में मोती पहनने से धन लाभ होता है।
4- कर्क लग्न में चंद्र लग्नेश है, इसलिए ऐसे जातक को आजीवन मोती धारण करना चाहिए। यह हर मामले में उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। यह स्वास्थ्य लाभ देता है। आयु में वृद्धि करता है और आर्थिक संकट से बचाता है।
5- सिंह लग्न में चंद्रमा बारहवें भाव का स्वामी है। इसलिए इस लग्न के जातकों को मोती आवश्य धारण करना चाहिए। परंतु यदि चंद्र द्बादश भाव में अपनी ही कर्क राशि में स्थित हो तो चंद्रमा की महादशा में मोती धारण किया जा सकता है।
6- कन्या लग्न में चंद्रमा एकादश भाव का स्वामी है। एकादश भाव लाभ स्थान है। इसलिए चंद्रमा की महादशा में मोती धारण करने से आर्थिक लाभ, यश, कीर्ति व संतान आदि की प्राप्ति होती है।
7- तुला लग्न में चंद्रमा दशम भाव का स्वामी है। हालांकि चंद्रमा और लग्नेश शुक्र मित्र नहीं है, लेकिन तुला लग्न वाले जातकों को मोती धारण करने पर राज्य कृपा, यश कीर्ति और मान- सम्मान की प्राप्ति होती है। चंद्र की महादशा में मोती धारण करना विश्ोष लाभकारी होता है।
8- वृश्चिक लग्न में चंद्रमा नवम भाव का स्वामी है। नवम भाव भाग्य का स्थान होता है। इसलिए वृश्चिक लग्न के जातक द्बारा मोती धारण करने पर धर्म, कर्म और भाग्य के मामले में उन्नति होती है। पितृ सुख मिलता है और यश-मान बढ़ता है। चंद्रमा की महादशा में इस रत् न को धाने पर विश्ोष लाभ होता है।
9- धनु लग्न में चंद्रमा अष्टम भाव का स्वामी है। आष्टम भाव मारक होता है, इसलिए इस लग्न के जातकों द्बारा मोती धारण करने से चंद्रमा शक्तिशाली हो जाएगा और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए इस लग्न के जातकों को मोती नहीं पहनना चाहिए।
1०- मकर लग्न में चंद्रमा सप्तम भाव का स्वामी है। सप्तम भाव मारक स्थान है। इसलिए मकर लग्न वाले जातकों को कभी भी मोती धारण नहीं करना चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मकर लग्न का स्वामी शनि हैं। शनि और चंद्रमा एक- दूसरे के शत्रु हैं। इसलिए इस लग्न के जातकों को मोती पहनना किसी दृष्टि से लाभकारी नहीं होगा।
11- कुम्भ लग्न की भी लगभग वहीं स्थिति है। इस लग्न में चंद्रमा छठे भाव का स्वामी है। छठा भाव शत्रु स्थान होता है। इसके अलावा कुम्भ लग्न का स्वामी शनि हैं, इसलिए इस लगÝ के जातकों द्बारा मोती धारण करने पर अनायास शत्रुता बढ़ेंगी और स्वास्थ्य में गिरावट आयेंगी।
12- मीन लग्न में चंद्रमा पंचम त्रिकोण का स्वामी हैं। पंचम भाव विद्या, बुद्धि आदि का स्थान होता है। इसलिए इस लग्न के जातकों को मोती धारण करने पर अत्यधिक लाभ होगा। उन्हें संतान सुख, विद्या लाभ, यश-कीर्ति और मान-सम्मान इत्यादि प्राप्त होगा।
जानिए, कैसे धारण करें मोती

दो, चार, छह या ग्यारह रत्ती का मोती चांदी की अंगूठी में धारण करना चाहिए। इसे सोमवार या गुरुवार को खरीदना व मढ़वाना चाहिए। फिर किसी शुक्ल पक्ष के सोमवार को विधिनुसार उपासना आदि करके और 11००० बार ऊॅँ सोमाय: नम:…… मंत्र का जप करके संध्या के समय धारण करना चाहिए।

जानिए मोती के विकल्प क्या हैं?

मोती के बदले चंद्रकांत मणि या सफेद पुखराज पहना जा सकता है लेकिन यह आवश्य ध्यान रखना चाहिए कि मोती या उसके विकल्प के साथ हीरा, पन्ना, गोमेद और लहसुनिया न कभी धारण किया जाए।

जानिए, रोग उपचार में मोती की भूमिका 
धर्म ग्रंथों में यह चेतावनी दी गई है कि मोती को शुद्ध किए बिना इसे प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए। अन्यथा इसके विपरीत परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कहने का आशय यह हुआ कि बिना शुद्ध किए मोती के प्रयोग से बीमारी और बढ़ सकती है। वैसे आयुर्वेद व यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसका प्रयोग होता आ रहा है। मोती की दवाएं कुछ इस प्रकार है, जैसे मुक्त पंचामृत चूर्ण, बसंत कुसुमाकर इत्यादि, लेकिन इनका प्रयोग किसी अनुभवी आयुर्वेदाचायã के परामर्श पर ही करें तो बेहतर होता है।

1- मोती का भस्म हृदय को बल देता है। टायफाइड होने पर मोती को किसी बर्तन में डालाकर पानी से भर दें। वही पानी मरीज को पिलाने पर शीघ्र फायदा होता है और कमजोरी दूर होती है।
2- मोती में नब्बे फीसदी चूना होता है, इसलिए कैल्शियम की कमी के कारण उत्पन्न रोगों में मोती चमत्कारिक ढंग से फायदा पहुंचाता है।
3- मोती के चूर्ण का अंजन लगाने पर नेत्र रोगों से छुटकारा मिलता है। इससे आंखों की ज्योति भी बढ़ती है।
4- पथरी में भी मोती लाभप्रद है। मोती के भस्म शहद के साथ लेने पर शीघ्र लाभ होता है।
5- पेशाब में जलन होने पर मोती का भस्म केवड़े के जल के साथ लें, तत्काल फायदा होगा।
6- अगर शरीर में अधिक गर्मी हो तो शुद्ध मोती पहनना उत्तम रहता है।
7- बवासीर और जोड़ों के दर्द में मोती का भस्म रामबाण की तरह काम करता है।
8- क्षय रोग में इसका व्यवहार करने पर ज्वर कम होता है।
9- स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए मोती का भस्म या पिष्टी बहुत ही लाभकारी होती है। इससे उम्माद व वायु विकार से सम्बन्धित कई रोग दूर होते हैं।
1०- मोती के भस्म के प्रयोग करने से पाचन शक्ति बढ़ती है।
11- पुरुषों के शुक्रमेह और स्त्रियों के प्रदर रोग में इसका भस्म अत्यधिक लाभकारी माना जाता है।
12- मोती थकावट व दुर्बलता को दूर करता है।

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