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कर्नाटक के नेता सी टी रवि के खिलाफ एक मुकदमे पर रोक

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नयी दिल्ली, 19 मई (एजेंसी)। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी के नेता सी टी रवि की कर्नाटक विधान परिषद में महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर के खिलाफ कथित टिप्पणी के बाद उन (रवि) पर दर्ज मुकदमे को रद्द करने से इनकार करने वाले उच्च न्यायालय के एक आदेश पर सोमवार को रोक अंतरिम लगा दी और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने विधान परिषद में की गई टिप्पणियों के लिए 19 दिसंबर, 2024 को दर्ज मुकदमे के मामले में किसी भी तरह कार्यवाही पर रोक लगा दी।

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याचिकाकर्ता रवि ने उच्च न्यायालय के 2 मई, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता रवि के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 75 और 79 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उनकी याचिका में कहा गया है कि आपराधिक जांच की शुरुआत और जारी रहना स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 194(2) के तहत दिए गए संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करता है, जो विधानमंडल या उसकी किसी समिति में उनके द्वारा कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी वोट के लिए राज्य विधानमंडल के सदस्यों को पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान करता है। याचिका में आगे कहा गया है, “उक्त प्रतिरक्षा विधायी विशेषाधिकार की संवैधानिक गारंटी का एक आवश्यक पहलू है, जिसे विधायी कार्य की स्वतंत्रता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया है।”

याचिका में कहा गया है, “यह दृष्टिकोण संविधान के मूल ढांचे, विशेष रूप से शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत और विधायी निकायों की स्वायत्तता को कमजोर करता है।”

याचिका में कहा गया है कि वास्तव में, अध्यक्ष को शिकायत की गई थी, लेकिन उन्हें कोई वॉयस रिकॉर्डिंग या पुष्टि करने वाली सामग्री नहीं मिली। इसके बजाय, सदन के आंतरिक अनुशासन और प्रक्रिया का पालन करते हुए मामले को आचार समिति को भेज दिया गया, जहां इस समय इसकी जांच लंबित है।

याचिका में कहा गया है कि अध्यक्ष ने वास्तव में गृह सचिव को एक औपचारिक पत्र लिखकर मामले में पुलिस कार्रवाई को तत्काल रोकने का अनुरोध किया है। यह भी कहा गया है कि इस हस्तक्षेप के बावजूद, पुलिस विधायी विशेषाधिकार और संवैधानिक सीमाओं की अवहेलना करते हुए मामले को आगे बढ़ा रही है।

याचिका में तर्क देते हुए कहा गया है कि सीता सोरेन बनाम भारत संघ- (2024) मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से पुष्टि की है कि सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित विधायी विशेषाधिकार न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं आता है।

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