Advertisement
Home International ट्रंप क्या भारत को घेरने की रणनीति में कर रहे हैं ऐतिहासिक...

ट्रंप क्या भारत को घेरने की रणनीति में कर रहे हैं ऐतिहासिक भूल?

0
944

500% टैरिफ की धमकी, चीन पर नरमी और भारत पर गर्मी

नई दिल्ली, 9 जनवरी (एजेंसियां)। अमेरिकी राजनीति एक बार फिर वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति को अस्थिर करने की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका न केवल रूस के खिलाफ शिकंजा कसने की तैयारी में है, बल्कि इसके बहाने भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर भी दबाव बनाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। अमेरिकी सीनेट में प्रस्तावित ‘रूस पर प्रतिबंध अधिनियम 2025’ इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस बिल के जरिए रूस की आर्थिक रीढ़ तोड़ने की योजना है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट भारत के लिए गंभीर हो सकते हैं।

इस कानून का सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि यदि रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर शांति वार्ता के लिए राजी नहीं होता, तो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा सकता है। भारत, जो यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहा है, सीधे इस दायरे में आ जाता है। यह महज आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर सीधा हमला माना जा रहा है।

Advertisment

डोनाल्ड ट्रंप की चीन से हाथ मिलाकर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। भारत को कमजोर समझना और रूस-भारत की मजबूती को नजरअंदाज करना एक ऐसी भूल है, जिसकी कीमत अमेरिका को वैश्विक मंच पर चुकानी पड़ सकती है।

चीन पर नरमी, भारत पर सख्ती – दोहरा मापदंड?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चीन रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है, तब उस पर अमेरिका की तलवार कुंद क्यों है? ट्रंप प्रशासन ने चीन के खिलाफ आक्रामक टैरिफ नीति अपनाने के बजाय सावधानी बरतने का रास्ता चुना है। अगस्त में चीनी आयात पर नए शुल्क को स्थगित कर दिया गया और टैरिफ 30 प्रतिशत पर रोक दिया गया, जबकि भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जा चुका है।

इसका कारण साफ है। चीन के पास दुर्लभ पृथ्वी तत्वों, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहनों के अहम घटकों, रक्षा उपकरणों और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक में वैश्विक नियंत्रण है। चीन ने हाल ही में दुर्लभ खनिजों और मैग्नेट्स के निर्यात पर लाइसेंस प्रतिबंध लगाकर यह साफ कर दिया कि अगर अमेरिका ज्यादा दबाव बनाएगा तो उसकी औद्योगिक सप्लाई चेन ठप हो सकती है। अमेरिकी ऑटोमोबाइल और टेक कंपनियों की निर्भरता चीन पर इतनी अधिक है कि वाशिंगटन खुला टकराव मोल लेने से डर रहा है।

भारत को अकेला करने की कोशिश?

इसके उलट, ट्रंप प्रशासन भारत को अपेक्षाकृत कमजोर कड़ी मानकर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है। ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से भारत की व्यापार नीतियों को ‘अनुचित’ बता चुके हैं। उनका आरोप है कि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर ऊंचे शुल्क लगाता है और बाजार तक पहुंच सीमित करता है। लेकिन असल नाराजगी की जड़ रूस से भारत की नजदीकी है।

अमेरिका यह मानकर चल रहा है कि भारत के पास चीन जैसी रणनीतिक मजबूती नहीं है और उसे दबाव में झुकाया जा सकता है। यही वजह है कि चीन से हाथ मिलाकर भारत को अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यही वह बिंदु है जहां ट्रंप की रणनीति भारी भूल साबित हो सकती है।

रूस-भारत की मजबूती, जो ट्रंप को खटकती है

रूस और भारत के संबंध दशकों पुराने हैं और यह रिश्ता सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा, कूटनीतिक समर्थन और बहुपक्षीय मंचों पर आपसी तालमेल – इन सभी स्तरों पर रूस भारत के साथ मजबूती से खड़ा है। यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत ने न तो रूस के खिलाफ मोर्चा खोला और न ही पश्चिमी दबाव में आकर अपनी नीति बदली।

यही बात ट्रंप प्रशासन को सबसे ज्यादा खटक रही है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए, लेकिन नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है, न कि किसी देश के दबाव से। रूस भी भारत को एशिया में अपना सबसे भरोसेमंद साझेदार मानता है। ऐसे में भारत को घेरने की कोशिश दरअसल रूस को और चीन के करीब धकेलने का जोखिम पैदा कर सकती है।

चीन पर भरोसा करना अमेरिका की रणनीतिक भूल?

ट्रंप की नीति का सबसे कमजोर पहलू यही है कि वे चीन को संतुलित साझेदार मानकर चल रहे हैं। इतिहास गवाह है कि चीन अपने हितों के अलावा किसी का स्थायी मित्र नहीं रहा। यदि भविष्य में चीन ने दुर्लभ खनिजों या तकनीकी आपूर्ति को लेकर अमेरिका को झटका दिया, तो वाशिंगटन के पास सीमित विकल्प बचेंगे।

भारत, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था, पारदर्शिता और दीर्घकालिक साझेदारी में विश्वास रखता है, को कमजोर आंकना अमेरिका के लिए महंगा पड़ सकता है। यदि अमेरिका भारत को अलग-थलग करने की कोशिश करता रहा, तो नई दिल्ली रूस के साथ-साथ अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ वैकल्पिक गठजोड़ मजबूत कर सकती है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here