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योगी को रोकने के लिए मोदी सरकार का ‘यूजीसी षड्यंत्र’?

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क्या सत्ता के खेल में कुर्बान हो रहा है हिंदुत्व और 2027 में भाजपा खुद खोद रही है अपनी कब्र!

लखनऊ–नई दिल्ली, 28 जनवरी (भृगु नागर)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद बीते कुछ वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है, उसने भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक राजनीति में नए सिरे से बहस छेड़ दी है। एक ओर योगी को कट्टर हिंदुत्व, सख्त प्रशासन और कानून-व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्र की मोदी सरकार और संगठन के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनके रिश्तों को लेकर सियासी गलियारों में तरह–तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़ा हालिया विवाद महज एक नीतिगत फैसला नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही रणनीतिक खींचतान का हिस्सा माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ अब केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नेता नहीं रहे। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुआ। कई सर्वे और राजनीतिक चर्चाओं में उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार के रूप में देखा जाने लगा। यही बात भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए असहजता का कारण बनी—ऐसी चर्चा खुले तौर पर राजनीतिक हलकों में सुनाई देती है।

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यूजीसी को लेकर केंद्र सरकार के फैसलों पर देशभर में जिस तरह का विरोध देखने को मिला, उसमें उत्तर प्रदेश अग्रिम पंक्ति में रहा। शिक्षक संगठनों, छात्र समूहों और सामाजिक संगठनों ने इसे शिक्षा व्यवस्था पर हमला बताया। आलोचकों का आरोप है कि यह फैसला न केवल अकादमिक स्वायत्तता को कमजोर करता है, बल्कि परंपरागत सामाजिक संतुलन को भी बिगाड़ता है। सियासी जानकारों का दावा है कि इस फैसले से उपजे असंतोष का सीधा असर योगी सरकार पर पड़ेगा और 2027 के विधानसभा चुनाव को भाजपा के लिए कठिन बनाया जा सकता है।

इसी बिंदु पर सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या पार्टी अब अपने राजनीतिक हितों को हिंदुत्व के घोषित एजेंडे से ऊपर रखने लगी है? योगी आदित्यनाथ को जिस “कट्टर हिंदूवादी” छवि के लिए जाना जाता है, वह भाजपा की मूल वैचारिक पहचान से जुड़ी रही है। लेकिन हालिया घटनाक्रम में यह धारणा बनने लगी है कि योगी की लोकप्रियता और संभावित प्रधानमंत्री दावेदारी को सीमित करने के लिए केंद्र सरकार ऐसे फैसले ले रही है, जिनका अप्रत्यक्ष राजनीतिक नुकसान उत्तर प्रदेश में पड़े।

भाजपा के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “योगी जी का मॉडल जमीनी है, वह सीधे जनता से जुड़ता है। लेकिन दिल्ली का मॉडल प्रबंधन और नैरेटिव पर आधारित है। दोनों के बीच टकराव स्वाभाविक है।” वहीं एक अन्य नेता ने सार्वजनिक मंच से यह कहकर असहजता बढ़ा दी कि “नीतियां ऐसी हों जो कार्यकर्ताओं को समझ आएं, न कि सिर्फ फाइलों में अच्छी लगें।” इस बयान को सीधे तौर पर यूजीसी और केंद्र की नीतियों से जोड़कर देखा गया।

त्यागपत्र की चर्चाएं भी इन अटकलों को हवा देती हैं। हाल के महीनों में भाजपा के कुछ स्थानीय और प्रादेशिक स्तर के पदाधिकारियों ने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया। सोशल मीडिया पर वायरल बताए जा रहे एक कथित त्यागपत्र में लिखा गया कि “पार्टी अब उस विचारधारा से दूर जा रही है, जिसके लिए हमने वर्षों संघर्ष किया।” हालांकि भाजपा नेतृत्व ने ऐसे पत्रों को व्यक्तिगत कारणों से जोड़ते हुए खारिज किया, लेकिन सियासी संदेश साफ था कि भीतरखाने सब कुछ ठीक नहीं है।

केंद्रीय मंत्री स्तर के एक नेता के बयान को भी खूब चर्चा मिली, जिसमें उन्होंने कहा, “व्यक्ति नहीं, संस्था बड़ी होती है।” राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे योगी आदित्यनाथ की बढ़ती लोकप्रियता के संदर्भ में देखा। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़े एक मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा, “संस्था तभी मजबूत होती है, जब वह जमीन पर काम करने वालों की आवाज सुने।” ये बयान भले ही सीधे टकराव के न हों, लेकिन इनके निहितार्थ गहरे हैं।

2027 का विधानसभा चुनाव इस पूरी रणनीति का केंद्र बिंदु माना जा रहा है। अगर यूजीसी जैसे मुद्दों पर असंतोष बढ़ता है, तो उसका सीधा असर भाजपा के परंपरागत वोट बैंक पर पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे योगी सरकार की छवि प्रभावित होगी और चुनावी समीकरण कमजोर होंगे। इसका लाभ यह होगा कि योगी का राष्ट्रीय कद सीमित रह जाएगा और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी स्वतः कमजोर पड़ जाएगी। ऐसे में मोदी अपने “मनपसंद उत्तराधिकारी” के लिए रास्ता साफ कर सकते हैं—यह दावा सियासी गलियारों में जोर-शोर से किया जा रहा है।

हालांकि भाजपा का आधिकारिक पक्ष इससे अलग है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि यूजीसी का फैसला सुधारों का हिस्सा है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। उनका तर्क है कि योगी आदित्यनाथ भाजपा के मजबूत स्तंभ हैं और पार्टी में नेतृत्व को लेकर कोई संघर्ष नहीं है। लेकिन राजनीति में “कहने” और “होने” के बीच का अंतर अक्सर जनता समझ जाती है।

कुल मिलाकर, यूजीसी विवाद ने भाजपा की आंतरिक राजनीति को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है। सवाल सिर्फ शिक्षा नीति का नहीं, बल्कि सत्ता के संतुलन, नेतृत्व की दावेदारी और हिंदुत्व बनाम राजनीतिक हित का है। क्या भाजपा योगी आदित्यनाथ जैसे मजबूत जनाधार वाले नेता को हाशिये पर डालने का जोखिम उठाएगी, या यह सब महज संयोग है—इसका जवाब आने वाले समय और 2027 का चुनाव देगा। लेकिन इतना तय है कि यह विवाद भाजपा के लिए साधारण प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि उसकी राजनीति की दिशा तय करने वाला मोड़ बनता जा रहा है।

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