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मोदी बनाम भाजपा: क्या सत्ता के अंत के साथ पार्टी को भस्म करने की पटकथा

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नई दिल्ली, 28 जनवरी (एजेंसियां)। भारतीय जनता पार्टी आज जिस वैचारिक, सामाजिक और सांगठनिक संकट से गुजर रही है, उसके केंद्र में अब एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है—क्या नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए भस्मासुर सिद्ध होते जा रहे हैं? सत्ता के शिखर पर पहुँचाने वाले चेहरे का ही पार्टी के आधार को खोखला करना किसी रणनीति का हिस्सा है या यह सत्ता-केंद्रित राजनीति का स्वाभाविक परिणाम है? यूजीसी के हालिया निर्णयों से उपजा असंतोष, सवर्ण समाज में बढ़ती बेचैनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रहस्यमयी चुप्पी इन प्रश्नों को और तीखा बना देती है।

भाजपा का उदय किसी एक व्यक्ति की करिश्माई राजनीति भर नहीं था। यह संघ के दशकों के सामाजिक कार्य, सवर्ण-मध्यवर्गीय समर्थन, राष्ट्रवाद के आह्वान और हिंदुत्व के वैचारिक अनुशासन का संयुक्त परिणाम था। लेकिन बीते वर्षों में पार्टी का चेहरा, चरित्र और निर्णय-प्रक्रिया एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। मोदी युग में “पार्टी” धीरे-धीरे “व्यक्ति” में बदलती दिखी। मंत्रिमंडल से लेकर संगठन तक, निर्णयों में बहस की जगह आदेश ने ले ली। इसका परिणाम यह हुआ कि वही सामाजिक वर्ग, जिसने भाजपा को अपने कंधों पर उठाया, आज स्वयं को ठगा-सा महसूस कर रहा है।

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यूजीसी के कथित एक्विटी नियम हों या शिक्षा-प्रशासन में लगातार हस्तक्षेप, सवर्ण समाज का यह आरोप है कि उनके लिए समान अवसर और न्याय की भाषा खोखली होती जा रही है। सवाल यह नहीं कि सामाजिक न्याय के प्रयास गलत हैं; सवाल यह है कि क्या नीति-निर्माण में संतुलन, संवाद और संवेदनशीलता का परित्याग जानबूझकर किया जा रहा है? जब “जनरल कैटेगरी” स्वयं को हाशिये पर महसूस करने लगे, तब यह महज प्रशासनिक भूल नहीं रह जाती—यह राजनीतिक संकेत बन जाती है।

इसी पृष्ठभूमि में यह शंका गहराती है कि क्या मोदी अपने उत्तराधिकारी की राह में किसी भी संभावित “कट्टर हिंदूवादी” नेता को उभरने से पहले ही निष्प्रभावी करना चाहते हैं? भाजपा के भीतर वैचारिक नेतृत्व का शून्य, क्षेत्रीय क्षत्रपों का कमजोर होना और संघ से दूरी—ये सब क्या संयोग हैं? या फिर एक ऐसी रणनीति का हिस्सा, जिसमें सत्ता के बाद पार्टी का भविष्य गौण हो जाए और इतिहास में एकमात्र सर्वशक्तिमान नेता की छवि सुरक्षित रहे?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुप्पी इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक खटकती है। संघ परंपरागत रूप से वैचारिक अनुशासन और संगठनात्मक संतुलन का प्रहरी रहा है। लेकिन आज, जब भाजपा का सामाजिक आधार दरक रहा है, संघ का मौन कई सवाल खड़े करता है। क्या यह मौन रणनीतिक है? क्या संघ भीतरखाने असंतुलन को देख रहा है लेकिन सार्वजनिक टकराव से बच रहा है? या फिर सत्ता की अभूतपूर्व केंद्रीकरण ने संघ की पारंपरिक भूमिका को भी सीमित कर दिया है?

राष्ट्रवाद की ऊँची-ऊँची बातें, जिनके सहारे भाजपा ने जनमानस को आंदोलित किया, आज कई लोगों को भरमाने वाली प्रतीत हो रही हैं। सीमाओं पर सुरक्षा और सांस्कृतिक गौरव की बातों के बीच शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संतुलन जैसे मुद्दे लगातार पीछे छूटते गए। जब नीति के फैसले समाज के एक बड़े हिस्से को यह महसूस कराएँ कि वे “अनचाहे” हैं, तब राष्ट्रवाद का नैरेटिव खोखला लगने लगता है।

मोदी की उम्र 75 वर्ष पार कर चुकी है। भाजपा-संघ परंपरा में यह उम्र नेतृत्व परिवर्तन का संकेत मानी जाती रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संघ अब भी चेत पाएगा? क्या वह समय रहते हस्तक्षेप कर पार्टी को व्यक्ति-पूजा से बाहर निकाल पाएगा? या फिर इतिहास यह दर्ज करेगा कि सत्ता के शिखर पर बैठा एक नेता अपने साथ पार्टी को भी ढलान पर ले गया?

यह लेख किसी षड्यंत्र सिद्धांत का प्रचार नहीं, बल्कि घटनाओं के क्रम से उपजे संदेहों का विश्लेषण है। लोकतंत्र में सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता। भाजपा यदि स्वयं को वैचारिक आंदोलन मानती है, तो उसे आत्ममंथन करना ही होगा। अन्यथा, भस्मासुर की कथा केवल पुराणों तक सीमित नहीं रहेगी—वह आधुनिक राजनीति का रूपक बन जाएगी।

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