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यूजीसी आदेश बना मोदी सरकार का ताबूत, भाजपा में शुरू हुआ खुला विघटन

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नई  दिल्ली, 27 जनवरी,(विशेष संवाददाता)। यूजीसी के हालिया आदेश के बाद देश की राजनीति में जिस तरह का भूचाल आया है, उसने भारतीय जनता पार्टी को अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में डाल दिया है। यह फैसला केवल शिक्षा नीति या विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह सड़कों पर उतर चुका जनआंदोलन बनता जा रहा है। देश के कई राज्यों में छात्र, शिक्षक, सामाजिक संगठन और विभिन्न वर्गों के लोग खुलकर यूजीसी के आदेश के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी के साथ भाजपा के भीतर भी विघटन की प्रक्रिया शुरू होती दिख रही है, जो आने वाले समय में पार्टी के लिए घातक साबित हो सकती है।

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यूजीसी के फैसले के विरोध में प्रदर्शन की खबरें सामने आई हैं। दिल्ली में जंतर-मंतर और विश्वविद्यालय परिसरों के आसपास छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर “यूजीसी आदेश वापस लो”, “शिक्षा के साथ खिलवाड़ बंद करो” और “छात्र विरोधी फैसला नहीं चलेगा” जैसे नारे लगाए। कई जगहों पर शिक्षकों के संगठनों ने काली पट्टी बांधकर काम किया और इसे शिक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला बताया।

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उत्तर प्रदेश में यह विरोध और भी उग्र रूप में सामने आया। लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी और मेरठ में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के बाहर छात्रों ने प्रदर्शन किए। लखनऊ विश्वविद्यालय और अवध विश्वविद्यालय से जुड़े छात्र संगठनों ने यूजीसी के आदेश को “भविष्य के साथ प्रयोग” बताते हुए सरकार से तत्काल इसे वापस लेने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बिना व्यापक संवाद और जमीनी तैयारी के इस तरह के फैसले थोपना छात्रों और शिक्षकों दोनों के हितों के खिलाफ है।

बरेली, कानपुर और आगरा जैसे शहरों में भी विरोध प्रदर्शन हुए, जहां छात्रों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और अभिभावकों ने भी आवाज उठाई। कई जगहों पर यह आरोप लगाया गया कि यूजीसी का आदेश शिक्षा को केंद्रीकृत करने और सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने की दिशा में उठाया गया कदम है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि वह शिक्षा को केवल आंकड़ों और आदेशों के जरिए नियंत्रित करना चाहती है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

इस जनआक्रोश का सीधा असर अब भारतीय जनता पार्टी के संगठन पर दिखाई देने लगा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बक्शी का तालाब विधानसभा क्षेत्र के कुर्सीखवा मण्डल में सामने आया घटनाक्रम भाजपा के भीतर उभरते विद्रोह का बड़ा संकेत माना जा रहा है। यहां भाजपा के मण्डल महामंत्री अंकित तिवारी ने यूजीसी और समान नागरिक संहिता कानून के विरोध में अपने पद से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती दे दी।

अंकित तिवारी ने अपने त्यागपत्र में साफ शब्दों में लिखा कि पार्टी की मौजूदा नीतियां उन मूल विचारों से भटक चुकी हैं, जिन पर भाजपा की स्थापना हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी जैसे फैसले बच्चों, युवाओं और समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ हैं। उनका कहना है कि जिन आदर्शों के नाम पर पार्टी कार्यकर्ताओं से वर्षों तक संघर्ष कराया गया, आज वही आदर्श सत्ता की राजनीति में कुर्बान कर दिए गए हैं।

इस इस्तीफे के बाद कुर्सीखवा मण्डल में भाजपा संगठन लगभग बिखरता नजर आया। अंकित तिवारी के साथ मण्डल उपाध्यक्ष आलोक सिंह, मण्डल मंत्री महावीर सिंह, शक्ति केन्द्र संयोजक मोहित मिश्रा, तेज प्रकाश सिंह और नीरज पाण्डेय ने भी सामूहिक रूप से अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया। युवा मोर्चा मण्डल अध्यक्ष अभय सिंह और युवा मोर्चा मण्डल महामंत्री राज विक्रम सिंह ने भी पार्टी पद छोड़ने की घोषणा की। पूर्व मण्डल मंत्री अभिषेक अवस्थी, बूथ अध्यक्ष विवेक सिंह और पूर्व सेक्टर संयोजक कमल सिंह के इस्तीफों ने यह साफ कर दिया कि असंतोष केवल ऊपर तक सीमित नहीं है, बल्कि बूथ स्तर तक फैल चुका है।

बरेली से सामने आया घटनाक्रम भी भाजपा के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है। सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोध में त्यागपत्र देने की खबर ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। इसे यूजीसी के फैसले के खिलाफ बढ़ते व्यापक असंतोष के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जो अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा।

इसी बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के रुख को लेकर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विरोध कर रहे संगठनों और कुछ राजनीतिक वर्गों का आरोप है कि उनका रुख सवर्ण विरोधी प्रतीत होता है और उन्होंने समाज के एक बड़े वर्ग की चिंताओं को नजरअंदाज किया है। कई प्रदर्शन स्थलों पर धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ नारे लगाए गए और उनसे सार्वजनिक रूप से सफाई देने की मांग की गई।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूजीसी का यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। जिस प्रधानमंत्री को अब तक मजबूत और निर्णायक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा, अब उसी नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भाजपा के भीतर और बाहर यह चर्चा तेज है कि क्या यह सब किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। कुछ आलोचक तो यहां तक कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री भाजपा की नैया को जानबूझकर ऐसे मोड़ पर ले जा रहे हैं, जहां से वापसी मुश्किल हो जाए, ताकि उनके बाद कोई और पार्टी की बागडोर मजबूती से न संभाल सके।

इन आरोपों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्ग में यह चर्चा आम हो गई है कि संघ को अब इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से समझना चाहिए और समय रहते हस्तक्षेप करना चाहिए। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने संघ से “एक्शन लेने” और भाजपा नेतृत्व को सही दिशा में लाने की अपील भी की है।

विरोधी दलों का दावा है कि यदि सरकार ने यूजीसी के फैसले पर अपना रुख नहीं बदला, तो यह तय है कि भाजपा को आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ेगा। उनका कहना है कि जिस तेजी से भाजपा उभरी थी, उसी तेजी से अब वह पतन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। यूजीसी का यह फैसला अब केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि भाजपा के भीतर शुरू हुए विघटन की शुरुआत माना जा रहा है।

फिलहाल भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई ठोस और संतोषजनक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन सड़कों पर जारी विरोध, संगठन के भीतर बढ़ती बगावत और इस्तीफों की श्रृंखला यह संकेत दे रही है कि यदि जल्द ही संवाद और सुधार के कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहराएगा। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि भाजपा इस असंतोष को संभाल पाती है या फिर यूजीसी का यह फैसला उसके राजनीतिक पतन की कहानी का पहला अध्याय बनकर दर्ज होता है।

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