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धर्म के मामले में टांग न अड़ाए संघ

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धार्मिक प्रश्नों का उत्तर धर्मगुरु ही दे सकते हैं

भारत एक ऐसा देश है जिसकी आत्मा धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं में बसती है। यहां धर्म केवल पूजा-पाठ या उत्सवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला, आचरण की मर्यादा और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज हिंदू धर्म जैसे व्यापक और सहिष्णु विचार को कुछ संगठन अपने प्रभाव और वर्चस्व का विषय बनाने में लगे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर भी यही सवाल बार-बार उठता है कि क्या संघ को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए?

स्पष्ट बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई धार्मिक संस्था नहीं है। वह न तो मंदिरों की व्यवस्था संभालता है, न शास्त्रों की व्याख्या करने वाली कोई आचार्य परंपरा उसके पास है, और न ही उसके पास ऐसा कोई आध्यात्मिक आधार है जिससे वह धर्म का निर्णायक बन सके। संघ का स्वरूप सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन का है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवाद, अनुशासन और संगठन निर्माण है। ऐसे में जब संघ या उससे जुड़े लोग धर्म के नाम पर बयान देने लगते हैं या धार्मिक विवादों में हस्तक्षेप करते हैं, तो यह धर्म की मर्यादा के खिलाफ प्रतीत होता है। धर्म का निर्णय संगठन नहीं करते। धर्म का निर्णय सदियों से चली आ रही शास्त्रीय परंपरा करती है। हिंदू धर्म का आधार वेद, उपनिषद, गीता, पुराण और संत परंपरा है। इसकी व्याख्या वही कर सकता है जिसने धर्म को पढ़ा हो, समझा हो और साधना के माध्यम से जिया हो। धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देने का अधिकार शंकराचार्य, संत, महंत, पीठाधीश्वर और विद्वान आचार्यों को है, न कि किसी राजनीतिक या वैचारिक संगठन को।

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हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता और सहिष्णुता है। यह धर्म किसी एक विचार, एक नेता या एक संगठन के नियंत्रण में नहीं चलता। इसमें शैव भी हैं, वैष्णव भी हैं, शाक्त भी हैं, आर्य समाज भी है, रामानुजाचार्य की परंपरा भी है, कबीर और तुलसी की भक्ति परंपरा भी है। हिंदू धर्म एक महासागर है, जिसे किसी एक संगठन की सीमित विचारधारा में बांधना संभव ही नहीं है। आज समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है कि धर्म के विषयों को राजनीति से जोड़ दिया जाता है। किसी धार्मिक विवाद में संघ या उससे जुड़े संगठन जब दखल देते हैं, तो वह विवाद आस्था का नहीं, सत्ता और वर्चस्व का विषय बन जाता है। धर्म की भाषा फिर नारे बन जाती है, और धर्म की मर्यादा राजनीतिक मंचों पर तौलने लगती है। यही कारण है कि यह आवश्यक हो गया है कि संघ जैसे संगठन धर्म के मामलों में टांग न अड़ाएं।

यदि किसी मंदिर, परंपरा, पूजा-पद्धति, शास्त्रीय विवाद या धार्मिक निर्णय का प्रश्न उठता है तो उसे धर्मगुरुओं के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। धर्माचार्य ही यह बेहतर तरीके से समझ सकते हैं कि धर्म की वास्तविक भावना क्या है और उसका समाधान किस तरह होना चाहिए। संघ का काम समाज को संगठित करना हो सकता है, लेकिन धर्म के निर्णय देना या धर्म का ठेकेदार बनना न उसका अधिकार है, न उसकी क्षमता।

धर्म कोई राजनीतिक परियोजना नहीं है। धर्म आस्था है, साधना है, ज्ञान है और आत्मा की यात्रा है। इसे संगठन के एजेंडे से जोड़ना धर्म को कमजोर करता है। हिंदू धर्म हजारों वर्षों से इसलिए जीवित है क्योंकि यह सत्ता के नहीं, सत्य के साथ खड़ा रहा है। इसे बचाने का रास्ता भी वही है—धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में छोड़ देना, और धर्म के मामलों को धर्मगुरुओं की परंपरा के अनुसार ही चलने देना। आज जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज स्पष्ट समझे कि संघ कोई धर्माचार्य संस्था नहीं है। संघ को धर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के बजाय अपने मूल कार्यक्षेत्र तक सीमित रहना चाहिए। धार्मिक मसलों को धर्मगुरु ही बेहतर तरीके से समझ सकते हैं, निपटा सकते हैं और समाधान निकाल सकते हैं। धर्म का निर्णय शास्त्र से होगा, शाखा से नहीं।

धर्म के मामले में संघ को पीछे हटना चाहिए, क्योंकि हिंदू धर्म की रक्षा किसी संगठन के हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि उसकी मूल परंपरा, संतों और आचार्यों के ज्ञान से होती है। यही सनातन की सच्ची परिभाषा है और यही हिंदू धर्म की वास्तविक मर्यादा।

धर्म का ठेकेदार कौन? संघ नहीं, धर्मगुरु ही धर्म के निर्णायक

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