यूपी की सियासत में उभरता नया शक्ति केंद्र
नई दिल्ली, 26फरवरी (भृगु नागर)। उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सवाल यह नहीं है कि 2027 में कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या राज्य की राजनीति राष्ट्रीय सत्ता-संतुलन को प्रभावित करने की स्थिति में पहुँच चुकी है। जब भी उत्तर प्रदेश में किसी नेता का कद असाधारण रूप से बढ़ता है, दिल्ली की राजनीति में हलचल स्वाभाविक हो जाती है। आज यह चर्चा तेज है कि योगी आदित्यनाथ की बढ़ती लोकप्रियता केवल राज्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उन्हें एक संभावित शक्ति-केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि 2027 का विधानसभा चुनाव भारी बहुमत के साथ जीता जाता है, तो योगी का कद स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर और ऊँचा होगा। ऐसे में सत्ता की स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा की चर्चा भी उठती है। इसी संदर्भ में कुछ विश्लेषक यह भी कहते हैं कि केंद्र की नीतियों और राज्य की राजनीति के बीच सामंजस्य और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। हालांकि इन दावों का कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है, लेकिन राजनीतिक विमर्श में यह धारणा जरूर आकार ले रही है कि उत्तर प्रदेश अब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति की प्रयोगशाला बन चुका है। इतिहास गवाह है कि भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन और शक्ति संतुलन के दौर आते रहे हैं। वर्ष 2014 से पहले की परिस्थितियों को याद करें तो लाल कृष्ण आडवानी का नाम स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अग्रणी माना जाता था। उस समय पार्टी के भीतर रणनीतिक बदलाव हुए और अंततः नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया गया।
संगठनात्मक स्तर पर उस दौर में राजनाथ सिंह की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया। राजनीति में समय और परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं; आज वही विमर्श उलट कर देखा जा रहा है कि क्या आने वाले वर्षों में फिर कोई शक्ति-संतुलन का नया अध्याय लिखा जाएगा।इन अटकलों के बीच असली प्रश्न यह है कि योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश में पराजित करना कठिन क्यों माना जा रहा है। इसका उत्तर 2017 से शुरू होने वाले उनके शासनकाल में छिपा है। जब उन्होंने सत्ता संभाली, तब राज्य की सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था को लेकर थी। माफिया, संगठित अपराध और प्रशासनिक शिथिलता के आरोप लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे थे। योगी सरकार ने अपने शुरुआती वर्षों में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी। पुलिस ढांचे में बदलाव, अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और संगठित गिरोहों पर कार्रवाई को सरकार ने अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। समर्थकों का मानना है कि इससे निवेश के लिए वातावरण बना और राज्य की छवि में सुधार हुआ।
कानून-व्यवस्था के बाद बुनियादी ढांचे पर जोर दिया गया। एक्सप्रेस-वे नेटवर्क, औद्योगिक कॉरिडोर, एयरपोर्ट परियोजनाएँ और शहरी विकास योजनाएँ लगातार प्रचार का केंद्र बनीं। उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गंगा एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाओं को सरकार ने विकास के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। निवेशक सम्मेलनों के माध्यम से देसी उद्योगपतियों को आमंत्रित किया गया। सरकार का दावा है कि इससे बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव आए और रोजगार सृजन की संभावनाएँ बढ़ीं।
भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील विषय पर भी सरकार ने अपेक्षाकृत कम विरोध का हवाला दिया है। वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम परियोजना को अक्सर उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। तंग गलियों और घनी आबादी के बीच परियोजना का विस्तार प्रशासनिक चुनौती थी, लेकिन सरकार ने इसे व्यवस्थित मुआवजा और संवाद के माध्यम से पूरा करने का दावा किया। समर्थकों का कहना है कि पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान के कारण व्यापक आंदोलन नहीं हुआ। गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर परिसर से जुड़े पुनर्व्यवस्थापन के मामलों को भी कार्यशैली के उदाहरण के रूप में सामने रखा जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि प्रभावित दुकानदारों को वैकल्पिक व्यवस्था और मुआवजा देकर विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया गया। इन उदाहरणों को सरकार अपनी प्रशासनिक दक्षता और संवाद-कौशल के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करती है।
राजनीतिक विश्लेषण का एक बड़ा पक्ष ‘हिंदुत्व’ और सामाजिक समीकरण से जुड़ा है। योगी आदित्यनाथ को भाजपा के भीतर एक सशक्त हिंदुत्व चेहरे के रूप में देखा जाता है। उनके समर्थकों का विश्वास है कि राज्य में धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा अभी भी प्रभावी है। विपक्षी दलों, विशेषकर अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी पर कानून-व्यवस्था के पुराने आरोपों को भी भाजपा लगातार उठाती रही है। ‘जंगलराज’ बनाम ‘सख्त शासन’ की बहस चुनावी मंचों पर बार-बार दोहराई जाती है।
महिला और युवा मतदाताओं के बीच सरकार की योजनाओं—जैसे उज्ज्वला, शौचालय निर्माण, आवास, और छात्रवृत्ति—को भी भाजपा अपने समर्थन आधार का विस्तार मानती है। युवा वर्ग के लिए स्टार्ट-अप नीति, खेल अवसंरचना और भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार के दावे किए जाते हैं, हालांकि विपक्ष भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता और पेपर लीक जैसे मुद्दों को उठाता रहा है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रीय राजनीति में 75 वर्ष की आयु का अनौपचारिक मानदंड चर्चा का विषय रहा है। इस संदर्भ में भविष्य की नेतृत्व संभावनाओं पर अटकलें लगती रहती हैं। किंतु भारतीय राजनीति में अंतिम निर्णय अक्सर परिस्थितियों और जनमत से तय होते हैं।
2027 का चुनाव केवल सीटों की संख्या का सवाल नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी होगा कि विकास, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक राजनीति का संयोजन कितना प्रभावी रहता है। यदि भाजपा योगी के नेतृत्व में भारी बहुमत दोहराती है, तो स्वाभाविक रूप से उनका राष्ट्रीय कद बढ़ेगा। यदि प्रदर्शन अपेक्षा से कम रहा, तो विपक्ष इसे जनादेश में बदलाव के संकेत के रूप में प्रस्तुत करेगा।
उत्तर प्रदेश के मतदाता ऐतिहासिक रूप से निर्णायक रहे हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य ने राष्ट्रीय सत्ता का मार्ग प्रशस्त किया। उसी तरह 2027 और आगे 2029 के लोकसभा चुनाव भी राज्य की राजनीति से प्रभावित हो सकते हैं। अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उत्तर प्रदेश आज भारतीय राजनीति की धुरी बना हुआ है। योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता, भाजपा की संगठनात्मक शक्ति, विपक्ष की रणनीति और केंद्र-राज्य समीकरण—ये सभी तत्व मिलकर आने वाले वर्षों की दिशा तय करेंगे। क्या यह उभरता हुआ ‘योगी फैक्टर’ राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाएगा, या यह केवल चुनावी विमर्श तक सीमित रहेगा—इसका उत्तर जनता के मतपेटी में ही छिपा है।










