सनातनजन ब्यूरो, लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान का यह कहना कि भाजपा द्वारा फैलाए गए “जहर” का असर बहुसंख्यक समाज पर पड़ रहा है, केवल एक विवादित बयान नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का परिचायक है जो जनता के जनादेश को स्वीकार करने के बजाय मतदाताओं की सोच पर ही सवाल खड़े करने लगती है।
सवाल यह है कि आखिर जहर कौन फैला रहा है? वह जो समाज को उसकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और आस्था से जोड़ने की बात करता है या वह जो बार-बार बहुसंख्यक समाज को संदेह की दृष्टि से देखने का संदेश देता है? जावेद अली खान का बयान करोड़ों हिंदुओं और मतदाताओं का अपमान प्रतीत होता है। यदि कोई व्यक्ति भाजपा का समर्थन करता है तो क्या वह “जहर” का शिकार हो गया? क्या लोकतंत्र में मतदाता की अपनी स्वतंत्र सोच और निर्णय का कोई महत्व नहीं है?
सच्चाई यह है कि वर्षों तक हिंदू आस्था और भावनाओं को राजनीतिक मंचों से उपहास का विषय बनाने वाले नेताओं को तब कोई समस्या नहीं थी, जब एकतरफा तुष्टीकरण की राजनीति चल रही थी। राम मंदिर आंदोलन का विरोध हो, सनातन परंपराओं पर कटाक्ष हों या वोट बैंक की राजनीति के लिए समाज को खांचों में बांटने का प्रयास—इन सब घटनाओं ने जनता के मन में गहरे प्रश्न खड़े किए। आज जब हिंदू समाज अपनी पहचान, अपने अधिकारों और अपनी आस्था के प्रति पहले से अधिक जागरूक होकर राजनीतिक निर्णय ले रहा है, तब कुछ नेताओं को यह परिवर्तन “जहर” दिखाई देने लगा है।
वास्तव में दर्द इस बात का नहीं है कि समाज बदल गया है, बल्कि दर्द इस बात का है कि दशकों पुरानी राजनीतिक गणित बदल गई है। जो वर्ग कभी केवल वोट बैंक समझा जाता था, वह अब अपने हितों और मुद्दों पर खुलकर सोच रहा है। यही कारण है कि चुनावी परिणाम लगातार पुराने राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे रहे हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे बयान समाज में संवाद को मजबूत नहीं करते, बल्कि विभाजन की खाई और गहरी करते हैं। यदि कोई नेता बहुसंख्यक समाज के राजनीतिक निर्णय को “जहर” का प्रभाव बताता है, तो वह लोकतंत्र की मूल भावना का ही अपमान करता है। जनता मूर्ख नहीं है। जनता ने जो देखा, समझा और महसूस किया, उसी आधार पर अपना निर्णय दिया है।
समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह समझना होगा कि विवादित बयान देकर सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन जनविश्वास नहीं। यदि पार्टी को भविष्य की राजनीति करनी है तो उसे आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों बार-बार उसके नेताओं के बयान हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग को आहत करते दिखाई देते हैं। मतदाता को दोषी ठहराने से बेहतर है कि अपनी राजनीतिक रणनीति और भाषा की समीक्षा की जाए।
लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। जो नेता जनता के फैसले को सम्मान देने के बजाय उसे “जहर” का असर बताने लगते हैं, वे दरअसल अपनी राजनीतिक विफलताओं पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे होते हैं। जनता सब देख रही है और समय-समय पर उसका जवाब भी दे रही है।










