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दशरथ की व्यथा और ताड़का-वध का दिव्य प्रसंग

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वन में महर्षि विश्वामित्र का पवित्र आश्रम था। वहाँ वे जप, तप, योग और यज्ञ में निरंतर लगे रहते थे। किंतु राक्षस मारीच और सुबाहु अपने अन्य साथियों के साथ बार-बार यज्ञों में विघ्न डालते थे। जैसे ही यज्ञ प्रारम्भ होता, वे आकाश से मांस, रक्त और अपवित्र वस्तुओं की वर्षा कर धर्मकार्य को बाधित कर देते। ऋषियों का जीवन संकट में था और धर्म की रक्षा असंभव होती जा रही थी।

महर्षि विश्वामित्र ने विचार किया कि इन पापी राक्षसों का विनाश केवल भगवान ही कर सकते हैं। वे जानते थे कि स्वयं परमात्मा ने अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लिया है। उनके मन में प्रभु के दर्शन की तीव्र लालसा जागी। उन्होंने निश्चय किया कि इसी बहाने अयोध्या जाकर श्रीराम के दर्शन भी होंगे और राक्षसों के विनाश का उपाय भी हो जाएगा। अयोध्या पहुँचने पर राजा दशरथ ने अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता के साथ महर्षि का स्वागत किया। विधिवत पूजा, सत्कार और भोजन के पश्चात राजा ने उनके आगमन का कारण पूछा। तब विश्वामित्र ने कहा कि वे याचक बनकर आए हैं और उन्हें राम तथा लक्ष्मण चाहिए, ताकि वे यज्ञ की रक्षा कर सकें।

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यह सुनते ही दशरथ का हृदय कांप उठा। वृद्धावस्था में प्राप्त राम उनके प्राणों से भी प्रिय थे। उन्होंने पृथ्वी, धन, गौ, राज्य और अपना सर्वस्व देने की बात कही, परंतु राम को भेजने के लिए तैयार न हुए। उनके मुख से निकला—“राम देत नहिं बनइ गोसाईं।” राम के बिना जीवन की कल्पना भी उनके लिए असह्य थी। किन्तु विश्वामित्र अपने आग्रह पर अडिग रहे। तब कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दशरथ को समझाया कि विश्वामित्र कोई साधारण ऋषि नहीं हैं और उनके संरक्षण में राम पूर्णतः सुरक्षित रहेंगे। गुरु के वचनों का सम्मान करते हुए दशरथ ने भारी मन से राम और लक्ष्मण को महर्षि के साथ भेजने की अनुमति दे दी।

दोनों राजकुमार धनुष-बाण धारण कर गुरु के पीछे-पीछे चल पड़े। माता-पिता के चरण स्पर्श कर वे धर्मरक्षा के महान अभियान पर निकल गए। मार्ग में भयानक राक्षसी ताड़का ने उनका मार्ग रोका। उसने घोर आतंक मचा रखा था। गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने एक ही बाण से उसका वध कर दिया और उसे मोक्ष प्रदान किया।

ताड़का-वध के बाद विश्वामित्र अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राम और लक्ष्मण को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्रों तथा अद्भुत विद्याओं का ज्ञान दिया, जिनसे भूख-प्यास और थकान का प्रभाव नहीं पड़ता था। अब दोनों राजकुमार केवल अयोध्या के कुमार नहीं, बल्कि धर्मरक्षा के लिए तैयार दिव्य योद्धा बन चुके थे।

इसके बाद महर्षि ने निडर होकर यज्ञ आरंभ किया। यज्ञ के अंतिम दिनों में मारीच और सुबाहु विशाल सेना के साथ आ पहुँचे। श्रीराम ने बिना फल वाले मानुष बाण से मारीच को ऐसा आघात किया कि वह सौ योजन दूर समुद्र पार जा गिरा। तत्पश्चात अग्निबाण से सुबाहु का वध कर दिया। दूसरी ओर लक्ष्मण ने शेष राक्षस सेना का संहार कर दिया। इस प्रकार ऋषियों के यज्ञ की रक्षा हुई और समस्त मुनि समाज भयमुक्त हो गया। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और ऋषियों ने प्रभु की स्तुति की। कुछ समय आश्रम में निवास करने के बाद विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को सीता स्वयंवर तथा धनुष-यज्ञ का समाचार सुनाया। यह वही यात्रा थी जो आगे चलकर जनकपुर, सीता-राम मिलन और दिव्य विवाह का मार्ग प्रशस्त करने वाली थी।यह प्रसंग केवल राक्षस-वध की कथा नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि जब धर्म संकट में पड़ता है, तब भगवान स्वयं आगे बढ़कर उसकी रक्षा करते हैं और गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

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