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अग्निदेव को मिला भृगु का श्राप

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सनातन धर्म के महर्षियों में महर्षि भृगु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे और सप्तर्षियों में उनकी विशेष गणना होती है। उनके वंश में अनेक महान ऋषि उत्पन्न हुए, जिनमें महर्षि च्यवन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महर्षि च्यवन के जन्म की कथा केवल एक ऋषि के जन्म की कथा नहीं है, बल्कि यह सत्य, धर्म, क्रोध, श्राप और वरदान के गहन आध्यात्मिक संदेशों से परिपूर्ण है।

महर्षि भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था। वह अनुपम सौंदर्य और सद्गुणों से युक्त थीं। एक समय जब पुलोमा गर्भवती थीं, तब महर्षि भृगु आश्रम से बाहर स्नान करने गए हुए थे। उसी दौरान संयोगवश पुलोमा नाम का एक राक्षस वहां आ पहुंचा। जैसे ही उसकी दृष्टि भृगु-पत्नी पुलोमा पर पड़ी, वह उनके रूप पर मोहित हो गया और उन्हें प्राप्त करने का निश्चय कर बैठा।

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पुलोमा ने अतिथि धर्म का पालन करते हुए उस राक्षस का आदर-सत्कार किया और भोजन कराया। भोजन के पश्चात राक्षस ने अचानक दावा किया कि पुलोमा वास्तव में उसकी पत्नी है और उसे उसके साथ चलना चाहिए। यह सुनकर पुलोमा अत्यंत आश्चर्यचकित और क्रोधित हुईं। उन्होंने उसके कथन को असत्य बताया। तब राक्षस ने यज्ञाग्नि को साक्षी बनाकर सत्य का निर्णय चाहा। उसने अग्निदेव से पूछा कि क्या उसका कथन सत्य है। अग्निदेव ने उत्तर दिया कि बचपन में पुलोमा के पिता ने परिहासवश अपनी रोती हुई पुत्री को डराने के लिए कहा था—“हे राक्षस! इसे पकड़ ले।” उस समय वहां उपस्थित पुलोमा राक्षस ने इसे वास्तविक वचन मान लिया और मन ही मन पुलोमा को अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया। अग्निदेव उस घटना के साक्षी थे। किन्तु अग्निदेव ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि धर्मशास्त्र के अनुसार विवाह केवल विधिपूर्वक संस्कार से ही मान्य होता है। पुलोमा का वैदिक रीति से विवाह महर्षि भृगु के साथ हुआ था, इसलिए धर्मतः वही उनके पति हैं।

अग्निदेव की बात सुनकर राक्षस क्रोधित हो उठा। उसने बलपूर्वक पुलोमा का हरण कर लिया और उन्हें लेकर भागने लगा। संकट में फंसी पुलोमा अपने पति को पुकारती रहीं, किन्तु महर्षि भृगु वहां उपस्थित नहीं थे।

उसी समय एक चमत्कार हुआ। अपनी माता को संकट में देखकर उनके गर्भ में स्थित बालक ने योगबल से गर्भ से बाहर जन्म ले लिया। उस दिव्य बालक का तेज इतना प्रचंड था कि उसकी दृष्टि पड़ते ही पुलोमा राक्षस तत्काल भस्म हो गया। चूंकि वह बालक माता के गर्भ से समय से पूर्व ‘च्युत’ होकर बाहर आया था, इसलिए उसका नाम “च्यवन” पड़ा। यही बालक आगे चलकर महान तपस्वी महर्षि च्यवन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। राक्षस के विनाश के बाद पुलोमा अपने पुत्र को लेकर परमपिता ब्रह्मा के पास पहुंचीं। भय, पीड़ा और अपमान के कारण वह निरंतर रोती रहीं। कहा जाता है कि उनके अश्रुओं से एक नदी का जन्म हुआ, जिसका नाम ब्रह्माजी ने “वसुधरा” रखा।

ब्रह्माजी ने उन्हें सांत्वना देकर पुनः महर्षि भृगु के पास भेज दिया। जब भृगु ऋषि ने पूरी घटना सुनी तो उन्होंने पूछा कि राक्षस को यह जानकारी किसने दी कि पुलोमा उनकी पत्नी हैं। पुलोमा ने बताया कि यह परिचय अग्निदेव ने दिया था।

यह सुनकर महर्षि भृगु अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अग्निदेव को श्राप देते हुए कहा कि वे “सर्वभक्षी” हो जाएं। अर्थात उन्हें सब कुछ भक्षण करना पड़े।

श्राप सुनकर अग्निदेव भी अप्रसन्न हुए। उन्होंने महर्षि भृगु से कहा कि उन्होंने केवल सत्य का कथन किया था और सत्य बोलना उनका धर्म है। उन्होंने कहा कि यदि सत्य बोलना अपराध है तो यह न्याय नहीं है। अग्निदेव ने यह भी स्मरण कराया कि यज्ञों में देवताओं को अर्पित समस्त हविष्य उन्हीं के माध्यम से देवताओं तक पहुंचता है।

श्राप से व्यथित होकर अग्निदेव पृथ्वी से अदृश्य हो गए। उनके लोप होते ही यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र और वैदिक संस्कार रुक गए। देवता और ऋषि चिंतित हो उठे क्योंकि अग्नि के बिना वैदिक व्यवस्था का संचालन असंभव था। तब सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्माजी के पास पहुंचे। ब्रह्माजी ने अग्निदेव को बुलाकर समझाया कि समस्त सृष्टि के संचालन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने अग्निदेव को वरदान दिया कि भृगु का श्राप निष्फल नहीं होगा, किन्तु उसके प्रभाव से उनकी मूल पवित्रता नष्ट नहीं होगी। केवल उनकी कुछ ज्वालाएं सर्वभक्षी मानी जाएंगी, जबकि यज्ञीय अग्नि सदैव शुद्ध और पवित्र बनी रहेगी।

ब्रह्माजी के इस वरदान के बाद अग्निदेव पुनः प्रकट हुए और संसार में यज्ञ तथा धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम पुनः प्रारंभ हुआ।

यह कथा हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं देती है। प्रथम, सत्य का पालन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे उसके परिणाम कितने ही कठिन क्यों न हों। द्वितीय, क्रोध में दिया गया निर्णय कभी-कभी व्यापक संकट उत्पन्न कर सकता है। तृतीय, धर्म और शास्त्रों की मर्यादा ही किसी संबंध की वास्तविक आधारशिला होती है। साथ ही यह कथा महर्षि च्यवन के दिव्य जन्म और अग्निदेव की महिमा का भी अद्भुत वर्णन करती है। सनातन परंपरा में यह प्रसंग धर्म, सत्य और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

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