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फ्रांस पर मुस्लिम कब्जे का ट्रंप का दावा

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यूरोप में सुलग उठी सत्ता विरोधी आग

नौ यूरोपीय देशों में महंगाई, शिक्षा और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन; अरब स्प्रिंग से तुलना, विदेशी ताकतों की भूमिका पर उठे सवाल

नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। फ्रांस से उठी विरोध प्रदर्शनों की लपटें इटली, बेल्जियम, पुर्तगाल, स्पेन और अल्बानिया समेत कई देशों तक पहुंच गई हैं। महंगाई, ईंधन की बढ़ती कीमतें, महंगा आवास, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सेवाओं में कटौती के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोगों ने सरकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान आगजनी, लूटपाट और पुलिस से झड़पों ने हालात को और गंभीर बना दिया है।

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने यूरोप की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। ट्रंप ने फ्रांस की आव्रजन नीति पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि पेरिस जल्द ही मुस्लिम शहर बन सकता है। उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को निशाने पर लेते हुए कहा कि उन्हें पहले ही बड़ी संख्या में प्रवासियों को देश में प्रवेश देने के खिलाफ चेताया था। ट्रंप ने अमेरिकी सीमा नीति का उदाहरण देते हुए फ्रांस की सीमाओं को लेकर भी चिंता जताई। हालांकि, फ्रांस पर मुस्लिमों के कब्जे की किसी संगठित साजिश का स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है।

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सड़कों पर जनता, निशाने पर सरकारें

फ्रांस में शुरू हुआ आंदोलन अब केवल छात्रों की नाराजगी तक सीमित नहीं रह गया है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं से शुरू हुए विरोध में महंगाई तथा आम लोगों की घटती क्रयशक्ति के मुद्दे भी जुड़ गए हैं। 17 अक्तूबर को फ्रांस में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। फ्रांसीसी गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में लगभग 5.50 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन कुछ स्थानों पर हिंसा, दुकानों में लूटपाट और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुईं।

प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने कट्टर वामपंथी समूहों पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया, जबकि राष्ट्रपति मैक्रों ने उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई का संकल्प जताया। इस घटनाक्रम ने सरकार की कानून-व्यवस्था संभालने की क्षमता और राजनीतिक नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

नौ देशों में एक जैसी बेचैनी, लेकिन आंदोलन अलग-अलग

यूरोप के अलग-अलग देशों में विरोध के कारणों में समानता जरूर है, लेकिन सभी आंदोलनों को एक ही संगठन या साजिश से जोड़ना अभी संभव नहीं है। इटली में महंगाई और आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। बेल्जियम में शिक्षा और जीवनयापन की लागत को लेकर असंतोष उभरा है। पुर्तगाल में लोग वेतन, पेंशन और आवास की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। स्पेन में किराये और आवास संकट ने विरोध को हवा दी है, जबकि अल्बानिया में भ्रष्टाचार और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर नाराजगी सामने आई है।

जर्मनी, ग्रीस और ऑस्ट्रिया में भी असंतोष के संकेतों की चर्चा हो रही है। हालांकि, इन सभी देशों में एक साथ फैले विरोध को किसी एक केंद्रीय नेतृत्व के अधीन संचालित आंदोलन बताने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

क्या यूरोप में दोहराया जा रहा अरब स्प्रिंग?

2010 के अंत में ट्यूनीशिया से शुरू हुआ अरब स्प्रिंग 2011 में मिस्र, लीबिया और दूसरे अरब देशों तक फैल गया था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और लंबे समय से सत्ता पर काबिज शासकों के खिलाफ उठे आंदोलन ने कई देशों की सत्ता बदल दी। कुछ देशों में इसका परिणाम लंबे गृहयुद्ध और अस्थिरता के रूप में भी सामने आया।

यूरोप में मौजूदा प्रदर्शनों की तुलना अरब स्प्रिंग से इसलिए की जा रही है, क्योंकि यहां भी आर्थिक संकट और सरकारी नीतियों के प्रति असंतोष सड़कों पर दिखाई दे रहा है। लेकिन दोनों परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है। यूरोपीय देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएं, चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक विरोध के स्थापित माध्यम मौजूद हैं। इसलिए मौजूदा प्रदर्शनों को अरब स्प्रिंग की पुनरावृत्ति मान लेना जल्दबाजी होगी।

विदेशी ताकतों का हाथ या घरेलू नाराजगी?

इतने देशों में विरोध प्रदर्शनों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कोई बाहरी ताकत यूरोप की राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठा रही है। सोशल मीडिया के जरिए संदेशों का प्रसार, राजनीतिक ध्रुवीकरण और बाहरी दुष्प्रचार किसी भी आंदोलन को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन प्रभाव डालने की संभावना और किसी विदेशी ताकत द्वारा आंदोलन संचालित करने के प्रमाण दो अलग बातें हैं।

अब तक उपलब्ध रिपोर्टों में यूरोप के इन सभी प्रदर्शनों के पीछे किसी एक विदेशी शक्ति की संगठित साजिश की पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर, महंगाई, ऊर्जा संकट, महंगे मकान और सार्वजनिक सेवाओं की गिरती गुणवत्ता जैसे वास्तविक मुद्दे व्यापक जन-असंतोष की वजह बने हुए हैं।

मैक्रों के सामने दोहरी चुनौती

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के सामने अब दोहरी चुनौती है। उन्हें एक ओर हिंसा और लूटपाट पर नियंत्रण स्थापित करना है, वहीं दूसरी ओर उन आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान भी खोजना है, जिन्होंने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। ट्रंप के बयान ने आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान की बहस को और तेज कर दिया है।

यूरोप के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारें जनता की आर्थिक परेशानियों को दूर कर राजनीतिक विश्वास बहाल कर पाएंगी, या बढ़ता असंतोष कट्टरपंथी और ध्रुवीकरण की राजनीति को और मजबूत करेगा। फिलहाल, सड़कों पर उठती आवाजें यूरोपीय सरकारों के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं।

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