इटली में मेलोनी सरकार की सख्ती से योगी मॉडल फिर चर्चा में; मोदी की दोस्ती से आगे निकला उत्तर प्रदेश का प्रशासनिक प्रयोग, काम की कसौटी पर नेतृत्व का फर्क
लखनऊ। राजनीति में कुछ लोगों की पहचान उनकी मुलाकातों, तस्वीरों और दोस्ती के चर्चों से बनती है, तो कुछ की पहचान उनके काम से। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ चर्चित दोस्ती और ‘मेलोडी’ की सियासी गूंज अपनी जगह है, लेकिन अब इटली में दंगाइयों और उपद्रवियों के खिलाफ सख्ती की चर्चा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मॉडल को भी अंतरराष्ट्रीय बहस में ला खड़ा किया है। तंज यही है कि मोदी की सियासत जहां दोस्ती की सुर्खियों में चमकती रही, वहीं योगी की पहचान कानून-व्यवस्था के उस मॉडल से जोड़कर देखी जा रही है, जिसकी चर्चा अब यूरोप के संदर्भ में भी हो रही है।
इटली में हिंसक प्रदर्शनों, दुकानों में तोड़फोड़, लूटपाट और पुलिस पर हमलों के बाद मेलोनी सरकार ने सुरक्षा संबंधी कड़े प्रावधानों को मंजूरी दी है। हिंसा में शामिल लोगों के लिए जेल, भारी जुर्माने और सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई जैसे प्रावधानों की चर्चा है। नाबालिगों के उपद्रव में शामिल होने पर उनके अभिभावकों की आर्थिक जिम्मेदारी तय करने का प्रावधान भी सामने आया है। यही वह बिंदु है, जहां उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की नीति से तुलना की जा रही है।
मोदी और मेलोनी की दोस्ती की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरती रही हैं। मगर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में असली परीक्षा तस्वीरों की लोकप्रियता नहीं, नीतियों की उपयोगिता और प्रशासन की क्षमता से होती है। मेलोनी सरकार का संदेश साफ है कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं दी जा सकती। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कानून-व्यवस्था की बात आती है, तो चर्चा केवल प्रधानमंत्री की वैश्विक छवि तक सीमित क्यों रहे? राज्यों में किए गए प्रशासनिक प्रयोगों और उनके नतीजों को भी कसौटी पर क्यों न परखा जाए?
‘मेलोडी’ की सुर्खियां बनाम काम का मॉडल
नरेंद्र मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकातों को लेकर ‘मेलोडी’ शब्द खूब चर्चित हुआ। राजनीतिक समर्थकों ने इसे भारत-इटली की निकटता का प्रतीक बताया। लेकिन व्यंग्य का असली निशाना यही है कि राजनीति में दोस्ती की सुर्खियां बनाना आसान है, अपने काम को ऐसी नीति में बदलना कठिन, जिसे दूसरे देश भी अपने हालात के मुताबिक अपनाने पर विचार करें।
योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश में दंगों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों में सख्ती को अपनी कार्यशैली का प्रमुख हिस्सा बनाया। वर्ष 2020 में सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति वसूलने के लिए उत्तर प्रदेश में कानून बनाया गया। इसके तहत दावा अधिकरणों की व्यवस्था की गई, ताकि नुकसान की जिम्मेदारी तय करने की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सके।
यही योगी मॉडल का वह पक्ष है, जिसकी तुलना इटली में प्रस्तावित सख्ती से की जा रही है। संदेश यह है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का लाइसेंस नहीं। सार्वजनिक संपत्ति जनता के कर से बनती है। बसों, सरकारी इमारतों, दुकानों और दूसरे सार्वजनिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का खामियाजा अंततः आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। ऐसे में दोषियों की जवाबदेही तय करना प्रशासन के लिए जरूरी है।
यूरोप को भी याद आया सख्ती का रास्ता?
इटली में हालिया हिंसा के बाद मेलोनी सरकार ने सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में पांच या अधिक लोगों के समूह के साथ सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों में शामिल होने पर पांच साल तक की जेल और 20 हजार यूरो तक के जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। चेहरा छिपाकर हिंसा करने, लोगों को घायल करने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों में अतिरिक्त कार्रवाई की बात भी सामने आई है।
मिलान सहित उत्तरी इटली के कुछ शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाओं के बाद सरकार ने सुरक्षा बढ़ाने के कदम उठाए हैं। महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा और पुलिस की सहायता के लिए सैनिकों की तैनाती की घोषणा भी की गई है।
यहां एक बात समझना जरूरी है। इटली के प्रावधानों और उत्तर प्रदेश के कानून को एक जैसा बताना सही नहीं होगा। दोनों देशों की कानूनी व्यवस्था, संवैधानिक ढांचा और प्रशासनिक परिस्थितियां अलग हैं। फिर भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की जवाबदेही तय करने और हिंसा के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का साझा उद्देश्य दोनों नीतियों की तुलना का आधार बनता है।
व्यंग्य यह है कि जिस देश में राजनीतिक बहस अक्सर इस पर अटक जाती है कि किस नेता की तस्वीर किस विदेशी नेता के साथ कितनी चर्चित हुई, वहीं प्रशासनिक नीतियों की चर्चा कहीं अधिक गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या किसी नेता की अंतरराष्ट्रीय पहचान केवल उसके संपर्कों से बनेगी या उसके शासन के काम से भी? और क्या राज्यों के सफल प्रशासनिक प्रयोगों को राष्ट्रीय राजनीति में पर्याप्त महत्व दिया जाता है?
योगी मॉडल की ताकत और उसकी असली परीक्षा
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था को अपनी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है। उनकी सरकार का दावा रहा है कि दंगाइयों और उपद्रवियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई से प्रदेश में अव्यवस्था पर अंकुश लगाने में मदद मिली है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति वसूलने की व्यवस्था इसी नीति का हिस्सा है।
लेकिन योगी मॉडल की चर्चा करते समय केवल सख्ती का गुणगान करना पर्याप्त नहीं होगा। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्रवाई कानून के दायरे में होनी चाहिए। दोषियों की पहचान, पर्याप्त साक्ष्य, निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक समीक्षा जरूरी हैं। उत्तर प्रदेश में संपत्ति क्षति के मामलों में भी जवाबदेही कानूनी प्रक्रिया के तहत ही तय की जानी चाहिए। यही किसी प्रशासनिक मॉडल की विश्वसनीयता का आधार है।
योगी सरकार के समर्थकों का तर्क है कि जब उपद्रवियों को गिरफ्तारी, मुकदमे और क्षतिपूर्ति का जोखिम दिखाई देता है, तो हिंसा करने से पहले वे उसके परिणामों के बारे में सोचेंगे। विरोधियों का कहना है कि कठोर कार्रवाई के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी निर्दोष को दंड न मिले। इस बहस के बीच योगी मॉडल की वास्तविक सफलता का आकलन कानून-व्यवस्था के आंकड़ों, हिंसक घटनाओं में कमी और न्यायिक प्रक्रिया के परिणामों से होना चाहिए।
फ्रांस की घटनाएं भी दे रहीं चेतावनी
यूरोप में फ्रांस की घटनाओं ने भी विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल उठाया है। महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन जब आगजनी, लूटपाट और तोड़फोड़ में बदलते हैं, तो सरकारों के सामने कानून का राज कायम रखने की चुनौती खड़ी होती है।
इटली और फ्रांस के उदाहरण बताते हैं कि लोकतंत्र के सामने कानून-व्यवस्था की चुनौतियां किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं हैं। आर्थिक असंतोष को दूर करना सरकारों की जिम्मेदारी है, लेकिन असंतोष के नाम पर हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी तरह, हिंसा रोकने के नाम पर शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को कुचलना भी लोकतांत्रिक समाधान नहीं है।
इसलिए योगी मॉडल की अंतरराष्ट्रीय चर्चा का अर्थ यह नहीं कि यूरोप ने उत्तर प्रदेश की पूरी शासन व्यवस्था अपना ली है। अधिक सटीक बात यह है कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और हिंसा करने वालों से जवाबदेही तय करने जैसे मुद्दों पर दोनों जगह समान प्रकार की नीतिगत बहस दिखाई दे रही है।
मोदी के लिए भी एक संदेश
अब बात फिर मोदी और योगी की। प्रधानमंत्री मोदी की अंतरराष्ट्रीय सक्रियता, विदेशी नेताओं से उनके संबंध और भारत की वैश्विक छवि का अपना महत्व है। किसी भी देश के प्रधानमंत्री के लिए कूटनीतिक संबंध मजबूत करना जरूरी है। लेकिन सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल विदेश यात्राओं, संयुक्त तस्वीरों और लोकप्रिय नारों से नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकारों के काम, प्रशासनिक क्षमता और जनता को मिलने वाले परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अगर किसी राज्य की नीति दूसरे देशों में चर्चा का विषय बनती है, तो उसका मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी यही कसौटी लागू होती है।
राजनीतिक कटाक्ष की भाषा में कहें तो ‘मेलोडी’ से सुर्खियां मिल सकती हैं, लेकिन शासन की असली धुन काम से निकलती है। दोस्ती की तस्वीरें कुछ दिनों तक चर्चा में रह सकती हैं, जबकि कानून-व्यवस्था, निवेश, रोजगार और प्रशासन से जुड़े फैसलों का असर लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
फिर भी इसे मोदी बनाम योगी की सीधी प्रतिस्पर्धा बताना जल्दबाजी होगी। इटली में सख्त प्रावधानों की मंजूरी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मेलोनी ने योगी को अपना राजनीतिक आदर्श घोषित कर दिया है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर योगी सरकार की नीतियों की तुलना अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से की जा रही है। राजनीति में चमक चेहरे से आती है, लेकिन स्थायी पहचान काम से बनती है। मोदी की ‘मेलोडी’ अपनी जगह, योगी मॉडल की चर्चा अपनी जगह। किसी भी नेता के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही होगी कि उसकी नीतियों का उल्लेख केवल प्रचार में नहीं, बल्कि ठोस परिणामों और जवाबदेह प्रशासन के संदर्भ में हो। आखिरकार, जनता को तस्वीरों से ज्यादा सुरक्षित सड़कें, मजबूत कानून-व्यवस्था और न्यायपूर्ण शासन चाहिए।
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