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सवर्ण समाज का दर्द: मोदी के राज में बचे दो शेर, बाकी गीदड़!

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सवर्णों के हक में चिराग और बृजभूषण की हुंकार, मोदी कैबिनेट के सवर्ण नेताओं की चुप्पी पर सवाल

सवर्ण समाज के वोटों से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वालों, अब बोलने की बारी तुम्हारी है!

लखनऊ। राजनीति में शेर वही नहीं, जो मंच से दहाड़ता है। शेर वह भी है, जो अपने समाज के सवालों पर सत्ता के सामने खड़े होने का साहस रखता है। सवर्ण समाज के मुद्दों पर चिराग पासवान और बृजभूषण शरण सिंह के बयानों ने भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों के उन नेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जो अपने समाज के समर्थन से राजनीति में ताकतवर तो बने, लेकिन उसके सवालों पर उनकी आवाज सुनाई नहीं देती। सवाल तीखा है—सवर्ण समाज के हक की बात करने वाले गिने-चुने नेता ही क्यों दिखाई देते हैं? बाकी नेताओं की दहाड़ सत्ता की दहलीज पर पहुंचते ही क्यों घुट जाती है?

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चिराग ने दिखाई हिम्मत

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने सवर्ण समाज की चिंताओं और उसकी आवाज को लेकर ऐसा रुख दिखाया, जिसने सामाजिक न्याय की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी। उनका संदेश साफ है—यदि किसी समाज के नेता उसकी समस्याओं को नहीं समझ रहे और उसकी आवाज दब रही है, तो दूसरे जनप्रतिनिधियों को भी उसके सवाल उठाने चाहिए। समाज के किसी वर्ग की चिंता करना किसी दूसरे वर्ग के अधिकारों के खिलाफ खड़ा होना नहीं है।

चिराग का यह रुख उन नेताओं के लिए आईना है, जो सामाजिक न्याय की बात तो करते हैं, लेकिन उसकी परिभाषा अपने राजनीतिक लाभ के हिसाब से तय करते हैं। यदि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याएं उठाना राजनीति का दायित्व है, तो सवर्ण समाज की वास्तविक समस्याओं पर बोलना भी उतना ही जरूरी है।

बृजभूषण की दहाड़

पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी सवर्ण समाज के सवालों पर खुलकर अपनी बात रखी है। उनका बयान—”देश में दो ही खलनायक हैं, पहला मुस्लिम और दूसरा इस समय सवर्ण”—राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुसलमानों के समर्थन में राजनीतिक दल खड़े दिखाई देते हैं, तो सवर्ण समाज के साथ कौन खड़ा है?

बृजभूषण ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों पर भी आपत्ति जताई और कानून के निष्पक्ष होने की जरूरत पर जोर दिया। आरक्षण के सवाल पर भी उन्होंने अपनी बात रखी। उनके विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन एक बात स्पष्ट है—उन्होंने विवाद की आशंका के बावजूद अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखा।

यही वह राजनीतिक साहस है, जिसकी अपेक्षा दूसरे जनप्रतिनिधियों से भी की जाती है। सवाल केवल किसी कानून का समर्थन या विरोध करने का नहीं, बल्कि जनता की आशंकाओं का जवाब देने का है।

मोदी कैबिनेट के नेता मौन क्यों?

अब सवाल केंद्र की सत्ता में बैठे उन सवर्ण जनप्रतिनिधियों से है, जिनके पास मंत्री पद, राजनीतिक प्रभाव और अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के पर्याप्त अवसर हैं। क्या उन्होंने सवर्ण समाज की चिंताओं पर कोई ठोस पहल की? क्या उन्होंने यूजीसी के नियमों, आरक्षण और कानूनों के निष्पक्ष इस्तेमाल से जुड़े सवालों पर खुलकर अपना पक्ष रखा? यदि रखा है, तो जनता को इसकी जानकारी मिलनी चाहिए। यदि नहीं, तो चुप्पी का कारण भी स्पष्ट होना चाहिए।

सत्ता में पद हासिल करना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनप्रतिनिधि की असली परीक्षा तब होती है, जब उसे अपने समर्थकों की आशंकाओं पर जवाब देना पड़ता है। समाज के सवालों पर मौन रहकर केवल पद की सुरक्षा करना नेतृत्व की कसौटी नहीं हो सकता।

यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी भी सवर्ण नेता ने आवाज नहीं उठाई। लेकिन यह पूछना बिल्कुल जायज है कि जिन नेताओं की राजनीतिक ताकत में सवर्ण मतदाताओं की भी बड़ी भूमिका रही है, वे उनकी चिंताओं पर कितनी सक्रियता दिखा रहे हैं।

शेर या सियासी गीदड़?

राजनीतिक व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन असली सवाल जवाबदेही का है। चिराग पासवान और बृजभूषण शरण सिंह ने सवर्ण समाज के मुद्दों पर अपनी बात रखकर बहस को आगे बढ़ाया है। अब दूसरे नेताओं की बारी है कि वे भी सामने आएं और अपना रुख स्पष्ट करें।

सवर्ण समाज के अधिकारों की बात करना किसी अन्य समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाना नहीं होना चाहिए। दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और सवर्णों—सभी के लिए न्याय, समान अवसर और कानून का निष्पक्ष इस्तेमाल लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी भी समाज की वास्तविक शिकायतों को केवल राजनीतिक आरोप बताकर खारिज करना भी उचित नहीं है।

सवाल आखिर में वही है—जब वोट मांगने की बारी आती है, तब हर समाज महत्वपूर्ण हो जाता है। फिर उसके सवाल उठाने की बारी आने पर नेता खामोश क्यों हो जाते हैं?

सवर्ण समाज को भी अपने प्रतिनिधियों से यही पूछना चाहिए—आप हमारे वोट के नेता हैं या हमारी आवाज के भी? दहाड़ केवल चुनावी मंच पर नहीं, जनता के सवालों पर भी सुनाई देनी चाहिए।

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