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रिपोर्ट में नया खुलासा: लोकप्रियता घटी, मोदी के सामने चुनौती!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा आधार उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता रही है। भाजपा की चुनावी रणनीति से लेकर केंद्र सरकार की उपलब्धियों के प्रचार तक, मोदी का चेहरा सबसे आगे रखा गया। लेकिन अब सामने आ रहे सर्वेक्षणों में इस लोकप्रियता के ग्राफ में गिरावट के संकेत दिखाई दे रहे हैं। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे–सी-वोटर के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वेक्षण में मोदी को अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए सबसे उपयुक्त मानने वालों का अनुपात जनवरी के 54.7 प्रतिशत से घटकर 48.7 प्रतिशत रह गया। छह प्रतिशत अंक की यह गिरावट महज आंकड़ा नहीं, बल्कि सत्ता के लिए आत्ममंथन का विषय है।

देश का जनमत पूरी तरह मोदी सरकार के खिलाफ हो गया है। सर्वेक्षण में मोदी अब भी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प बने हुए हैं। लेकिन लोकप्रियता का 50 प्रतिशत से नीचे जाना बताता है कि उनका समर्थन पहले जैसा एकतरफा नहीं रह गया है। लंबे समय से सत्ता में रहने वाली सरकारों के लिए यही वह समय होता है, जब उपलब्धियों के दावों के साथ जनता की शिकायतों का हिसाब भी देना पड़ता है।

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यूपी में बदले जनमत के संकेत

मोदी की लोकप्रियता में गिरावट का एक महत्वपूर्ण संकेत उत्तर प्रदेश से मिला है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के ‘बिलीफ्स एंड बिहेवियर’ सर्वेक्षण के अनुसार, जनवरी-अप्रैल 2026 में उत्तर प्रदेश के 64.58 प्रतिशत उत्तरदाता मोदी के कामकाज को मंजूरी दे रहे थे। मई-अगस्त की अवधि में यह आंकड़ा घटकर 49.85 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में 48.93 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उनके कामकाज पर असहमति जताई।

यह गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तर प्रदेश भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख केंद्र है। राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या और उसकी राजनीतिक भूमिका को देखते हुए यहां जनसमर्थन में बदलाव पर विशेष ध्यान देना स्वाभाविक है। हालांकि, यह राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण है; इसे पूरे देश के जनमत का सीधा प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।

युवाओं के बीच भी घटा भाजपा का समर्थन

सरकार के सामने दूसरी चुनौती युवाओं की अपेक्षाओं से जुड़ी है। सीएमआईई के अनुसार, मतदान की उम्र वाले छात्रों में केंद्र के लिए भाजपा को पसंदीदा पार्टी बताने वालों का अनुपात जुलाई 2026 में 63.41 प्रतिशत था। अगस्त में यह घटकर 60.24 प्रतिशत और सितंबर में 58.91 प्रतिशत रह गया। दो महीनों में 4.50 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई।

छात्रों के बीच किसी पार्टी की पसंद और प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता अलग-अलग पैमाने हैं। फिर भी यह आंकड़ा सरकार के लिए विचार करने का विषय है। युवा रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर जवाब चाहते हैं। यदि इन सवालों का संतोषजनक समाधान नहीं दिखता, तो राजनीतिक समर्थन पर उसका असर पड़ सकता है।

महंगाई और बेरोजगारी का हिसाब

इंडिया टुडे–सी-वोटर के अगस्त सर्वेक्षण में बेरोजगारी और महंगाई सरकार के सामने प्रमुख चिंताओं के रूप में उभरीं। भ्रष्टाचार को लेकर भी जनता की धारणा सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण दिखाई दी। सर्वेक्षण में 43.2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि राजग सरकार के दौरान भ्रष्टाचार बढ़ा है।

यह आंकड़ा भ्रष्टाचार बढ़ने का स्वतंत्र प्रमाण नहीं, बल्कि उत्तरदाताओं की धारणा को दर्शाता है। लेकिन लोकतंत्र में जनधारणा का महत्व कम नहीं होता। सरकार भले ही आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं की उपलब्धियां गिनाए, आम नागरिक अपने जीवन में महंगाई का असर, रोजगार के अवसर और आय की स्थिरता देखकर ही उसके प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है।

यही कारण है कि विकास के बड़े दावों के साथ घरेलू अर्थव्यवस्था के सवालों का जवाब देना जरूरी है। युवाओं को रोजगार, परिवारों को महंगाई से राहत और कारोबारियों को स्थिर अवसर चाहिए। इन मोर्चों पर असंतोष बढ़ता है तो सरकार की उपलब्धियों का राजनीतिक लाभ सीमित हो सकता है।

विपक्ष को भी नहीं मिला स्वतः लाभ

मोदी की लोकप्रियता में गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि विपक्ष ने उनके मुकाबले समान अनुपात में जनसमर्थन हासिल कर लिया है। उसी सर्वेक्षण में राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए उपयुक्त मानने वालों का आंकड़ा जनवरी के 26.6 प्रतिशत से मामूली बढ़कर 27.1 प्रतिशत हुआ। यानी मोदी के समर्थन में छह प्रतिशत अंक की गिरावट के मुकाबले राहुल गांधी की बढ़त केवल आधा प्रतिशत अंक रही।

यह स्थिति बताती है कि सरकार के प्रति असंतोष और विपक्ष के प्रति समर्थन दो अलग-अलग बातें हैं। जनता किसी सरकार के कामकाज से निराश हो सकती है, लेकिन इससे यह अपने आप तय नहीं हो जाता कि वह विकल्प के रूप में किसे चुनेगी। विपक्ष को भी रोजगार, महंगाई, शिक्षा और आर्थिक अवसरों पर विश्वसनीय कार्यक्रम प्रस्तुत करना होगा।

चेतावनी को समझे सरकार

मोदी सरकार के लिए इन सर्वेक्षणों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि व्यक्तिगत लोकप्रियता स्थायी राजनीतिक पूंजी नहीं होती। जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए परिणाम देने पड़ते हैं। छह प्रतिशत अंक की राष्ट्रीय गिरावट, उत्तर प्रदेश में मंजूरी का 50 प्रतिशत से नीचे आना और छात्रों के बीच भाजपा की पसंद में लगातार दो महीने की गिरावट—इन संकेतों को अलग-अलग सर्वेक्षणों के निष्कर्ष के रूप में गंभीरता से समझने की जरूरत है।

साथ ही, इन आंकड़ों से सरकार के पतन या आगामी चुनावों के परिणाम की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा। सर्वेक्षण किसी खास अवधि में लोगों की राय बताते हैं; वे चुनावी नतीजों की गारंटी नहीं होते।

लोकप्रियता का असली इम्तिहान प्रचार नहीं, जनता का भरोसा है। मोदी सरकार के सामने चुनौती अपनी उपलब्धियों को गिनाने के साथ यह साबित करने की भी है कि रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार की धारणा और युवाओं की चिंताओं पर ठोस सुधार हो रहे हैं। जनता के सवालों का जवाब आंकड़ों से भी देना होगा और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से भी। यही किसी भी सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता की असली कसौटी है।

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