नई दिल्ली, 27जनवरी, (मनोज कृष्ण श्रीवास्तव)। भारत की राजनीति में पिछले एक दशक से कुछ नारे बेहद ताक़तवर ढंग से उछाले जाते रहे हैं—‘एक देश, एक झंडा, एक चुनाव’। इन नारों को राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक दक्षता और खर्च में कमी जैसे बड़े तर्कों के साथ जनता के सामने परोसा गया। मगर इसी शोरगुल के बीच एक बुनियादी सवाल लगातार अनसुना होता रहा—अगर देश सचमुच “एक” है, तो फिर देश के सभी नागरिकों के लिए “एक समान कानून” क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि इसे उठाने वाली सरकार वही है जो खुद को निर्णायक, मजबूत और सुधारक बताती रही है, लेकिन ग्यारह साल सत्ता में रहने के बाद भी इस दिशा में ठोस, सर्वमान्य और निष्पक्ष पहल नहीं कर सकी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपने पहले कार्यकाल से ही बड़े-बड़े वादों और नीतिगत दावों की राजनीति की। चुनावी मंचों से लेकर संसद तक ‘राष्ट्रहित’ और ‘समानता’ के शब्दों का जमकर इस्तेमाल हुआ। पर जब बात कानून की समानता की आती है, तो तस्वीर धुंधली हो जाती है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, लेकिन व्यवहार में नागरिक अलग-अलग कानूनों, अपवादों और विशेष प्रावधानों के बीच बंटे हुए हैं। सवाल यह नहीं कि विविधता वाले देश में अलग परंपराएँ क्यों हैं, सवाल यह है कि सत्ता में बैठी सरकार ने ‘एक कानून’ को लेकर स्पष्ट, ईमानदार और सर्वसमावेशी रोडमैप क्यों नहीं रखा।
भाजपा अक्सर ‘एक देश, एक चुनाव’ को प्रशासनिक सुधार बताती है। तर्क दिया जाता है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों का खर्च बचेगा, नीति-निर्माण में स्थिरता आएगी और विकास की गति तेज होगी। लेकिन यही तर्क ‘एक कानून’ पर क्यों लागू नहीं होता? क्या सभी नागरिकों के लिए कानून की समानता विकास का विषय नहीं है? क्या न्यायिक स्पष्टता और समान नागरिक अधिकार प्रशासनिक दक्षता नहीं बढ़ाते? अगर चुनावी कैलेंडर सुधार राष्ट्रहित है, तो कानून की समानता उससे कम राष्ट्रहित कैसे हो गई?
ग्यारह साल का समय किसी भी सरकार के लिए कम नहीं होता। इस अवधि में बड़े आर्थिक फैसले लिए गए, नोटबंदी जैसा प्रयोग हुआ, जीएसटी लागू किया गया, नई आपराधिक संहिताएँ लाई गईं और डिजिटल ढांचे को आगे बढ़ाया गया। यानी राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सरकार बड़े बदलाव कर सकती है। फिर ‘एक कानून’ के सवाल पर वही सरकार क्यों पीछे हटती दिखी? क्या यह मुद्दा केवल चुनावी भाषणों तक सीमित है? क्या वास्तविकता में सरकार सामाजिक सहमति, संवैधानिक संतुलन और कानूनी जटिलताओं से जूझने के बजाय आसान नारों को प्राथमिकता देती रही?
आलोचकों का कहना है कि भाजपा ने ‘एक कानून’ को कभी गंभीर नीति-सुधार के रूप में नहीं, बल्कि भावनात्मक और ध्रुवीकरण वाले विमर्श के रूप में इस्तेमाल किया। जब भी यह मुद्दा उठा, उसे किसी एक समुदाय या परंपरा के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश दिखी, जिससे व्यापक सहमति बनने के बजाय अविश्वास बढ़ा। कानून की समानता का विचार तभी मजबूत होता है जब वह सभी नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को बराबरी से देखे, न कि उसे राजनीतिक लाभ के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जाए।
प्रधानमंत्री मोदी की छवि एक निर्णायक नेता की बनाई गई। उनके समर्थक कहते हैं कि उन्होंने कठिन फैसले लेने से कभी परहेज़ नहीं किया। लेकिन ‘एक कानून’ के मामले में यह निर्णायकता नज़र नहीं आती। न तो व्यापक सार्वजनिक विमर्श कराया गया, न विशेषज्ञों, राज्यों और समाज के विभिन्न वर्गों के साथ ईमानदार संवाद। कभी-कभार बयान आते रहे, समितियों की बात होती रही, लेकिन जमीन पर ऐसा कोई ढांचा नहीं दिखा जो यह भरोसा दे कि सरकार सभी नागरिकों के लिए समान, न्यायसंगत और संवैधानिक कानून लाने को प्रतिबद्ध है।
यह भी गौर करने लायक है कि ‘एक देश, एक झंडा’ जैसे नारों का भावनात्मक असर तुरंत होता है। वे राष्ट्रवाद की भावना को छूते हैं और राजनीतिक समर्थन जुटाने में मदद करते हैं। इसके उलट ‘एक कानून’ एक जटिल, संवेदनशील और मेहनत मांगने वाला काम है। इसमें राजनीतिक जोखिम है, सवाल-जवाब हैं, असहज बहसें हैं। शायद यही वजह है कि भाजपा सरकार ने आसान रास्ता चुना—नारेबाजी और प्रतीकात्मक राजनीति—और कठिन सुधार को भविष्य के भरोसे छोड़ दिया।
आज स्थिति यह है कि सरकार ‘एक चुनाव’ पर गंभीरता से चर्चा कर रही है, समितियाँ बन रही हैं, प्रस्ताव रखे जा रहे हैं। लेकिन नागरिक पूछ रहे हैं कि जब चुनावी प्रक्रिया बदली जा सकती है, तो नागरिकों की कानूनी समानता पर वही तत्परता क्यों नहीं? क्या सरकार यह मानती है कि कानून की असमानता से कोई फर्क नहीं पड़ता? या फिर यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ग्यारह साल में इस दिशा में कदम न उठाना राजनीतिक प्राथमिकताओं की कमी को दिखाता है?
देश की जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं है। वह जवाब चाहती है। ‘एक देश’ का अर्थ केवल सीमाओं और प्रतीकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और कानून की बराबरी तक पहुँचना चाहिए। अगर सरकार वास्तव में राष्ट्रनिर्माण की बात करती है, तो उसे यह बताना होगा कि ग्यारह साल में ‘एक कानून’ पर ठोस पहल क्यों नहीं हुई। अन्यथा ‘एक देश, एक झंडा, एक चुनाव’ का शोर एक अधूरे एजेंडे की तरह ही याद रखा जाएगा—जहाँ बराबरी का सबसे जरूरी सवाल सत्ता की प्राथमिकताओं से बाहर रह गया।
भारत में ‘एक देश, एक झंडा, एक चुनाव’ की गूंज और ‘एक कानून’ की चुप्पी
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