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क्या वास्तव में हनुमान जी ने अकेले जलाई थी लंका?

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रामायण का लंका दहन प्रसंग भारतीय जनमानस में वीरता, भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। जब भी इस घटना का स्मरण होता है, मन में सबसे पहले पवनपुत्र हनुमान की छवि उभरती है, जिन्होंने अपनी पूँछ में लगी अग्नि से सोने की लंका को धधकती ज्वाला में बदल दिया था। लेकिन संत-महात्माओं और रामकथा के मर्मज्ञ विद्वानों की एक रोचक आध्यात्मिक व्याख्या इस घटना को और भी गहराई से समझने का अवसर देती है। इस व्याख्या के अनुसार लंका दहन केवल हनुमान जी के पराक्रम का परिणाम नहीं था। इसके पीछे पांच ऐसी शक्तियां कार्य कर रही थीं, जिन्होंने मिलकर रावण की स्वर्णनगरी के विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। ये पांच शक्तियां थीं—भगवान श्रीराम की इच्छा, रावण के पाप, माता सीता का संताप, विभीषण का जाप और पवनदेव का प्रताप। रामचरितमानस में अशोक वाटिका का एक प्रसंग आता है, जहां त्रिजटा राक्षसियों को अपना स्वप्न सुनाती है। वह बताती है कि उसने स्वप्न में एक वानर को लंका जलाते और राक्षस सेना का विनाश करते देखा है—

“सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेई करहु हित अपना।।
सपने बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी।।“

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संतों का मानना है कि यह केवल स्वप्न नहीं था, बल्कि भगवान श्रीराम की पूर्वनियोजित लीला का संकेत था। यह दर्शाता है कि लंका का विनाश पहले ही ईश्वरीय योजना का हिस्सा बन चुका था। इसलिए कहा जाता है कि लंका दहन की पहली और सबसे बड़ी वजह स्वयं श्रीराम की इच्छा थी।

दूसरी ओर रावण का अहंकार और उसके पाप भी उसके विनाश का कारण बने। रावण अत्यंत विद्वान और शिवभक्त था, लेकिन उसने धर्म की मर्यादाओं का उल्लंघन किया। माता सीता का हरण कर उसने अपने पतन की नींव स्वयं रख दी थी। हनुमान जी भी रावण को चेतावनी देते हुए कहते हैं—

“सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।“

अर्थात जो व्यक्ति भगवान राम का विरोधी बन जाता है, उसकी रक्षा हजारों शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी नहीं कर सकते। यह चौपाई बताती है कि रावण के पापों ने ही उसके विनाश का मार्ग तैयार कर दिया था।

लंका दहन की तीसरी वजह माता सीता का संताप माना जाता है। अशोक वाटिका में माता सीता की स्थिति का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी लिखते हैं

“कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी।।“

विरह और अपमान के कारण माता सीता अत्यंत दुखी थीं। वे निरंतर श्रीराम का स्मरण कर रही थीं। आगे मानस में वर्णन आता है—

“निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।“

जब हनुमान जी ने माता सीता की यह अवस्था देखी तो उनका हृदय भी करुणा से भर उठा। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि एक पतिव्रता और धर्मनिष्ठ स्त्री के आँसू कभी व्यर्थ नहीं जाते। सीता का संताप भी लंका के विनाश का एक महत्वपूर्ण कारण बना।

राक्षसों की नगरी में भी एक ऐसा व्यक्ति था, जिसके हृदय में राम का निवास था। वह थे विभीषण। जब हनुमान जी विभीषण के घर पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर प्रसन्न हो उठे। तुलसीदास जी लिखते हैं—

“रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।“

लंका के बीचों-बीच स्थित विभीषण का घर रामभक्ति का केंद्र था। उनका निरंतर राम-नाम जप इस बात का प्रमाण था कि अधर्म के बीच भी धर्म जीवित था। संतों के अनुसार विभीषण का जाप भी लंका दहन की एक बड़ी वजह बना।

अंत में पवनदेव की भूमिका आती है। जब हनुमान जी की पूँछ में अग्नि लगाई गई और उन्होंने उसे पूरी लंका में फैलाया, तब उस अग्नि को प्रचंड रूप देने का कार्य वायु ने किया। मानस में वर्णन है—

“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गरजा पुनि बढ़ि लाग अकास।।“

भगवान की प्रेरणा से उनचास प्रकार की वायु चलने लगीं और देखते ही देखते अग्नि ने सम्पूर्ण लंका को अपनी चपेट में ले लिया। इसलिए संत पवनदेव को भी लंका दहन का सहभागी मानते हैं। इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण संदेश हनुमान जी की विनम्रता है। उन्होंने कभी अपने पराक्रम का श्रेय स्वयं नहीं लिया। उन्होंने हर सफलता को प्रभु की कृपा और धर्म की विजय का परिणाम माना। यही कारण है कि वे केवल शक्ति के नहीं, बल्कि विनम्रता और भक्ति के भी सर्वोच्च प्रतीक हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह कथा बताती है कि जब अधर्म अपनी सीमा पार कर जाता है, जब निर्दोषों का संताप बढ़ जाता है और जब भक्त की पुकार ईश्वर तक पहुंचती है, तब ईश्वर की योजना सक्रिय हो जाती है। उस समय किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि अनेक दिव्य शक्तियों का समन्वय कार्य करता है। हनुमान जी उस दिव्य योजना के महान माध्यम बने और लंका दहन धर्म की विजय का शाश्वत प्रतीक बन गया। #हनुमानजी, #लंका_दहन, #रामचरितमानस, #रामायण, #श्रीराम, #माता_सीता, #विभीषण, #सनातन_धर्म, #हिंदू_धर्म, #आध्यात्मिकता, #धर्म_और_भक्ति, #तुलसीदास, #पवनपुत्र_हनुमान, #रामभक्ति, #धर्म_की_विजयश, हनुमान जी, लंका दहन, रामचरितमानस, रामायण कथा, हनुमान द्वारा लंका दहन, श्रीराम की इच्छा, रावण के पाप, सीता का संताप, विभीषण का जाप, पवनदेव, तुलसीदास, धार्मिक कथा, आध्यात्मिक रहस्य, सनातन धर्म


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