हिंदू एकता की सीढ़ी से सत्ता तक पहुंचे, अब उसी सीढ़ी को तोड़ने का इंतजाम!
हिंदू एकता की राजनीति ने भारतीय जनता पार्टी को वह ताकत दी, जिसकी बदौलत कभी राजनीतिक हाशिये पर खड़ी पार्टी देश की सत्ता के केंद्र तक पहुंच गई। राम मंदिर आंदोलन ने इस एकता को व्यापक जनसमर्थन दिया। जातियों में बंटे हिंदू समाज को एक साझा धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के सूत्र में बांधने की कोशिश हुई। अयोध्या से उठी आवाज देश के कोने-कोने तक पहुंची। राम मंदिर निर्माण के लिए लोगों ने आंदोलन किए, संघर्ष किया और बलिदान दिए। इस भावनात्मक एकजुटता का राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला। धीरे-धीरे राज्यों में सरकारें बनीं और केंद्र की सत्ता भी भाजपा के हाथों में आ गई।
लेकिन सत्ता की राजनीति का सबसे दिलचस्प तमाशा देखिए! जिस हिंदू एकता की नाव पर सवार होकर भाजपा ने सत्ता का समुद्र पार किया, उसी नाव में अब छेद करने की कवायद होती दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि क्या भाजपा को अब हिंदू एकता की जरूरत नहीं रही, या सत्ता के शिखर पर पहुंचकर उसे यह भ्रम हो गया है कि अब उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं?
मोदी जी का राजनीतिक दर्शन शायद यही है कि सीढ़ी चढ़ने के बाद उसे तोड़ दो, ताकि कोई दूसरा ऊपर न आ सके। लेकिन इस दर्शन में एक छोटी-सी समस्या है। सीढ़ी तोड़ने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कहीं अपने ही पैर तो उसी पर नहीं टिके हैं!
2018 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने संशोधन कर कानून के मूल प्रावधानों को बहाल किया। सरकार का तर्क था कि वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है। यह अपने आप में एक सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न है। लेकिन राजनीतिक धरातल पर इस फैसले को लेकर सवर्ण समाज के एक हिस्से में नाराजगी पैदा हुई। भाजपा को भी इसके राजनीतिक परिणामों का सामना करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने फिर बहुमत हासिल कर लिया, लेकिन क्या उस समय पैदा हुआ सामाजिक असंतोष पूरी तरह समाप्त हो गया था? 2024 के चुनाव परिणामों ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया कि भाजपा के लिए सब कुछ पहले जैसा नहीं रह गया है।
2019 में 303 सीटें जीतने वाली भाजपा 2024 में घटकर 240 सीटों पर आ गई। पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल करने में विफल रही और सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर हो गई। इसके पीछे अनेक कारण रहे, लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि जिस सामाजिक एकजुटता ने पार्टी को अपार राजनीतिक ताकत दी थी, उसमें दरारें क्यों दिखाई देने लगी हैं? क्या सत्ता के अहंकार में उन आवाजों को अनसुना किया गया, जिन्हें कभी भाजपा का स्वाभाविक समर्थक माना जाता था?
आज भाजपा केंद्र की सत्ता में जरूर है, लेकिन सत्ता में होना और राजनीतिक रूप से अजेय होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि यही राजनीतिक दिशा बनी रही और सामाजिक असंतोष बढ़ता गया, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। मोदी जी को यह समझना चाहिए कि चुनावी विजय का इतिहास भविष्य की जीत की गारंटी नहीं होता। पार्टी की जड़ों में मट्ठा डालकर कोई माली लंबे समय तक हरे-भरे पेड़ का सपना नहीं देख सकता।
अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों को लेकर विवादों ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है। उच्च शिक्षा में भेदभाव रोकना और वंचित विद्यार्थियों को न्याय दिलाना जरूरी है। लेकिन किसी भी व्यवस्था को लागू करते समय यह भी देखना होगा कि उसके प्रावधान न्याय की भावना को मजबूत करते हैं या समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास बढ़ाते हैं। कानून और नियम ऐसे होने चाहिए, जिनसे पीड़ित को न्याय मिले, न कि निर्दोष के मन में आशंका पैदा हो और समाज को आपसी टकराव का नया मैदान मिल जाए।
विडंबना देखिए! भाजपा की राजनीति लंबे समय तक जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर हिंदू एकता का संदेश देती रही। अब उसी राजनीति के सामने सवाल खड़ा है कि क्या सामाजिक न्याय और हिंदू एकता को परस्पर विरोधी बनाकर देखा जाएगा? क्या सरकार ऐसी नीतियां नहीं बना सकती, जिनसे वंचित वर्गों को न्याय मिले और दूसरे वर्गों में अन्याय का भय भी पैदा न हो? आखिर शासन का काम घाव भरना है या एक घाव भरने के नाम पर दूसरे घाव को और गहरा कर देना?
मोदी जी को कौन समझाए कि हिंदू एकता चुनावी मंच की सजावट नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया है। इसे मजबूत करने में वर्षों लगते हैं, लेकिन नीतियों से पैदा हुआ अविश्वास इसे कमजोर करने में देर नहीं लगाता। समाज कोई चुनावी गणित नहीं है कि अलग-अलग खानों के आंकड़े जोड़कर मनचाहा परिणाम निकाल लिया जाए। हिंदू समाज की एकता का नारा देकर सत्ता हासिल करना आसान हो सकता है, लेकिन उस एकता को बनाए रखने के लिए संवेदनशीलता, दूरदर्शिता और न्यायपूर्ण नीतियों की जरूरत होती है।
सबसे बड़ा सवाल भाजपा के उन रणनीतिकारों से है, जो हर चुनाव में हिंदू एकता की दुहाई देते हैं। क्या उन्हें समाज में बढ़ती खाई दिखाई नहीं देती? क्या उन्हें लगता है कि विरोधी दल इस असंतोष का राजनीतिक लाभ नहीं उठाएंगे? क्या वे मानकर बैठे हैं कि मतदाता केवल नारों से बंधा रहेगा और अपनी सामाजिक आशंकाओं, शिकायतों तथा नाराजगी को कभी व्यक्त नहीं करेगा? राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु भले न हों, लेकिन मतदाता को हमेशा के लिए किसी पार्टी की जेब में पड़ा सिक्का समझ लेना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है।
2019 में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था, लेकिन 2024 में उसकी सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। इस गिरावट के पीछे स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, महंगाई, उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी और दूसरे राजनीतिक समीकरणों सहित अनेक कारण रहे होंगे। इसलिए पूरे चुनाव परिणाम का ठीकरा किसी एक कानून या विवाद पर फोड़ना उचित नहीं होगा। मगर यह भी सच है कि बहुमत का अहंकार मतदाता की नाराजगी को मिटा नहीं सकता। चुनावी नतीजे चेतावनी देते हैं, और समझदार नेतृत्व चेतावनियों को पढ़ता है। जो नेतृत्व हर असहमति को नजरअंदाज करता है, उसे जनता एक दिन अपने तरीके से जवाब देती है।
मोदी जी को समझना होगा कि पेड़ की डाल पर बैठकर उसी को काटने वाला व्यक्ति अपनी ताकत का नहीं, अपने विवेक का परिचय देता है। फर्क केवल इतना है कि पेड़ से गिरने वाला व्यक्ति खुद चोट खाता है, जबकि राजनीति में गलत फैसलों की कीमत पूरी पार्टी, उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी चुकानी पड़ सकती है। प्रधानमंत्री के पास सत्ता की ताकत है, बहुमत का अनुभव है और विशाल राजनीतिक संगठन है। फिर भी यदि वे सामाजिक समीकरणों की नाजुकता को नहीं समझते, तो यह ताकत उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है।
हिंदू एकता का श्रेय लेने वाली भाजपा को अब तय करना होगा कि वह इस एकता को मजबूत करना चाहती है या उसे केवल चुनावी मौसम में इस्तेमाल होने वाला नारा बनाए रखना चाहती है। सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी वर्ग के अधिकारों की रक्षा दूसरे वर्ग को शत्रु मानकर नहीं की जा सकती। समाज को जोड़ने का दावा करने वाली राजनीति यदि समाज के भीतर ही अविश्वास बढ़ाने लगे, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए, न कि अपनी हर नीति को सही ठहराने के लिए तर्कों की नई दीवार खड़ी कर देनी चाहिए।
सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन नीतियों के परिणाम लंबे समय तक साथ चलते हैं। इसलिए मोदी जी को अपनी राजनीतिक कुल्हाड़ी चलाने से पहले डाल की मजबूती जरूर जांच लेनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि जिस पेड़ की छांव में भाजपा ने अपना राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया, उसी पेड़ की जड़ें कमजोर करने का इतिहास भी उसी के नाम दर्ज हो जाए। राम मंदिर आंदोलन से पैदा हुई हिंदू एकजुटता को भाजपा ने अपनी राजनीतिक शक्ति में बदला था। अब उस शक्ति को बचाए रखना है, तो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भरोसा भी बनाए रखना होगा।
क्योंकि पेड़ की डाल काटने वाले को सबसे पहले यह याद रखना चाहिए कि कुल्हाड़ी चाहे कितनी भी तेज हो, गिरने से पहले वह भी उसी डाल पर खड़ा होता है!










