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दंभ नहीं अब आत्मविश्लेषण से उबरेगी सपा

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अखिलेश

यूूपी की सियासत अब नए मोड़ पर है, योगी- 2 सरकार प्रदेश की सियासत पर दोबारा काबिज हो गई है। प्रमुख विपक्षी दल हाशिये पर पहुंच गया है। कहा जा रहा है कि सपा का जनाधार बढ़ा है, सीटें दोगुनी हो गई है। वोट प्रतिशत भी बढ़ा है। सपा पिछले चुनाव में दहाई अंक में विधानसभा में सिमट गई थी तो इस चुनाव में कुलमिलाकर यह सवा सौ के आसपास है। पर, वह भी बहुमत से बहुत दूर। यह बात इसलिए कही जानी लाजिमी है, क्योंकि सपा मुखिया अखिलेश तीन सौ सीटें यूपी में जीतने का दावा कर रहे थे। चुनाव से पहले बार यह जताने का प्रयास किया जा रहा था, योगी राज के प्रति आक्रोश है, जिसका असर मिशन-2022 पर रहेगा। अखिलेश की सत्ता में वापसी होगी, लेकिन अब जब योगी सत्ता पर दोबारा काबिज हो गए है तो भी सपा मुखिया हार पर आत्म विश्लेषण करने के बजाए यह दंभ भर रहे है कि हमारी इस चुनाव में सीटें बढ़ी है। इन हालात में बात दिलों- दिमाग में आती है कि मन को बहलाने को यह ख्याल भी अच्छा है……। यह बात समाजवादियों व सपा मुखियां को अखर सकती है लेकिन सच तो यही है। समाजवादी आज भी सत्ता के दंभ से अब तक मुक्त नहीं हो सके है, शायद यही वजह है कि व आत्मविश्लेषण तक करना जरूरी नहीं समझते है। उनकी मनोदशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव हारने के बाद उन्होंने हार तो स्वीकार इस अंदाज में की है, मानों विधानसभा में अधिक सीटें जीतकर कोई बड़ा किला फतह कर लिया हो। हार के बाद उन्हें आत्म विश्लेषण इस बात करना चाहिए था कि 2017 में उनकी पार्टी रसातल में क्यों गई थी? फिर 2022 में योगी की सत्ता विरोधी लहर के बावजूद योगी सत्ता में दोबारा सत्ता में काबिज क्यों हुए? आखिर योगी में कुछ तो होगा, जो जनता के मन को भाया था। सपा सुप्रीमो ने इसे गहराई से समझने का प्रयास नहीं किया। इसके उलट वे कभी ईवीएम तो कभी योगी पर सम्प्रदायिकता का आरोप मढ़ते नजर आए। यह विचार तक नहीं किया कि उन्होंने योगी जी को बुलडोजर बाबा तक क्यों कहा था। इसका राजनीतिक प्रभाव क्या रहा? वास्तविकता में उनके इस राजनीतिक बयान का असर यह रहा कि योगी इसी के साथ यूपी की सियासत में बुलडोजर बाबा के नाम से मशहूर हो गए। जिसका योगी को राजनीतिक माइलेज मिला और वह दोबारा यूपी की सत्ता में आसीन हुए। दूसरे शब्दों में कहें तो अखिलेश के बयान ने योगी को एक सियासी पहचान दिला दी, जो उन्हें पूर्व के अन्य सीएम की तुलना में काफी बड़ा व्यक्तित्व के रूप में उभारने में सहायक बनी। चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी अखिलेश यादव ने यह विचार नहीं किया कि आजम खां और शिवपाल को नजरअंदाज करके उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी। इन गलतियों को सुधारने के बजाए अखिलेश यादव सपा कुनबे में लगी आग में घी डालने वाले बयान दे रहे है। शिवपाल के मामले की बात करे तो वह उन पर लगातार आक्रामक हो रहे है। हालात इस कदर बद से बदतर हो गए हैं कि आजम खां ने उनके दूत से मिलना तक गंवारा नहीं किया। आखिर कोई तो बात होगी, जिसका आक्रोश उनके दल के नेताओं में है, लेकिन अखिलेश यादव की सोच इस दिशा में अब भी सकारात्मकता से भरी नहीं दिख रही है। इसका नतीजा यह होगा कि सपा के खंड- खंड होने का पूर्वानुमान अब जमीनी हकीकत बनकर सामने आना वाला है। सपा नेतृत्व में राजनीति दूरदर्शिता की कमी लगातार नजर आ रही है, लेकिन इसे सुधारने की कोई प्रभावी पहल जनता को नहीं दिखी है। इस मामले में लखनऊ के पास रहने वाले ग्रामीण से बात की गई, जो यदुवंशी है, जो पूर्व में कट्टïर समाजवादी था, लेकिन वोट योगी जी को दिया। उससे पूछा गया कि आखिर योगी को क्यों वोट दिया? तो बोला कि जो नेता अपने कुनबे को नहीं संभाल सका, वह क्या प्रदेश चलाएगा? उससे क्या उम्मीद की जाए? यह मत बेशक एक मतदाता का हो, लेकिन मर्म उन सभी समर्थकों का है, जो सपा को अपना मानते है।

……डरने लगे अखिलेश

विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव को अपने मूल जनाधार यानी यदुवंशियों के खफा होने व उनके पाले से भाजपा के पाले में जाने का डर सताने लगा है। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने एमएलसी चुनाव में उन्होंने यादवों को भरपूर संख्या में टिकट दिए और मुस्लिम नेताओं को नजर अंदाज कर दिया। इसके पीछे शायद उन्हें लगता होगा कि यह मुस्लिम मतदाता और नेता जाएंगे कहां? इन्हें ठौर कहां मिलेगा? सपा मुखिया इस मामले में चाहे जो भी सोच रखते हों, लेकिन इतना तय है कि उनके इस एक और गैर दूरदर्शी फैसले से मुस्लिम नेता खफा हो गए, इसका असर यह हुआ कि एक के बाद दूसरे मुस्लिम नेताओं की नाराजगी सामने आ रही हैं। ऐसे में विधानपरिषद चुनाव में खेला गया उनका दांव अब उन ही भारी पड़ता नजर आ रहा है, जोकि सपा को एक ऐसे रसातल में ले रहा है, जहां से उभरना शायद अब सपा के लिए मुश्किल हो जाए।

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