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कलराज मिश्र और बृजभूषण के तेवरों ने हिलायी दिल्ली की सत्ता

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भाजपा में बगावत की ज्वाला: यूजीसी कानून के खिलाफ अपनों ने ही खोला मोर्चा

नई दिल्ली, 29 जनवरी, (भृगु नागर)।  भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक अप्रत्याशित और भीषण राजनीतिक भूकंप की आहट सुनाई दे रही है। जिस यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) कानून को सरकार अपनी उपलब्धि मान रही थी, अब वही कानून पार्टी के भीतर गले की फांस बनता जा रहा है। राजस्थान के राज्यपाल और कद्दावर ब्राह्मण चेहरा कलराज मिश्र के कड़े रुख ने इस विरोध को आधिकारिक मोहर दे दी है। उनके इस बयान ने न केवल पार्टी आलाकमान को असहज कर दिया है, बल्कि उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक कार्यकर्ताओं में असंतोष की आग भड़का दी है।

राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने इस कानून की वैधानिकता और सामाजिक प्रभाव पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी कानून जब जनभावनाओं के विपरीत जाकर थोपा जाता है, तो वह व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होता है। मिश्र का मानना है कि यूजीसी के वर्तमान स्वरूप में जो बदलाव प्रस्तावित हैं या लागू किए जा रहे हैं, वे उच्च शिक्षा की स्वायत्तता को कुचलने वाले हैं। उन्होंने संकेत दिया कि यदि संवैधानिक संस्थाएं ही असुरक्षित महसूस करेंगी, तो राष्ट्र का भविष्य संकट में पड़ जाएगा। उनके इस बयान ने सरकार के उन दावों की हवा निकाल दी है जिसमें इस कानून को क्रांतिकारी बताया जा रहा था।

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कलराज मिश्र की इस हुंकार को उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह का भी पुरजोर समर्थन मिला है। बृजभूषण सिंह, जो अपने बेबाक अंदाज के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने तो सीधे तौर पर इसे ‘काला कानून’ करार दे दिया है। उन्होंने दिल्ली के गलियारों तक अपनी गूँज पहुँचाते हुए मांग की है कि इस काले कानून को बिना किसी विलंब के तत्काल वापस लिया जाना चाहिए। बृजभूषण सिंह ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जनता के हितों और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी निर्णय को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके इस रुख ने पूर्वांचल की राजनीति में हलचल मचा दी है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

केवल वरिष्ठ नेता ही नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता भी अब पार्टी के खिलाफ खड़े हो गए हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण उत्तर प्रदेश के कुमरावां मंडल में देखने को मिला, जहाँ भाजपा की पूरी इकाई ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। मंडल महामंत्री अंकित तिवारी समेत 11 प्रमुख पदाधिकारियों ने एक साथ अपने पदों से त्याग पत्र दे दिया है। इन कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी नेतृत्व अब जमीनी फीडबैक की अनदेखी कर रहा है और ऐसे कानून थोपे जा रहे हैं जो आम जनमानस के विरुद्ध हैं। पदाधिकारियों के सामूहिक इस्तीफे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विरोध की यह लहर अब केवल बंद कमरों की चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतर आई है।

इस विरोध की आग में घी डालने का काम किया है भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद रीता बहुगुणा जोशी ने। उन्होंने भी इस कानून के प्रावधानों पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। हालांकि उन्होंने सीधे इस्तीफे की बात नहीं की, लेकिन कानून में आमूल-चूल संशोधन पर कड़ा जोर दिया। उन्होंने दो टूक कहा कि लोकतांत्रिक देश में ऐसा कोई भी कानून अस्तित्व में नहीं होना चाहिए, जिससे समाज के किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव की बू आती हो। जोशी ने तर्क दिया कि कानून का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि किसी विशिष्ट वर्ग को लक्षित कर उसे हाशिए पर धकेलना। उन्होंने स्पष्ट किया कि भेदभावपूर्ण नीतियों से पार्टी की साख को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है।

भाजपा के भीतर उभरा यह असंतोष केवल इन चार-पांच नामों तक सीमित नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश के भी कई स्थानीय नेताओं ने दबे स्वर में और कुछ ने मुखर होकर इस ‘यूजीसी संकट’ पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। कई जिलों में स्थानीय इकाइयों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर आगाह किया है कि यदि इस कानून को वापस नहीं लिया गया या इसमें सकारात्मक बदलाव नहीं किए गए, तो आने वाले चुनावों में भाजपा को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। जगह-जगह हो रहे प्रदर्शन और कार्यकर्ताओं का अपनी ही सरकार के पुतले फूंकना यह दर्शाता है कि अब धैर्य का बांध टूट चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। एक तरफ विपक्ष हमलावर है, तो दूसरी तरफ घर के भीतर से उठ रही ये आवाजें पार्टी के ‘अनुशासन’ वाले टैग को तार-तार कर रही हैं। कलराज मिश्र जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति और बृजभूषण सिंह जैसे जनाधार वाले नेता का एक सुर में बोलना यह संकेत है कि यह विरोध आने वाले दिनों में और अधिक आक्रामक रूप अख्तियार करेगा। यदि समय रहते इस डैमेज को कंट्रोल नहीं किया गया, तो कार्यकर्ताओं का यह सामूहिक पलायन और बड़े नेताओं की यह नाराजगी पार्टी के लिए आत्मघाती साबित होगी। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यूजीसी कानून अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि भाजपा के अस्तित्व और उसकी आंतरिक एकता के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।

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