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टाटा समूह पर ‘हिन्दू विरोध’ के आरोप क्यों बार-बार?

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TCS से तनिष्क तक उठते सवाल, क्या ब्रांड मैनेजमेंट में कोई एजेंडा सक्रिय है?

देश की सबसे प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट पहचान पर लगातार विवादों की छाया, जनता पूछ रही—गलतियाँ संयोग हैं या सोच-समझकर रची गई रणनीति?

सनातनजन विशेष संवाददाता, नई दिल्ली/लखनऊ। टाटा समूह भारत की उन चुनिंदा औद्योगिक पहचान में शामिल है, जिसे दशकों तक “विश्वसनीयता, नैतिकता और राष्ट्रहित” का प्रतीक माना गया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में टाटा समूह की कंपनियों के इर्द-गिर्द लगातार ऐसे विवाद खड़े हुए हैं, जिनमें सोशल मीडिया और जनमानस में “हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने” जैसे आरोप बार-बार उभरकर सामने आए। अब यह चर्चा केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं रही। सवाल यह नहीं है कि विवाद क्यों हुआ, सवाल यह है कि बार-बार एक ही प्रकार के विवाद टाटा ब्रांड्स के साथ ही क्यों खड़े हो रहे हैं?

हाल के दिनों में TCS नासिक यूनिट से जुड़ा मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर टाटा समूह के खिलाफ आलोचना का तूफान तेज हो गया। महिलाओं के उत्पीड़न और कथित धर्मांतरण दबाव से जुड़े आरोपों ने मामला इतना संवेदनशील बना दिया कि जांच की चर्चा ATS और NIA जैसी एजेंसियों तक जा पहुंची। हालांकि जांच अभी चल रही है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है, लेकिन जनता का गुस्सा इस बात पर है कि देश की प्रतिष्ठित कंपनी का नाम इस तरह की गंभीर शिकायतों में कैसे घसीटा गया? क्या यह केवल कुछ कर्मचारियों की व्यक्तिगत मानसिकता का परिणाम है या सिस्टम की लापरवाही और कमजोर आंतरिक निगरानी इसका कारण है?

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इसी बीच लोगों को याद आने लगे तनिष्क के पुराने विवाद। 2020 में तनिष्क का “एकत्वम्” विज्ञापन देशभर में आग की तरह फैला था। विज्ञापन का उद्देश्य चाहे जो रहा हो, लेकिन जिस प्रकार इंटरफेथ नैरेटिव को प्रस्तुत किया गया, उसने एक बड़ा वर्ग भड़का दिया। “लव जिहाद” जैसे आरोपों के साथ विरोध इतना तेज हुआ कि कंपनी को विज्ञापन हटाना पड़ा। यह घटना टाटा समूह के लिए केवल एक मार्केटिंग गलती नहीं थी, बल्कि एक गंभीर चेतावनी थी कि भारत में धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं को हल्के में लेना किसी भी ब्रांड को भारी पड़ सकता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उस विवाद के बाद भी टाटा समूह की ब्रांडिंग और कम्युनिकेशन रणनीति बार-बार आलोचनाओं के घेरे में आती रही।

तनिष्क के अन्य अभियानों और कुछ त्योहारों से जुड़े विज्ञापन/कलेक्शन कैंपेन भी सोशल मीडिया पर आलोचना झेल चुके हैं। कई बार यह सवाल उठा कि आखिर भारतीय परंपरा और रीति-रिवाजों को दिखाने का तरीका ऐसा क्यों चुना जाता है जिससे विवाद की गुंजाइश बनती है? क्या मार्केटिंग टीम बार-बार यह भूल कर रही है कि देश का बड़ा वर्ग धर्म और संस्कृति को सिर्फ “थीम” नहीं मानता, बल्कि जीवन का आधार मानता है?

इन विवादों के दौरान सोशल मीडिया पर कुछ नाम भी उछाले गए, जिनमें तनिष्क की कथित ब्रांड/मार्केटिंग हेड के तौर पर अदिति अग्रवाल का नाम कई पोस्टों में बार-बार आया। हालांकि कंपनी की ओर से किसी अधिकारी को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराने की कोई पुष्टि नहीं हुई, लेकिन यह भी सच है कि जब एक प्रतिष्ठित ब्रांड बार-बार विवादों में फंसता है, तो जनता किसी न किसी चेहरे को जिम्मेदार मानने लगती है। और यही स्थिति टाटा समूह के साथ बन रही है—लोग अब केवल “कंपनी” को नहीं, बल्कि “कंपनी के निर्णयकर्ताओं” को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

सवाल यह है कि क्या टाटा समूह की ब्रांड रणनीति में कोई ऐसा दृष्टिकोण मौजूद है, जो बार-बार विवादों को जन्म देता है? क्या यह महज संयोग है कि हर बार विवाद धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता के आसपास ही घूमता है? या फिर यह “वोक ब्रांडिंग” की वह रणनीति है जिसमें जानबूझकर ऐसे विषय चुने जाते हैं, जो समाज को विभाजित करें, बहस खड़ी करें और ब्रांड को चर्चा में बनाए रखें? यह रणनीति पश्चिमी देशों में चलती होगी, लेकिन भारत में यह आग से खेलने जैसा है।

टाटा समूह को यह समझना होगा कि भारत का समाज केवल ग्राहक नहीं है, वह भावनाओं का समाज है। यहां धर्म और संस्कृति बाजार का उत्पाद नहीं, बल्कि आस्था का विषय है। जब किसी ब्रांड की छवि बार-बार इस धारणा से जुड़ने लगे कि वह हिन्दू भावनाओं की अनदेखी करता है या उन्हें बार-बार चोट पहुंचाने वाले प्रयोग करता है, तो यह केवल PR संकट नहीं रह जाता, यह विश्वास संकट बन जाता है। और विश्वास टूटने के बाद उसे जोड़ना सबसे कठिन होता है।

टाटा समूह की सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि वह विवादों के बाद अक्सर स्पष्टीकरण देने के बजाय “डैमेज कंट्रोल” के रास्ते पर चलता दिखता है। विज्ञापन हटाना, बयान जारी करना, जांच के आदेश देना—ये सब कदम तात्कालिक राहत दे सकते हैं, लेकिन मूल प्रश्न वहीं रहता है कि ऐसी स्थिति बनी ही क्यों? क्या किसी ने पहले स्क्रिप्ट, कंटेंट और संभावित प्रतिक्रिया का आकलन नहीं किया? क्या किसी ने चेतावनी नहीं दी? या चेतावनी दी गई तो उसे नजरअंदाज कर दिया गया?

आज जब सोशल मीडिया हर व्यक्ति को जज बना चुका है, तब बड़े समूहों को यह मानकर चलना होगा कि हर निर्णय सार्वजनिक परीक्षण के लिए खुला है। और यदि टाटा समूह सच में खुद को “भारत का सबसे भरोसेमंद नाम” बनाए रखना चाहता है, तो उसे बार-बार उठ रहे इन आरोपों पर स्पष्ट नीति और पारदर्शी जवाबदेही दिखानी होगी। अन्यथा धीरे-धीरे यह धारणा मजबूत होती जाएगी कि विवाद दुर्घटना नहीं, बल्कि आदत बन चुके हैं।

देश अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि “क्या हुआ”, देश यह पूछ रहा है कि “क्यों हुआ” और “बार-बार क्यों हुआ?” और यही सवाल टाटा समूह के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

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