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मोदी सरकार की सवर्ण-विरोधी नीतियाँ बनेंगी सत्ता परिवर्तन की वजह?

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UGC विवाद से RSS तक घिरता भगवा तंत्र

नई दिल्ली, 29 जनवरी (भृगु नागर)। मोदी सरकार यदि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) समेत लगातार सामने आ रहे सवर्ण विरोधी फैसलों की इसी राह पर आगे बढ़ती रही, तो यह मानने में अब कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस कांग्रेस की सत्ता में वापसी को कुछ समय पहले तक असंभव माना जा रहा था, वही कांग्रेस एक बार फिर केंद्र की सत्ता के करीब पहुँच सकती है। बीते ग्यारह वर्षों में भारतीय जनता पार्टी ने जिन सामाजिक समूहों को अपना स्थायी वोट बैंक समझ लिया था, आज वही वर्ग खुद को ठगा हुआ और हाशिये पर महसूस कर रहा है। यह असंतोष केवल सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि उस वैचारिक ढांचे के खिलाफ भी है, जिसके सहारे भाजपा सत्ता तक पहुँची थी।

UGC के हालिया आदेशों और शिक्षा से जुड़े नए विनियमों ने इस असंतोष को खुलकर सामने ला दिया है। सवर्ण समाज का बड़ा वर्ग मानता है कि समानता और सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसी नीतियाँ लागू की जा रही हैं, जिनका सीधा नुकसान सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं को हो रहा है। विश्वविद्यालयों में नियुक्ति, प्रवेश और प्रशासनिक निर्णयों में जिस तरह से नए प्रावधान लाए जा रहे हैं, उन्हें सवर्ण समुदाय अपने भविष्य पर सीधा प्रहार मान रहा है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में UGC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए और सरकार से आदेश वापस लेने की मांग तेज हुई।

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यह पहला मौका नहीं है जब मोदी सरकार पर अपने ही परंपरागत समर्थकों की उपेक्षा करने का आरोप लगा हो। आर्थिक आधार पर आरक्षण (EWS) को छोड़ दें, तो बीते वर्षों में ऐसे कई फैसले हुए हैं, जिनसे सवर्ण समाज में यह धारणा बनी है कि भाजपा अब “सबका साथ” के नारे से आगे बढ़कर कुछ वर्गों को खुश करने की राजनीति में उलझ गई है। इस असंतोष को विपक्ष, खासकर कांग्रेस, लगातार हवा देने में जुटी हुई है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक ढांचे से जुड़े मुद्दों पर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। राहुल गांधी बार-बार यह सवाल उठा चुके हैं कि सरकार सामाजिक न्याय की आड़ में देश को नए सिरे से बांटने का काम कर रही है। कांग्रेस का तर्क है कि मोदी सरकार की नीतियाँ न तो वास्तविक समानता ला रही हैं और न ही सामाजिक संतुलन बना पा रही हैं, बल्कि वे केवल राजनीतिक लाभ के लिए समाज में तनाव पैदा कर रही हैं।

यहीं से मामला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS तक पहुँच जाता है। संघ, जिसे भाजपा की वैचारिक रीढ़ माना जाता है, कांग्रेस के सीधे निशाने पर है। कांग्रेस के कई नेता खुले मंचों से यह कहते रहे हैं कि RSS संविधान की मूल भावना के खिलाफ काम करता रहा है और अगर कांग्रेस दोबारा सत्ता में आती है, तो संघ की गतिविधियों पर कड़ा रुख अपनाया जाएगा। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कांग्रेस की वापसी की स्थिति में RSS पर प्रतिबंध जैसे कदम भी असंभव नहीं होंगे।

संघ की ओर से भले ही यह कहा जा रहा हो कि जाति और आरक्षण जैसे विषयों का राजनीतिक दुरुपयोग नहीं होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भाजपा सरकार के फैसलों से उपजा गुस्सा अंततः RSS तक ही पहुँचेगा। क्योंकि आम सवर्ण मतदाता भाजपा और संघ को एक ही वैचारिक सिक्के के दो पहलू के रूप में देखता है। अगर भाजपा सरकार की नीतियाँ उसे नुकसान पहुँचा रही हैं, तो उसकी नाराज़गी संघ से भी होना स्वाभाविक है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वह बिंदु है, जहाँ से कांग्रेस को नया जीवन मिल सकता है। कांग्रेस भले ही संगठनात्मक रूप से कमजोर रही हो, लेकिन यदि सवर्ण असंतोष, युवा बेरोजगारी, शिक्षा नीति और सामाजिक असुरक्षा जैसे मुद्दे एक साथ उभरते हैं, तो यह भाजपा के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। खासकर उत्तर भारत में, जहाँ सवर्ण वोट बैंक ने भाजपा को लंबे समय तक मजबूती दी है।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल यही मानी जा रही है कि उसने अपने मूल समर्थक वर्ग की नाराज़गी को या तो गंभीरता से नहीं लिया, या फिर यह मान लिया कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का नैरेटिव हर असंतोष को ढक देगा। लेकिन UGC जैसे मुद्दों ने यह साफ कर दिया है कि शिक्षा और भविष्य से जुड़े सवालों पर भावनात्मक नारों से काम नहीं चलता।

अगर यह असंतोष आगे भी बढ़ता रहा और कांग्रेस इसे एक ठोस राजनीतिक एजेंडे में बदलने में सफल रही, तो आने वाले वर्षों में सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार हो सकती है। उस स्थिति में सबसे बड़ा झटका केवल भाजपा को नहीं, बल्कि RSS को भी लगेगा, जिसकी सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक प्रभाव पर सीधा सवाल खड़ा हो जाएगा।

कुल मिलाकर, मोदी सरकार के सामने यह केवल एक नीतिगत विवाद नहीं है, बल्कि यह उसके पूरे राजनीतिक भविष्य की परीक्षा है। सवर्ण समाज की अनदेखी, शिक्षा नीति पर असंतोष और सामाजिक संतुलन की बिगड़ती धारणा अगर इसी तरह बनी रही, तो कांग्रेस की वापसी अब कल्पना नहीं, बल्कि एक संभावित राजनीतिक वास्तविकता बन सकती है।

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