भारतीय सनातन परंपरा में जीवन और मृत्यु को केवल एक शारीरिक घटना नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा का एक चरण माना गया है। प्राचीन ग्रंथों, लोकमान्यताओं और अनुभवों में यह कहा जाता है कि मृत्यु अचानक नहीं आती, बल्कि उसके पहले शरीर और चेतना कई संकेत देने लगते हैं। इन्हीं संकेतों को लेकर आज भी समाज में गहरी जिज्ञासा और चर्चा बनी रहती है। मृत्यु से जुड़े ये संकेत भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता को समझाने और आत्मिक तैयारी का संदेश देने के लिए बताए गए हैं। सनातन दृष्टि में मृत्यु अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा की शुरुआत है। इसलिए जीवन को धर्म, सत्य और सेवा के मार्ग पर चलकर सार्थक बनाना ही इन संकेतों का वास्तविक उद्देश्य माना गया है।
लोक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि मृत्यु से लगभग तीन महीने पहले व्यक्ति के शरीर में कुछ असामान्य परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। सबसे पहला संकेत इंद्रियों से जुड़ा होता है। व्यक्ति अपनी ही आँख से नाक के आगे का हिस्सा स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता। सामान्य अवस्था में यह संभव होता है, लेकिन जब ऐसा न हो तो इसे अशुभ संकेत माना जाता है। दूसरा महत्वपूर्ण संकेत गंध से जुड़ा है। कहा जाता है कि मृत्यु के निकट आने पर व्यक्ति को अपने ही शरीर से या आसपास की वस्तुओं से अलग प्रकार की दुर्गंध महसूस होने लगती है, जिसे सामान्य लोग महसूस नहीं कर पाते। यह संकेत शास्त्रों में प्राण शक्ति के क्षीण होने से जोड़ा गया है।
तीसरा संकेत श्रवण शक्ति से संबंधित बताया जाता है। यदि कानों में उंगली डालने पर भी कोई आवाज़ सुनाई न दे, तो इसे गंभीर चेतावनी माना गया है। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि जैसे-जैसे मृत्यु निकट आती है, वैसे-वैसे इंद्रियाँ बाहरी संसार से अपना संबंध तोड़ने लगती हैं।
कुछ मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि मृत्यु के समीप व्यक्ति की परछाईं असामान्य हो जाती है। कभी वह धुंधली दिखती है, कभी विकृत आकार की प्रतीत होती है, तो कभी बिल्कुल दिखाई ही नहीं देती। इसे आत्मा और शरीर के बंधन के कमजोर होने का संकेत माना जाता है।
इसके अतिरिक्त, कई लोगों ने अनुभव साझा किए हैं कि मृत्यु से पहले घर से निकलते समय बार-बार ठोकर लगना, अचानक दिशा भ्रमित होना, या बार-बार अशुभ स्वप्न दिखाई देना भी संकेत माने जाते हैं। यदि व्यक्ति के पीछे चलते समय कुत्ता लगातार भौंकता रहे या चार दिनों तक घर के आसपास अजीब घटनाएँ हों, तो लोकमान्यता में इसे भी समय के अनुकूल न होने का संकेत कहा गया है।
हालाँकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये सभी बातें आस्था, शास्त्रीय उल्लेख और लोक अनुभवों पर आधारित हैं। आधुनिक विज्ञान मृत्यु को शारीरिक प्रक्रियाओं का परिणाम मानता है और इन संकेतों को मानसिक या शारीरिक कमजोरी से जोड़कर देखता है। फिर भी भारतीय समाज में आज भी गरुड़ पुराण, योगवासिष्ठ और अन्य ग्रंथों के इन वर्णनों को गहरी श्रद्धा के साथ देखा जाता है।
मृत्यु पर विजय, अमरत्व का रहस्य और वैदिक साधना का गूढ़ विज्ञान










