नई दिल्ली, 28 फरवरी, (भृगु नागर)। यूजीसी के नए नियमों को लाने के बाद केंद्र सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश कर रही थी। लेकिन झारखंड के गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में नगर निकाय चुनाव में भाजपा को मिली हार ने इस दावे की चमक पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस क्षेत्र से भाजपा सांसद निशीकांत दुबे आते हैं, वहीं पार्टी का आधार खिसकना साधारण घटना नहीं मानी जा रही। इसे अब सीधे तौर पर यूजीसी नीति के बाद जनता की पहली राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े नए नियमों ने पहले ही देशभर में बहस छेड़ रखी थी। विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्रों के बीच कई स्तरों पर असहमति की खबरें सामने आती रही हैं। भाजपा नेतृत्व ने इसे सुधार की दिशा में निर्णायक कदम बताया, लेकिन जमीनी स्तर पर असंतोष की परतें नजरअंदाज होती रहीं। गोड्डा का परिणाम इसी पृष्ठभूमि में आया है—और इसे महज “स्थानीय समीकरण” कहकर टालना आसान नहीं।
भाजपा के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या नीति-निर्माण में पर्याप्त संवाद हुआ। जब शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में व्यापक बदलाव किए जाते हैं, तो उसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि भी उतनी ही तेज होती है। गोड्डा में भाजपा का पिछड़ना इस बात का संकेत है कि मतदाता केवल राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि से प्रभावित नहीं होते; वे नीतियों के असर को अपने अनुभव से भी तौलते हैं।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कई बड़े सुधार लागू किए हैं। पर हर सुधार का राजनीतिक जोखिम भी होता है। यूजीसी नियमों के बाद गोड्डा में मिली हार उस जोखिम का पहला स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आई है। इसे यदि गंभीर संकेत की तरह नहीं लिया गया, तो आने वाले चुनावों में इसका व्यापक असर हो सकता है।
भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में भी हलचल है। स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निर्णयों पर अधिक पारदर्शिता और संवाद की आवश्यकता थी। जब जमीनी स्तर पर असंतोष बढ़ता है, तो उसका प्रभाव सबसे पहले छोटे चुनावों में दिखाई देता है। गोड्डा का निकाय परिणाम उसी श्रंखला की कड़ी माना जा रहा है। यह कहना जल्दबाज़ी होगा कि एक निकाय चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय कर देगा। लेकिन यह मान लेना भी भूल होगी कि यह केवल संयोग है। यूजीसी नियमों के लागू होने के तुरंत बाद भाजपा के गढ़ में आई यह हार राजनीतिक दृष्टि से प्रतीकात्मक है। यह संकेत देती है कि शिक्षा नीति जैसे विषय पर जनता की संवेदनशीलता को कमतर आंकना भारी पड़ सकता है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा नेतृत्व इस संदेश को कैसे लेता है। क्या यह आत्ममंथन का अवसर बनेगा, या फिर इसे साधारण स्थानीय घटना मानकर आगे बढ़ा जाएगा? लोकतंत्र में मतदाता का फैसला अंतिम होता है। गोड्डा ने जो संकेत दिया है, वह साफ है—नीति चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका असर जमीन पर कसौटी बनकर सामने आता है। यदि उस कसौटी पर भरोसा डगमगाता है, तो सत्ता को झटका लगना तय है।
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