Lucknow में ब्राह्मण समागम में जबरदस्त हंगामा, यूजीसी को लेकर भाजपा पर बरसे वक्ता
लखनऊ। लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण समागम उस समय अचानक राजनीतिक अखाड़े में बदल गया, जब मंच से यूनिवर्सिटी गवर्नेंस और नए यूजीसी ढांचे को लेकर तीखे सवाल उठने लगे। कार्यक्रम का उद्देश्य सामाजिक एकजुटता और शैक्षणिक मुद्दों पर संवाद बताया गया था, लेकिन जैसे ही वक्ताओं ने विश्वविद्यालयों में केंद्र की भूमिका, कुलपति नियुक्तियों की प्रक्रिया और नियामकीय बदलावों पर टिप्पणी की, माहौल गर्म हो गया। कई वक्ताओं ने आरोप लगाया कि यूजीसी के नए प्रावधानों से राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है और उच्च शिक्षा पर “अत्यधिक केंद्रीकरण” का खतरा मंडरा रहा है। कार्यक्रम में भाजपा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा को बोलने नहीं दिया गया। उन्हें जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा।
यूजीसी यानी University Grants Commission देश में उच्च शिक्षा संस्थानों के मानक तय करने और अनुदान वितरण की केंद्रीय संस्था है। हाल के वर्षों में विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलपति चयन और पाठ्यक्रम ढांचे से जुड़े नियमों में बदलावों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है। समागम में मौजूद शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, स्थानीय आवश्यकताओं और राज्य सरकारों की भूमिका को संतुलित रखना जरूरी है। उनका तर्क था कि किसी भी नियामकीय बदलाव में व्यापक परामर्श होना चाहिए।
कार्यक्रम में मौजूद कुछ वक्ताओं ने आरोप लगाया कि यूजीसी के नए ढांचे से राज्य विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और नीतिगत निर्णयों पर केंद्र का प्रभाव बढ़ेगा। उनका कहना था कि इससे “शैक्षणिक स्वतंत्रता” प्रभावित हो सकती है। वहीं मंच के सामने बैठे युवाओं के एक समूह ने नारेबाजी शुरू कर दी। आयोजकों को बीच-बचाव करना पड़ा और कुछ समय के लिए कार्यक्रम स्थगित भी करना पड़ा। हंगामे के बीच पुलिस बल की तैनाती बढ़ाई गई, हालांकि किसी बड़े टकराव की सूचना नहीं मिली।
भाजपा समर्थक वक्ताओं ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यूजीसी का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और राष्ट्रीय मानकों को मजबूत करना है। उनका तर्क था कि देशभर में एक समान गुणवत्ता ढांचा बनाने से छात्रों को लाभ होगा और विश्वविद्यालयों की रैंकिंग व शोध क्षमता में सुधार आएगा। समर्थकों ने यह भी कहा कि नियामकीय पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए बदलाव जरूरी हैं।
विपक्षी रुख रखने वाले नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि शिक्षा “समवर्ती सूची” का विषय है, इसलिए राज्यों की भागीदारी और सहमति अनिवार्य है। उनका आरोप था कि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर जो दिशा-निर्देश सामने आए हैं, वे राज्यों की परंपरागत भूमिका को सीमित कर सकते हैं। समागम में कुछ वक्ताओं ने इसे “संघीय ढांचे की परीक्षा” बताया और चेतावनी दी कि यदि संवाद नहीं हुआ तो व्यापक आंदोलन की राह भी खुल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में शैक्षणिक और प्रशासनिक मुद्दों पर उठी नाराजगी को विपक्ष राजनीतिक अवसर के रूप में देख सकता है। वहीं भाजपा के रणनीतिकार इसे “भ्रम फैलाने की कोशिश” करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि यूजीसी के तहत जो भी परिवर्तन प्रस्तावित हैं, वे गुणवत्ता, पारदर्शिता और राष्ट्रीय एकरूपता को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।
समागम के अंत में आयोजकों ने एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया कि उच्च शिक्षा से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाए। उन्होंने मांग की कि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और प्रमुख पदों की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यों की भूमिका स्पष्ट और संतुलित रहे। साथ ही, शिक्षकों और छात्रों के प्रतिनिधियों को भी नीति-निर्माण में शामिल करने की बात कही गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यूजीसी से जुड़े मुद्दे केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुके हैं। लखनऊ का यह समागम आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या सियासी टकराव और तेज होता है।










