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कांग्रेस की तरह भाजपा का अहंकार मिटाएंगे सवर्ण?

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नई दिल्ली, 1 मार्च।  यूजीसी नियम लागू होने के बाद से जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई है, उसने भाजपा नेतृत्व के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या पार्टी अपने ही पारंपरिक समर्थक वर्ग की धड़कन सुनने में चूक रही है? सवर्ण समाज के भीतर जो असंतोष आकार ले रहा है, वह केवल एक नीति का विरोध नहीं है; यह सम्मान, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक प्राथमिकता का प्रश्न बन चुका है।

भाजपा ने वर्षों तक हिंदू एकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपना मूल आधार बताया। लेकिन अब यही वर्ग यह पूछने लगा है कि यदि पार्टी की राजनीति का केंद्र हिंदू समाज है, तो उसी समाज के भीतर विभाजन की रेखाएं क्यों गहरी की जा रही हैं? यूजीसी नियम को लेकर उपजा आक्रोश इसी मनोविज्ञान का परिणाम है।

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कांग्रेस का अहंकार उसके पतन का कारण बना। आज भाजपा के सामने वही कसौटी है। यदि वह यह मानकर चलती है कि सवर्ण समाज के पास कोई और रास्ता नहीं, तो यह सोच उसके लिए भारी पड़ सकती है।

सवर्ण मतदाता चुप रहकर भी राजनीति की दिशा बदल सकता है। यदि उसने ठान लिया कि अहंकार का उत्तर देना है, तो इतिहास एक बार फिर करवट ले सकता है।

भाजपा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। क्योंकि जब आधार ही असंतुष्ट हो जाए, तो शिखर अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहता।

“कोई विकल्प नहीं” की राजनीति और इतिहास का आईना

भारतीय राजनीति में “विकल्प नहीं है” का भ्रम पहले भी टूट चुका है। एक दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी यह विश्वास था कि उसकी जड़ें इतनी मजबूत हैं कि उसे हटाया नहीं जा सकता। लेकिन समय बदला, जनता ने विकल्प खोजा और वही विकल्प आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया।

कांग्रेस के पतन की सबसे बड़ी वजह केवल भ्रष्टाचार या नीतिगत असफलता नहीं थी, बल्कि सत्ता का अहंकार भी था। नेतृत्व को यह लगने लगा था कि मतदाता के पास कोई और रास्ता नहीं है। आज यदि भाजपा भी यह मानकर चल रही है कि सवर्ण समाज कहीं और नहीं जाएगा, तो यह वही ऐतिहासिक भूल दोहराने जैसा है।

सत्ता का नशा और वैचारिक दूरी

भाजपा ने अपने उभार के समय कांग्रेस पर तुष्टीकरण और वोट-बैंक की राजनीति का आरोप लगाया था। उसने खुद को सिद्धांतों पर अडिग और “पार्टी विद अ डिफरेंस” बताया। लेकिन यूजीसी जैसे निर्णयों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब पार्टी भी वही चुनावी गणित साधने में लगी है, जिसका वह विरोध करती थी।

सवर्ण समाज के भीतर यह भावना उभर रही है कि भाजपा उन्हें स्वाभाविक और बाध्य समर्थक मान बैठी है। यह धारणा राजनीति में सबसे खतरनाक होती है। जब समर्थक को यह लगे कि उसकी उपेक्षा हो रही है, तो वह चुपचाप विकल्प तलाशने लगता है।

सवर्ण समाज की चुप्पी क्या तूफान का संकेत है?

सवर्ण मतदाता परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत आधार रहा है। लेकिन राजनीति में समर्थन भावनात्मक अनुबंध होता है, स्थायी बंधन नहीं। यदि सम्मान की भावना आहत होती है, तो यह अनुबंध टूट भी सकता है।

आज सवर्ण समाज खुलकर विद्रोह की मुद्रा में भले न दिखे, लेकिन असंतोष की लहर सतह के नीचे चल रही है। भाजपा नेतृत्व यदि इसे मामूली समझ रहा है, तो यह रणनीतिक भूल होगी।

इतिहास बताता है कि जब मतदाता किसी दल के अहंकार को तोड़ने का निर्णय लेता है, तो वह ऐसा कर भी देता है। कांग्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

क्या कांग्रेस फिर विकल्प बन सकती है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस भले कमजोर हो, लेकिन वह पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुई है। दशकों तक देश पर शासन करने वाली पार्टी का संगठनात्मक ढांचा आज भी मौजूद है। यदि सवर्ण समाज रणनीतिक रूप से भाजपा को संदेश देना चाहे, तो कांग्रेस एक अस्थायी या आंशिक विकल्प बन सकती है।

यह संभावना ही भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। यदि उसका पारंपरिक समर्थक वर्ग ही यह संकेत दे कि वह असंतुष्ट है, तो चुनावी गणित तेजी से बदल सकता है।

भाजपा शायद यह मानकर चल रही है कि कांग्रेस सवर्णों का विकल्प नहीं बन सकती, लेकिन राजनीति में परिस्थितियां स्थिर नहीं रहतीं। असंतोष जब दिशा पाता है, तो कमजोर विकल्प भी मजबूत बन सकता है।

भाजपा के लिए चेतावनी: अहंकार का अंत हमेशा अचानक होता है

कांग्रेस के कई नेताओं ने सत्ता के चरम पर रहते हुए यह संकेत दिया था कि उनका राजनीतिक वर्चस्व अटूट है। लेकिन जनता ने उस भ्रम को तोड़ दिया।

आज यदि भाजपा के कुछ नेता विपक्ष को कमजोर और बिखरा हुआ बताकर संतोष कर रहे हैं, तो यह आत्ममुग्धता खतरनाक है। सवर्ण समाज यदि यह ठान ले कि वह अहंकार को जवाब देगा, तो परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं।

राजनीति में मतदाता कभी स्थायी रूप से बंधा नहीं रहता। वह अवसर देता है, लेकिन चेतावनी भी देता है। यूजीसी नियम के बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई है, वह चेतावनी की पहली घंटी हो सकती है।

हिंदू एकता का प्रश्न और भाजपा की परीक्षा

भाजपा की पूरी राजनीति हिंदू एकता के सिद्धांत पर आधारित रही है। यदि उसी समाज के भीतर यह धारणा बने कि पार्टी वर्गीय विभाजन को बढ़ावा दे रही है, तो यह उसके मूल संदेश को कमजोर करेगा।

सवर्ण समाज भाजपा को केवल एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में देखता रहा है। यदि यही प्रतिनिधित्व संदिग्ध हुआ, तो प्रतिक्रिया भी वैचारिक होगी, केवल चुनावी नहीं।

यूजीसी लाते ही भाजपा को पहला झटका

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